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दर्दनाक: 6628 पदों की भर्ती में 906 अभ्यर्थी क्यों रह गए बाहर? 2013 कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती की पूरी कहानी, 5669 को नियुक्ति, 906 UPSC से सिलेक्टेड को मिला था बड़ा झटका

 


लखनऊ/प्रयागराज। उत्तर प्रदेश में कृषि प्राविधिक सहायक ग्रुप-सी की वर्ष 2013 में शुरू हुई भर्ती आज भी सरकारी भर्तियों में सबसे लंबे कानूनी विवादों वाले मामलों में गिनी जाती है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) ने 22 अक्टूबर 2013 को Subordinate Agriculture Services, Grade-III (Technical Assistant Group-'C') Examination-2013 के तहत कुल 6628 पदों का विज्ञापन जारी किया था। इस भर्ती का मामला परीक्षा, परिणाम और नियुक्ति के बाद आरक्षण की गणना को लेकर अदालतों तक पहुंचा और आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया।

इस पूरी कहानी में सबसे महत्वपूर्ण संख्या 906 है। ये वे अभ्यर्थी थे जिन्हें चयन प्रक्रिया के बाद आयोग ने अनुशंसित तो किया, लेकिन आरक्षण की वैधानिक सीमा के कारण उन्हें नियुक्ति आदेश नहीं दिया जा सका। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2019 में उन्हें सीधे उसी भर्ती के पदों पर नियुक्त करने का आदेश देने से इनकार कर दिया, लेकिन आगामी भर्ती में एक बार आयु सीमा में छूट देकर अवसर देने का रास्ता खोल दिया।

शुरुआत में कितने पद थे?

UPPSC के 2013 के विज्ञापन में कुल 6628 रिक्तियां घोषित की गई थीं। मूल विज्ञापन में श्रेणीवार पद इस प्रकार थे:

श्रेणीपद
अनारक्षित3616
अनुसूचित जाति2211
अनुसूचित जनजाति235
अन्य पिछड़ा वर्ग566
कुल6628

इसके अलावा क्षैतिज आरक्षण के तहत महिलाओं, दिव्यांग अभ्यर्थियों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रितों और पूर्व सैनिकों के लिए भी पद निर्धारित किए गए थे।

लिखित परीक्षा 30 मार्च 2014 को हुई और बाद में चयन प्रक्रिया आगे बढ़ी। लेकिन इसी दौरान भर्ती की सबसे बड़ी समस्या सामने आई।

विवाद की असली वजह क्या थी?

पूरे विवाद की जड़ श्रेणीवार रिक्तियों की गलत गणना थी।

सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार कृषि विभाग में प्राविधिक सहायक ग्रेड-III के पदों की कुल स्वीकृत संख्या 10,531 थी। विभागीय गणना के समय काम कर रहे कर्मचारियों और आरक्षण की श्रेणीवार स्थिति का हिसाब लगाया गया। बाद में यह सामने आया कि खासतौर पर OBC रिक्तियों की संख्या गलत तरीके से बहुत कम दिखाई गई थी।

2013 के विज्ञापन में OBC के लिए सिर्फ 566 पद दिखाए गए थे, जबकि विभाग के दोबारा हिसाब के अनुसार OBC श्रेणी में वास्तविक रिक्तियों की संख्या 2030 तक पहुंचती थी। सरकार ने यह भी बताया कि पहले की गणना में कुछ ऐसे डिप्लोमा धारक कर्मचारियों को गलत तरीके से OBC के हिस्से में गिना गया था, जिन्हें नियमानुसार सामान्य श्रेणी में गिना जाना था।

इसके बाद 20 अगस्त 2014 को सरकार ने संशोधित रिक्विजिशन जारी किया। नई श्रेणीवार स्थिति थी:

  • अनारक्षित – 2515

  • SC – 1882

  • ST – 201

  • OBC – 2030

  • कुल – 6628

यहीं से भर्ती में बड़ा मोड़ आया, क्योंकि लिखित परीक्षा के बाद अलग-अलग श्रेणियों के लिए विचाराधीन पदों की संख्या बदल गई।

लिखित परीक्षा के बाद बदली गई संख्या ने विवाद बढ़ा दिया

15 सितंबर 2014 को UPPSC ने लिखित परीक्षा का परिणाम जारी किया। इसके बाद 12 अक्टूबर 2014 को संशोधित श्रेणीवार रिक्तियों के आधार पर अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। इंटरव्यू 27 अक्टूबर 2014 से शुरू हुए और अंतिम परिणाम 21 मई 2015 को घोषित किया गया।

यहीं कुछ अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि चयन प्रक्रिया के बीच में पदों की श्रेणीवार संख्या बदलना नियमों के खिलाफ था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2017 में इस दलील को स्वीकार करते हुए बाद की चयन प्रक्रिया को निरस्त कर दिया था। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि विज्ञापन निकलने के बाद रिक्तियों का ऐसा पुनर्विन्यास सामान्य और आरक्षित श्रेणियों के उम्मीदवारों के अवसरों को प्रभावित करता है।

लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ।

6599 अभ्यर्थियों का चयन, लेकिन नियुक्ति किसे मिली?

सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार इंटरव्यू के बाद UPPSC ने कुल 6599 अभ्यर्थियों की सिफारिश की थी। 29 अभ्यर्थियों का परिणाम अलग से रोका गया था।

इसके बाद 30 जनवरी 2016 को नियुक्ति आदेश जारी किए गए। न्यायालय के रिकॉर्ड में संख्या बिल्कुल स्पष्ट है:

कृषि विभाग ने 5669 अभ्यर्थियों को नियुक्ति आदेश जारी किए।

श्रेणीवार नियुक्ति आदेश इस प्रकार थे:

श्रेणीनियुक्ति आदेश
अनारक्षित2478
SC1385
ST22
OBC1784
कुल5669

इसके अलावा 24 अभ्यर्थियों के नियुक्ति आदेश UPPSC द्वारा दस्तावेज रोके जाने के कारण जारी नहीं हुए। इस तरह 5693 अभ्यर्थियों की स्थिति रिकॉर्ड में नियुक्ति के स्तर तक पहुंची, जबकि 906 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया।

यही वह आंकड़ा है जिसे लेकर वर्षों तक अभ्यर्थी आंदोलन करते रहे।

906 अभ्यर्थी आखिर क्यों रह गए नियुक्ति से वंचित?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में इस सवाल का सीधा जवाब मौजूद है।

इन 906 अभ्यर्थियों को नियुक्ति इसलिए नहीं दी गई क्योंकि वे अपनी-अपनी श्रेणी में अंतिम चयनित उम्मीदवार के मुकाबले मेरिट में नीचे थे, और संशोधित आरक्षण व्यवस्था के कारण उस सीमा के बाद नियुक्ति करना वैधानिक आरक्षण सीमा से बाहर चला जाता। अदालत ने माना कि संशोधित रिक्विजिशन स्वयं आरक्षण की अनुमत सीमा से अधिक था और यदि इन 906 को भी नियुक्त कर दिया जाता तो यह वैधानिक सीमा का उल्लंघन होता।

अर्थात यह केवल “पद खाली होने” का मामला नहीं था। असली समस्या यह थी कि विज्ञापित 6628 पदों की श्रेणीवार गणना और बाद में लागू की गई आरक्षण व्यवस्था के बीच ऐसा बदलाव हुआ, जिससे चयनित अभ्यर्थियों की एक अतिरिक्त संख्या तैयार हो गई।

हाईकोर्ट के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

इस विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 10 फरवरी 2017 को भर्ती की लिखित परीक्षा के बाद की पूरी चयन प्रक्रिया को निरस्त कर दिया था और नए सिरे से प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया था। उस समय नियुक्त हो चुके अभ्यर्थियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने 30 सितंबर 2019 को हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। अदालत ने माना कि विभाग द्वारा गलत श्रेणीवार गणना को ठीक करने के लिए संशोधित रिक्विजिशन भेजना अपने आप में “चयन प्रक्रिया के बीच नियम बदलना” नहीं माना जा सकता, बशर्ते वह आरक्षण कानून और सेवा नियमों के अनुरूप हो।

लेकिन 906 अभ्यर्थियों के लिए फैसला पूरी तरह राहत देने वाला नहीं था।

906 को सीधी नियुक्ति नहीं, मिला अगली भर्ती का रास्ता

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अदालत Article 142 का इस्तेमाल करके 906 अभ्यर्थियों को सीधे नियुक्ति देने का आदेश नहीं दे सकती, क्योंकि ऐसा करना आरक्षण की वैधानिक सीमा के विपरीत होगा।

हालांकि अदालत ने इन अभ्यर्थियों और संबंधित याचिकाकर्ताओं को एक बार की विशेष आयु-सीमा छूट देकर आगामी भर्ती में शामिल होने का रास्ता दिया। इसका मतलब यह था कि 2013 की भर्ती के कारण उम्र सीमा पार कर चुके ये अभ्यर्थी पूरी तरह बाहर नहीं होंगे, बल्कि अगली भर्ती में दोबारा मौका पा सकेंगे।

