चीनी के दाम अचानक क्यों भड़के? इथेनॉल नहीं है असली वजह, सरकार ने बताई वो कहानी जिसने सबको चौंका दिया!
नई दिल्ली: देश में चीनी की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। चाय से लेकर मिठाइयों तक हर जगह इस्तेमाल होने वाली चीनी के दाम पिछले कुछ हफ्तों में तेजी से ऊपर गए हैं। इसी बीच यह सवाल भी उठने लगा कि क्या चीनी के बढ़ते दामों के पीछे सरकार की इथेनॉल नीति और गन्ने से इथेनॉल बनाने के लिए चीनी का डायवर्जन जिम्मेदार है?
केंद्र सरकार ने इस सवाल पर स्थिति साफ करते हुए कहा है कि चीनी की मौजूदा कीमत बढ़ोतरी को केवल इथेनॉल उत्पादन से जोड़ना सही नहीं है। सरकार के अनुसार, इसके पीछे घरेलू उत्पादन में कमी, मौसम की मार, गन्ने की फसल में बीमारी, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, वैश्विक बाजार में सप्लाई की तंगी और कुछ मामलों में जमाखोरी या सट्टेबाजी जैसे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं।
एक महीने में करीब 16 फीसदी बढ़े चीनी के दाम
चीनी की कीमतों में हालिया तेजी ने बाजार को अचानक गर्म कर दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक, 20 जुलाई को चीनी की औसत कीमत करीब ₹48.18 प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर लगभग ₹55.70 प्रति किलो पहुंच गई। यानी करीब एक महीने में लगभग 16 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली।
इस तेजी का असर केवल थोक बाजार तक सीमित नहीं है। खुदरा बाजार में भी कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। आने वाले महीनों में गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहार हैं, जिनके दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों में चीनी की मांग बढ़ जाती है।
यही वजह है कि सरकार कीमतों को लेकर पहले से ही सतर्क हो गई है।
क्या इथेनॉल की वजह से महंगी हुई चीनी?
चीनी की कीमत बढ़ने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इथेनॉल को लेकर हुई। तर्क दिया गया कि अगर गन्ने से बनी चीनी का एक हिस्सा इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल हो रहा है तो बाजार में चीनी की उपलब्धता कम हो सकती है और इससे कीमत बढ़ सकती है।
लेकिन केंद्र सरकार ने इस दावे को खारिज किया है। सरकार के मुताबिक, मौजूदा कीमत वृद्धि को इथेनॉल डायवर्जन के कारण बताना सही नहीं है।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, मौजूदा सीजन में इथेनॉल उत्पादन के लिए करीब 28 लाख टन चीनी डायवर्ट की गई है, जबकि 2022-23 में यह मात्रा करीब 43 लाख टन थी। यानी इस साल इथेनॉल के लिए डायवर्ट की गई चीनी पहले के मुकाबले कम है।
सरकार का कहना है कि इसलिए मौजूदा तेजी को केवल इथेनॉल नीति से जोड़ना तथ्यों के अनुरूप नहीं है।
असली वजह बनी चीनी का कम उत्पादन
सरकार के अनुसार, मौजूदा संकट का सबसे बड़ा कारण घरेलू चीनी उत्पादन में अपेक्षा से ज्यादा गिरावट है।
2025-26 सीजन के लिए शुरुआत में चीनी उत्पादन का अनुमान करीब 343 लाख टन लगाया गया था। अब यह अनुमान घटकर करीब 306 लाख टन रह गया है। यानी शुरुआती अनुमान की तुलना में उत्पादन लगभग 11 फीसदी कम रहने की संभावना है।
उत्पादन में इस कमी का सीधा असर बाजार की धारणा पर पड़ा। जब बाजार को लगा कि आगे उपलब्धता पहले के अनुमान के मुकाबले कम हो सकती है, तो कीमतों पर दबाव बढ़ गया।
बारिश ने गन्ने की फसल को पहुंचाया नुकसान
चीनी उत्पादन में कमी के पीछे मौसम भी एक महत्वपूर्ण कारण बताया जा रहा है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में पिछले साल सितंबर-अक्टूबर के दौरान अत्यधिक बारिश ने फसल को प्रभावित किया।
इसके अलावा गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों तथा जलभराव की समस्या का भी असर उत्पादन पर पड़ा। इन कारणों से गन्ने की पैदावार और उससे बनने वाली चीनी दोनों पर दबाव आया।
यानी चीनी के दामों की कहानी केवल बाजार की मांग से जुड़ी नहीं है। इसके पीछे खेतों में हुई फसल की क्षति भी एक बड़ा कारण है।
त्योहारों से पहले बढ़ रही है मांग
भारत में त्योहारों का सीजन चीनी की खपत बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण समय होता है। गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के दौरान मिठाइयों, बेकरी उत्पादों और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ती है।
इस बार कीमतों में तेजी ऐसे समय आई है जब त्योहारों का सीजन नजदीक है। बाजार में भविष्य की मांग को लेकर पहले से ही दबाव बन रहा है। सरकार ने भी इसी वजह से कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए अतिरिक्त कदम उठाए हैं।
अगर आने वाले दिनों में मांग तेजी से बढ़ती है और नई चीनी की उपलब्धता सीमित रहती है तो कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
वैश्विक बाजार में भी चीनी की सप्लाई तंग
