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ईरान पर ट्रंप की ‘आखिरी चाल’ से क्यों कांप उठा रूस? खार्ग द्वीप पर कब्जे की खबर ने मचा दी खलबली!

 


नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव अब उस मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां हर अगला कदम पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं और इसी क्रम में ईरान के रणनीतिक खार्ग द्वीप को लेकर अमेरिकी विकल्पों की चर्चा ने सबसे ज्यादा चिंता पैदा की है।

खार्ग द्वीप ईरान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश के कच्चे तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र के टर्मिनलों से होकर गुजरता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने पहले भी इस द्वीप पर कब्जे की संभावना की बात सार्वजनिक रूप से कही थी। जून में ट्रंप ने खार्ग द्वीप और दूसरे तेल ढांचों को अपने नियंत्रण में लेने की धमकी तक दी थी। हालांकि बाद में उन्होंने तत्काल कार्रवाई को टाल दिया।

अब सवाल यह है कि अगर अमेरिका एक बार फिर जमीन पर सैनिक उतारने का विकल्प अपनाता है, तो क्या यह युद्ध को खत्म करने के बजाय और ज्यादा खतरनाक बना देगा?

ट्रंप के सामने खार्ग द्वीप क्यों बना बड़ा विकल्प?

फारस की खाड़ी में स्थित खार्ग द्वीप ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है। यहां मौजूद तेल भंडारण और निर्यात सुविधाओं के कारण यह द्वीप ईरान के ऊर्जा तंत्र की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में गिना जाता है।

इसी वजह से अमेरिकी रणनीतिकारों के लिए खार्ग द्वीप पर नियंत्रण हासिल करने का विचार आकर्षक दिखाई दे सकता है। अगर अमेरिका इस क्षेत्र की तेल निर्यात क्षमता को बाधित करता है, तो ईरान की आर्थिक स्थिति पर भारी दबाव पड़ सकता है।

लेकिन सैन्य विशेषज्ञों के लिए यही योजना सबसे ज्यादा जोखिम वाली भी है। मार्च 2026 में सामने आए विश्लेषणों के मुताबिक अमेरिकी प्रशासन खार्ग द्वीप पर जमीनी कार्रवाई की संभावना पर विचार कर रहा था। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि द्वीप पर हमला या कब्जा करने की कोशिश अमेरिकी सैनिकों को भारी खतरे में डाल सकती है और युद्ध को लंबा खींच सकती है।

यानी जिस ऑपरेशन को ईरान को जल्दी झुकाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, वही अमेरिका के लिए एक बेहद कठिन सैन्य अभियान में बदल सकता है।

अमेरिका पहले ही खार्ग पर हमला कर चुका है

खार्ग द्वीप को लेकर अमेरिकी दबाव केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा है। मार्च 2026 में अमेरिका ने द्वीप पर सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर हवाई हमला किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान के मुताबिक उस कार्रवाई में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, जबकि तेल ढांचे को नष्ट नहीं किया गया।

इसके बाद जून में ट्रंप ने फिर से खार्ग द्वीप पर कब्जा करने की संभावना जताई। उन्होंने कहा था कि अमेरिका भविष्य में द्वीप और दूसरे तेल ढांचों पर नियंत्रण हासिल कर सकता है। हालांकि उसी दौरान उन्होंने यह भी संकेत दिया कि बड़े पैमाने पर जमीन पर सैनिक भेजने को लेकर अमेरिका के भीतर सीमाएं और राजनीतिक जोखिम मौजूद हैं।

इससे साफ है कि खार्ग द्वीप अमेरिकी रणनीति में केवल एक काल्पनिक विकल्प नहीं है, बल्कि युद्ध के दौरान गंभीरता से चर्चा में रहा सैन्य विकल्प है।

रूस क्यों है अमेरिका के इस कदम से चिंतित?

