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चाय के लिए रुकी गाड़ी… और कुछ मिनट बाद सामने था मौत का मंजर! नेपाल की बाढ़ में ऐसे बची बर्दवान के शिक्षक की जान



नेपाल में आई भीषण बाढ़ और अचानक आए मलबे के तेज बहाव ने कई लोगों को खौफनाक अनुभव दिया। इसी भयावह मंजर के बीच पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्दवान के रहने वाले एक स्कूल शिक्षक कल्याण कुमार ता की कहानी सामने आई है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकले कल्याण शायद इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि उनकी धार्मिक यात्रा के दौरान कुछ मिनटों का एक छोटा-सा ठहराव उनकी जिंदगी और मौत के बीच का अंतर बन जाएगा।

नेपाल की यात्रा के दौरान उनकी गाड़ी बिदुर के पास चाय पीने के लिए रुकी थी। यह रुकना महज एक सामान्य पड़ाव था, लेकिन कुछ ही देर बाद उसी इलाके में पहाड़ से अचानक तेज बहाव और मलबा नीचे आने लगा। देखते ही देखते घर, वाहन और पुल पानी तथा कीचड़ के तेज बहाव की चपेट में आने लगे। जिस जगह से कुछ देर पहले लोग सामान्य रूप से गुजर रहे थे, वहां अचानक तबाही का ऐसा मंजर दिखाई देने लगा जिसे देखकर हर कोई दहशत में आ गया।

कल्याण के मुताबिक, उन्होंने अपनी आंखों के सामने पहाड़ से उतरते मलबे और तेज बहाव में घरों तथा गाड़ियों को बहते हुए देखा। करीब डेढ़ घंटे तक वह और उनके साथ मौजूद लोग एक ऊंची जगह पर खड़े होकर इस खौफनाक स्थिति को देखते रहे। उनके लिए यह अनुभव जिंदगी भर न भूल पाने वाली एक ऐसी याद बन गया है, जिसे सामान्य होने में शायद काफी समय लगेगा।

21 अगस्त को शुरू हुई थी कैलाश मानसरोवर यात्रा

मीडिया में सामने आई जानकारी के मुताबिक, कल्याण कुमार ता पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्दवान जिले के प्यूबर घोषपाड़ा विधानपल्ली इलाके के रहने वाले हैं। वह पेशे से स्कूल शिक्षक हैं। कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए उन्होंने 21 अगस्त को बर्दवान से अपनी यात्रा शुरू की थी।

22 अगस्त को वह नेपाल की राजधानी काठमांडू पहुंचे। इसके बाद उन्हें आगे की यात्रा के लिए वीजा से जुड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। वीजा प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण वह अगले दिन आगे नहीं बढ़ सके। इस वजह से उन्हें काठमांडू में रुकना पड़ा।

25 अगस्त की रात वीजा से संबंधित प्रक्रिया पूरी हुई। इसके बाद 26 अगस्त की सुबह उनकी यात्रा दोबारा शुरू हुई। उनके साथ यात्रा कर रहे दल ने आगे बढ़ना शुरू किया। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही घंटों बाद रास्ते में ऐसा दृश्य सामने आने वाला है, जो उनकी पूरी यात्रा की सबसे डरावनी याद बन जाएगा।

बिदुर में चाय के लिए रुकी गाड़ी

26 अगस्त को यात्रा के दौरान उनका दल रसुवा बॉर्डर की ओर बढ़ रहा था। बॉर्डर से करीब 20 से 22 किलोमीटर पहले बिदुर नाम की जगह पर उनकी गाड़ी चाय पीने के लिए रुक गई।

सामान्य तौर पर यात्रा के दौरान कुछ मिनटों के लिए चाय या नाश्ते के लिए रुकना कोई बड़ी बात नहीं होती। लेकिन उस दिन यही छोटी सी देरी कल्याण और उनके साथ मौजूद लोगों के लिए जीवन बचाने वाली साबित हुई।

अगर गाड़ी उस समय वहां नहीं रुकती और दल आगे बढ़ जाता, तो संभव है कि वे उसी रास्ते पर होते जब पहाड़ से मलबा और पानी का तेज बहाव नीचे आता। कल्याण के लिए यह बात आज भी बेहद डरावनी है कि जिस समय वह चाय पीने के लिए रुके थे, उसी समय प्रकृति कुछ ही दूरी पर अपना बेहद खतरनाक रूप दिखाने वाली थी।