फिर शुरू हुआ दूसरी भर्ती का लंबा इंतजार

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद 906 अभ्यर्थियों की समस्या तुरंत खत्म नहीं हुई। नई भर्ती के लिए UPPSC और UPSSSC के बीच अभ्यर्थियों के पुराने डेटा के आदान-प्रदान को लेकर लंबे समय तक खींचतान चली।

2023 में रिपोर्ट सामने आई कि करीब 3446 पदों पर नई कृषि प्राविधिक सहायक भर्ती प्रस्तावित है और इसमें 2013 के उन 906 अभ्यर्थियों को भी शामिल किया जाना है जो कानूनी विवाद के कारण नियुक्त नहीं हो सके थे। उन्हें आयु सीमा में छूट और PET से विशेष राहत देने की प्रक्रिया पर काम हुआ।

मामला इतना पेचीदा हो गया कि कई बार UPPSC द्वारा डेटा भेजे जाने के बाद भी UPSSSC ने निर्धारित प्रारूप में डेटा नहीं मिलने की बात कही। इससे नई भर्ती का विज्ञापन भी कई महीनों तक अटका रहा।

2024-25 की भर्ती में 2013 के वंचित अभ्यर्थियों को फिर मौका

मार्च 2024 में UPSSSC ने कृषि प्राविधिक सहायक ग्रुप-सी के 3446 पदों के लिए मुख्य परीक्षा की प्रक्रिया शुरू की। रिपोर्टों के अनुसार इसमें 2013 की भर्ती से जुड़े 2384 पुराने अभ्यर्थियों को भी विशेष अवसर दिया गया, जिनमें 906 ऐसे अभ्यर्थी थे जिनका चयन होने के बाद भी ज्वाइनिंग नहीं हो सकी थी। इन अभ्यर्थियों को आयु सीमा में छूट के साथ PET से भी राहत दी गई।

यह बिंदु बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2013 में वंचित हुए 906 अभ्यर्थियों को सरकार ने सीधे पुराने 6628 पदों पर नियुक्त नहीं किया। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप नई भर्ती प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा करने का अवसर दिया गया।

3446 पदों वाली भर्ती का परिणाम भी आ चुका है

अब कहानी 2026 तक पहुंच चुकी है।

UPSSSC ने 3446 पदों वाली इस भर्ती का अंतिम चयन परिणाम 23 जून 2026 को घोषित किया। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार कुल 3446 उम्मीदवारों का चयन हुआ। श्रेणीवार आंकड़े बताए गए:

  • अनारक्षित – 1813

  • SC – 509

  • ST – 151

  • OBC – 629

  • EWS – 344

इनका कुल योग 3446 है। भर्ती परीक्षा 13 जुलाई 2025 को आयोजित हुई थी।

इससे यह साफ है कि 2013 के विवाद के कारण शुरू हुई दूसरी राह आखिरकार नई भर्ती के परिणाम तक पहुंची।

लेकिन क्या 906 में से सभी को नौकरी मिल गई?

यहां सबसे जरूरी सावधानी बरतना जरूरी है।

उपलब्ध सार्वजनिक और विश्वसनीय रिकॉर्ड से यह प्रमाणित नहीं होता कि 2013 में नियुक्ति से वंचित हुए सभी 906 अभ्यर्थियों में से कितने उम्मीदवारों ने 3446 पदों वाली नई भर्ती में परीक्षा पास की और कितनों को अंततः नियुक्ति मिली।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि “906 सभी को नौकरी मिल गई” या “906 आज भी सभी बेरोजगार हैं।”

जो तथ्य अदालत और बाद की भर्ती संबंधी रिपोर्टों से निश्चित रूप से सामने आते हैं, वे यह हैं:

2013 की मूल भर्ती में 906 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र नहीं मिला था।
सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें उसी भर्ती में सीधे नियुक्त करने से इनकार किया था।
उन्हें अगली भर्ती में एक बार आयु छूट के साथ भाग लेने का अवसर दिया गया।
बाद में 3446 पदों की नई भर्ती में उन्हें शामिल करने की व्यवस्था की गई।
23 जून 2026 को उस भर्ती का अंतिम चयन परिणाम जारी हो चुका है।
लेकिन 2013 के उन्हीं 906 अभ्यर्थियों की अलग से अंतिम सफलता/नियुक्ति संख्या का सार्वजनिक, आधिकारिक आंकड़ा मुझे उपलब्ध रिकॉर्ड में नहीं मिला।

आंकड़ों का पूरा हिसाब

पूरे मामले को सरल तरीके से समझें तो कहानी इस प्रकार है:

6628 — 2013 में विज्ञापित कुल पद।

6599 — इंटरव्यू के बाद UPPSC द्वारा अनुशंसित उम्मीदवार।

29 — जिनका परिणाम UPPSC ने रोक रखा था।

5669 — जिन्हें कृषि विभाग की ओर से वास्तव में नियुक्ति आदेश जारी किए गए।

24 — जिनके दस्तावेज UPPSC के पास रोके होने के कारण नियुक्ति आदेश जारी नहीं हुआ।

906 — जिनकी नियुक्ति नहीं हो सकी और जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने बाद की भर्ती में एक बार आयु छूट के साथ अवसर देने का रास्ता दिया।

2013 की भर्ती में सबसे बड़ी प्रशासनिक गलती क्या थी?