ईरान के खिलाफ अमेरिकी जमीनी कार्रवाई का सबसे बड़ा खतरा केवल अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध तक सीमित नहीं रहेगा। इससे रूस समेत कई क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों की रणनीति प्रभावित हो सकती है।

रूस लंबे समय से ईरान के साथ राजनीतिक और रणनीतिक संबंध रखता है। ऐसे में अगर अमेरिकी सेना ईरानी जमीन पर बड़े पैमाने पर उतरती है, तो मॉस्को पर भी अपनी नीति स्पष्ट करने का दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि, सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में रूसी विदेश नीति विशेषज्ञ मिखाइल मार्गेलोव के नाम से अमेरिका को बेहद कड़ी चेतावनी दिए जाने का दावा किया गया है। इस कथित बयान की स्वतंत्र और विश्वसनीय पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हो सकी है, इसलिए इसे रूस सरकार की आधिकारिक धमकी के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।

फिर भी रूस की व्यापक रणनीतिक चिंता वास्तविक है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जितना लंबा चलेगा, उतना ही पश्चिम एशिया में रूस, चीन, खाड़ी देशों और अन्य शक्तियों के हित प्रभावित होंगे।

ईरान में बढ़ सकता है ‘रैली अराउंड द फ्लैग’ प्रभाव

ईरान पर बाहरी सैन्य दबाव का एक अप्रत्याशित राजनीतिक असर भी हो सकता है।

आमतौर पर आर्थिक संकट, प्रतिबंध और सरकार पर सैन्य दबाव किसी देश में आंतरिक असंतोष को बढ़ा सकते हैं। लेकिन जब किसी देश को सीधे विदेशी सैन्य हमले का सामना करना पड़ता है, तो कई बार जनता का एक हिस्सा सरकार के साथ खड़ा हो जाता है।

इसे राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ‘रैली अराउंड द फ्लैग’ प्रभाव कहा जाता है।

ईरान में भी अमेरिका के साथ टकराव बढ़ने की स्थिति में ऐसा प्रभाव देखने को मिल सकता है। सरकार की नीतियों से असहमति रखने वाले लोगों के सामने भी जब राष्ट्रीय संप्रभुता और विदेशी सैन्य हस्तक्षेप का सवाल आता है, तो राजनीतिक प्राथमिकताएं बदल सकती हैं।

यही वजह है कि जमीन पर सैनिक उतारना अमेरिका के लिए केवल सैन्य चुनौती नहीं होगा। यह ईरान के भीतर राष्ट्रवादी भावना को भी मजबूत कर सकता है।

ईरान की भौगोलिक स्थिति बनेगी सबसे बड़ी चुनौती

ईरान पर जमीनी हमला किसी छोटे सैन्य अभियान जैसा नहीं होगा।

देश का विशाल भूगोल, पहाड़ी क्षेत्र, लंबी तटरेखा और बड़े शहर किसी भी विदेशी सेना के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर सकते हैं। खार्ग द्वीप पर कार्रवाई भी समुद्र, वायु और जमीन—तीनों स्तरों पर जटिल सैन्य समन्वय की मांग करेगी।

यही कारण है कि अमेरिकी सैन्य अधिकारियों और रणनीतिक विशेषज्ञों के लिए खार्ग पर कब्जे की योजना आसान विकल्प नहीं मानी जाती।

मार्च में प्रकाशित विश्लेषणों में भी यह बात सामने आई थी कि द्वीप पर कब्जे की कार्रवाई संभव होने के बावजूद अमेरिकी सैनिकों के लिए बेहद जोखिमपूर्ण हो सकती है और युद्ध को छोटा करने के बजाय लंबा कर सकती है।

तेल पर हमला पड़ा तो दुनिया पर पड़ेगा असर

खार्ग द्वीप का मामला केवल ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं है।

ईरान के तेल निर्यात पर असर पड़ने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा झटका लग सकता है। इसके अलावा फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा कोई भी बड़ा सैन्य संकट तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक महंगाई पर असर डाल सकता है।