भारत अकेला देश नहीं है जहां चीनी बाजार पर दबाव है। सरकार के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर भी चीनी की उपलब्धता को लेकर दबाव है।
खराब मौसम ने कई प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में फसल की संभावनाओं को प्रभावित किया है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी की कीमतों में तेजी आई है। रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमत करीब 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई।
वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने का असर भारत जैसे बड़े बाजार पर भी पड़ सकता है, खासकर तब जब घरेलू उत्पादन अनुमान से कम हो।
सरकार ने उठाया 10 लाख टन आयात का बड़ा कदम
बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने करीब 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह फैसला लगभग एक दशक बाद भारत के चीनी आयात की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति 31 अक्टूबर तक दी गई है। सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में अतिरिक्त सप्लाई लाना और त्योहारों से पहले कीमतों पर दबाव कम करना है।
सरकार को उम्मीद है कि अतिरिक्त चीनी बाजार में आने से उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों में तेजी पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
जमाखोरी और कागजों पर स्टॉक को लेकर भी सख्ती
सरकार ने केवल आयात का रास्ता नहीं अपनाया है। चीनी के स्टॉक को लेकर भी सख्ती बढ़ाई गई है।
बल्क यूजर्स के लिए सितंबर से नवंबर तक स्टॉक रखने की सीमा तय की गई है। इसके अलावा डीलरों पर भी स्टॉक सीमा से जुड़े प्रतिबंध लागू किए गए हैं। सरकार ने राज्यों को जमाखोरी, कालाबाजारी और सट्टेबाजी के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा है।
सरकारी अधिकारियों ने यह चिंता भी जताई है कि कुछ मिलें कागजों पर चीनी बिकने की जानकारी दिखा रही हैं, लेकिन वास्तविक बाजार में स्टॉक जारी नहीं किया जा रहा। इससे कृत्रिम कमी का माहौल बन सकता है।
अक्टूबर से शुरू हो सकती है नई पेराई
चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने चीनी मिलों को नई पेराई जल्द शुरू करने की तैयारी करने को कहा है। मौजूदा योजना के अनुसार कुछ क्षेत्रों में पेराई करीब 15 अक्टूबर से शुरू हो सकती है।
सरकार का अनुमान है कि सितंबर के अंत तक देश में करीब 33-35 लाख टन चीनी का क्लोजिंग स्टॉक रह सकता है। अक्टूबर में नई पेराई शुरू होने के बाद अतिरिक्त चीनी बाजार में आनी शुरू हो जाएगी।
इससे सरकार को उम्मीद है कि त्योहारी मांग के बीच घरेलू बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिलेगी।
इथेनॉल नीति पर सरकार का क्या तर्क है?
सरकार का कहना है कि इथेनॉल कार्यक्रम को केवल चीनी की कीमतों के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। अधिकारियों के मुताबिक, जब चीनी का उत्पादन जरूरत से ज्यादा होता था तो मिलों के पास अतिरिक्त स्टॉक जमा हो जाता था। इससे मिलों की वित्तीय स्थिति प्रभावित होती थी और किसानों को गन्ने का भुगतान मिलने में देरी होती थी।
इथेनॉल के लिए अतिरिक्त चीनी का उपयोग करने से मिलों को अतिरिक्त बाजार मिला और उनकी वित्तीय स्थिति मजबूत हुई। सरकार के मुताबिक, 2025-26 सीजन के करीब 97 फीसदी गन्ना बकाया भुगतान किसानों को किया जा चुका है।
इसलिए सरकार का तर्क है कि इथेनॉल कार्यक्रम को चीनी की मौजूदा कीमत बढ़ोतरी का अकेला कारण बताना उचित नहीं है।
अब आम आदमी को कब मिलेगी राहत?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि चीनी की कीमतें आखिर कब नीचे आएंगी। इसका जवाब कई बातों पर निर्भर करेगा। अगर शुल्क-मुक्त आयात की चीनी समय पर बाजार में आती है, जमाखोरी पर कार्रवाई होती है और अक्टूबर में नई पेराई समय पर शुरू होती है तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
दूसरी तरफ, अगर त्योहारी मांग उम्मीद से ज्यादा बढ़ती है या वैश्विक बाजार में कीमतों का दबाव बना रहता है तो राहत आने में समय लग सकता है।
फिलहाल सरकार का दावा है कि देश में घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और हालिया कीमत वृद्धि के पीछे इथेनॉल डायवर्जन को मुख्य कारण बताना सही नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, कम उत्पादन, मौसम से फसल को नुकसान, त्योहारों की बढ़ती मांग, वैश्विक सप्लाई की तंगी और संभावित जमाखोरी—इन सभी ने मिलकर चीनी बाजार पर दबाव बनाया है।
यानी चीनी की मिठास महंगी होने की कहानी सिर्फ इथेनॉल तक सीमित नहीं है। खेत से लेकर बाजार और वैश्विक सप्लाई चेन तक कई कड़ियां इस समय कीमतों को प्रभावित कर रही हैं। अब सरकार के आयात और स्टॉक नियंत्रण जैसे कदम कितनी जल्दी असर दिखाते हैं, इस पर आम उपभोक्ताओं और चीनी कारोबारियों दोनों की नजर बनी हुई है।

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