इस पूरे मामले से तीन बड़े कारण सामने आते हैं।

1. श्रेणीवार रिक्तियों की गलत गणना

मूल विज्ञापन में OBC के लिए केवल 566 पद दिखाए गए, जबकि विभागीय समीक्षा में वास्तविक आंकड़ा 2030 निकाला गया। इस गलती ने पूरे चयन के सामाजिक और कानूनी समीकरण को बदल दिया।

2. भर्ती प्रक्रिया के बीच श्रेणीवार रिक्तियों का पुनर्गठन

लिखित परीक्षा के बाद संशोधित रिक्विजिशन के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में इंटरव्यू के अवसर बदल गए। यही कदम विवाद की मुख्य वजहों में से एक बना। हाईकोर्ट ने इसे लेकर कड़ी आपत्ति जताई थी, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बाद में सरकार की संशोधित गणना को नियमों के अनुरूप माना।

3. 906 अभ्यर्थियों के भविष्य पर लंबा कानूनी असर

इन उम्मीदवारों ने परीक्षा और इंटरव्यू पूरा किया, लेकिन नियुक्ति नहीं मिल सकी। बाद में उन्हें सीधे नियुक्ति के बजाय नई भर्ती में प्रतिस्पर्धा करने के लिए भेज दिया गया। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह रहा कि जो अभ्यर्थी 2013 में चयन प्रक्रिया में शामिल हुए थे, उन्हें अपनी सरकारी नौकरी के लिए कई साल बाद दोबारा परीक्षा का सामना करना पड़ा।

2026 में इस मामले की स्थिति क्या है?

20 अगस्त 2026 तक उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति यह है कि 2013 की 6628 पदों वाली मूल भर्ती का अंतिम कानूनी विवाद सुप्रीम कोर्ट के 30 सितंबर 2019 के फैसले से तय हो चुका था। 906 अभ्यर्थियों को उसी भर्ती में सीधे नियुक्त करने का अधिकार नहीं दिया गया, लेकिन उन्हें आगामी भर्ती में एक बार विशेष आयु छूट के साथ मौका देने का निर्देश हुआ।

इसके बाद 3446 पदों वाली भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ी और उसका अंतिम परिणाम 23 जून 2026 को जारी कर दिया गया।

इसलिए आज सबसे सही निष्कर्ष यह है कि:

2013 की भर्ती में 5669 अभ्यर्थियों को नियुक्ति आदेश मिले थे, जबकि 906 अभ्यर्थी नियुक्ति से वंचित रह गए थे।

लेकिन 2026 में उन 906 में से कितनों को नई भर्ती के माध्यम से अंततः सरकारी नौकरी मिली, इसका अलग और सत्यापित आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं दिखता। इसलिए “आज भी 906 ही वंचित हैं” कहना भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी

दस साल से अधिक समय से चल रही इस कहानी का सबसे दर्दनाक पहलू यही है कि एक भर्ती में पदों की संख्या, आरक्षण की गणना और प्रशासनिक रिकॉर्ड के विवाद का असर अभ्यर्थियों के पूरे करियर पर पड़ा। जिन युवाओं ने 2013 में आवेदन किया था, उनमें से कई को न्याय पाने के लिए पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पुरानी भर्ती में सीधे नियुक्ति नहीं दी, बल्कि नई भर्ती में अवसर देकर मामला आगे बढ़ाया। 2026 में 3446 पदों का परिणाम आ जाने के बाद अब वास्तविक तस्वीर तभी पूरी तरह साफ होगी जब सरकार या UPSSSC यह सार्वजनिक करे कि 2013 के उन 906 वंचित अभ्यर्थियों में से कितने नई भर्ती में शामिल हुए, कितने सफल हुए और कितनों को अंतिम नियुक्ति मिली। जबकि सभी नियुक्ति के अधिकारी हैं 

यही वह आंकड़ा है जिसकी प्रतीक्षा अब भी इस पुराने भर्ती विवाद की अंतिम तस्वीर को पूरा करने के लिए जरूरी है।

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