हाल के घटनाक्रमों में होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट और बीमा लागत में तेज वृद्धि देखी गई है। इससे पता चलता है कि संघर्ष का आर्थिक असर पहले ही सीमा पार कर चुका है।

अगर खार्ग द्वीप पर व्यापक जमीनी कार्रवाई होती है और इसके बाद ईरान खाड़ी क्षेत्र की ऊर्जा सुविधाओं को निशाना बनाता है, तो संकट कई देशों तक फैल सकता है।

ट्रंप के सामने सबसे बड़ा सवाल

ट्रंप प्रशासन के सामने अब मूल सवाल यह है कि ईरान पर कितना दबाव डाला जाए और किस बिंदु पर सैन्य कार्रवाई का जोखिम फायदे से ज्यादा हो जाए।

खार्ग द्वीप पर कब्जे से अमेरिका ईरान की अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव बना सकता है, लेकिन इसके बदले उसे बड़ी संख्या में सैनिकों को खतरे में डालना पड़ सकता है। इसके अलावा ईरान की प्रतिक्रिया केवल अमेरिकी ठिकानों तक सीमित रहेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

ईरान पहले ही खाड़ी देशों को चेतावनी दे चुका है कि अगर अमेरिका उसके खिलाफ नए हमले करता है तो क्षेत्र की ऊर्जा सुविधाएं निशाने पर आ सकती हैं। इससे साफ है कि किसी बड़े अमेरिकी हमले का असर पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैलने का खतरा मौजूद है।

मिडटर्म चुनाव भी बन सकते हैं राजनीतिक चुनौती

अमेरिका में 2026 के मिडटर्म चुनाव भी ट्रंप प्रशासन की रणनीति पर असर डाल सकते हैं। लंबी चलने वाली जंग, बढ़ती सैन्य लागत, तेल की कीमतों में उछाल और अमेरिकी सैनिकों के संभावित नुकसान का राजनीतिक असर घरेलू राजनीति में दिखाई दे सकता है।

हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि ट्रंप केवल चुनावी कारणों से ईरान में जमीनी कार्रवाई का फैसला करेंगे। लेकिन जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचता है, सैन्य रणनीति और घरेलू राजनीति के बीच संबंध जरूर महत्वपूर्ण होता जाता है।

क्या अमेरिका सच में जमीन पर उतरेगा?

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि खार्ग द्वीप पर अमेरिकी कब्जे की संभावना को लेकर कई बार चर्चा और धमकियां सामने आई हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि व्यापक जमीनी हमला निश्चित है।

जून में ट्रंप ने खार्ग पर कब्जे की बात कही थी, लेकिन बाद में हमले को लेकर अपना रुख बदला और बातचीत की संभावना भी सामने आई।

यही अनिश्चितता इस पूरे संकट को और खतरनाक बनाती है।

अगर अमेरिका सीमित हवाई और नौसैनिक कार्रवाई तक रहता है, तो संघर्ष एक अलग दिशा में जा सकता है। लेकिन अगर अमेरिकी सेना बड़े पैमाने पर ईरानी क्षेत्र में प्रवेश करती है, तो युद्ध की प्रकृति पूरी तरह बदल सकती है।

ईरान युद्ध अब केवल दो देशों के बीच सैन्य टकराव नहीं रह गया है। खार्ग द्वीप, होर्मुज जलडमरूमध्य, तेल बाजार और रूस जैसे बड़े खिलाड़ियों के हित इस संघर्ष को वैश्विक संकट में बदलने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में ट्रंप का अगला फैसला बेहद महत्वपूर्ण होगा—क्योंकि ईरान पर दबाव बढ़ाने की एक चाल अमेरिका के लिए निर्णायक जीत भी बन सकती है और एक लंबे, महंगे और बेहद खतरनाक युद्ध का दरवाजा भी खोल सकती है।

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