अचानक आई जोरदार आवाज और शुरू हो गई तबाही

कल्याण के अनुसार, अचानक वहां मौजूद लोगों को गाड़ियां मोड़कर ऊंची जगह की ओर जाने के लिए कहा गया। स्थिति को भांपते हुए लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे।

सुबह करीब 9:10 से 9:15 बजे के बीच अचानक एक जोरदार आवाज सुनाई दी। इसके बाद कुछ ही मिनटों में नीचे की ओर एक ऐसा खौफनाक दृश्य दिखाई देने लगा, जिसे देखकर वहां मौजूद लोगों के होश उड़ गए।

पहाड़ से नीचे आया मलबा और काले रंग का कीचड़युक्त तेज बहाव तेजी से आगे बढ़ रहा था। इसकी चपेट में आने वाली चीजों को संभलने का मौका तक नहीं मिल रहा था। घर और गाड़ियां देखते ही देखते बहाव में समाने लगीं।

सबसे भयावह दृश्य उस समय सामने आया जब नदी के ऊपर बना पुल भी तेज बहाव की चपेट में आ गया। कुछ ही समय में पुल टूट गया और वहां का पूरा दृश्य तबाही में बदल गया।

आंखों के सामने करीब डेढ़ घंटे तक चलता रहा मौत का मंजर

कल्याण और उनके साथ मौजूद लोगों ने खुद को सुरक्षित रखने के लिए ऊंची जगह पर शरण ली। करीब डेढ़ घंटे तक वे वहीं खड़े रहे। सामने तेज बहाव और मलबे से हुई तबाही थी।

उस समय उनके लिए आगे बढ़ना भी खतरे से खाली नहीं था और पीछे लौटना भी आसान नहीं था। हर तरफ बारिश और खराब मौसम का असर था। ऐसे में किसी भी गलत कदम का परिणाम बेहद गंभीर हो सकता था।

कल्याण ने बताया कि उस दौरान डर लगातार बढ़ रहा था। आंखों के सामने घरों और वाहनों को बहते हुए देखना उनके लिए बेहद भयावह अनुभव था। वह समझ नहीं पा रहे थे कि हालात कब सामान्य होंगे और उन्हें वहां से सुरक्षित निकलने का रास्ता कब मिलेगा।

ड्राइवर ने कहा- अब यहां रुकना सुरक्षित नहीं

जब स्थिति कुछ संभलने लगी तो ड्राइवर ने खतरे को देखते हुए वहां से जल्द निकलने की सलाह दी। दल के सामने एक और बड़ी चुनौती थी। उन्हें रास्ते में कई पुल पार करके काठमांडू की ओर वापस जाना था।

ऐसे हालात में हर पुल चिंता का कारण बन गया था। लगातार बारिश और अचानक बढ़ते पानी के बीच यह तय करना आसान नहीं था कि कौन सा रास्ता सुरक्षित है।

आखिरकार सुबह करीब 11 बजे वे बिदुर से काठमांडू की ओर रवाना हुए। कई घंटों के सफर के बाद शाम करीब 4:30 बजे वे काठमांडू पहुंचे। लेकिन यहां पहुंचने के बाद भी राहत पूरी तरह नहीं मिली। काठमांडू में भी तेज बारिश शुरू हो गई।

यात्रा के दौरान जो कुछ उन्होंने देखा था, उसके बाद खराब मौसम की हर आवाज और तेज बारिश उनके डर को और बढ़ा रही थी। घर लौटने की चिंता लगातार बनी रही।

28 अगस्त को काठमांडू से लौटे, 29 की रात पहुंचे बर्दवान

काठमांडू में स्थिति और यात्रा से जुड़ी परिस्थितियों को देखते हुए कल्याण और उनके साथियों ने वापसी का फैसला किया। 28 अगस्त को उन्होंने काठमांडू से अपनी वापसी की यात्रा शुरू की।

लंबे सफर के बाद 29 अगस्त की रात वह अपने घर बर्दवान पहुंच सके। घर पहुंचने के बाद परिवार के लोगों ने राहत की सांस ली। लेकिन कल्याण के लिए यात्रा खत्म होने के बावजूद उस भयावह घटना का असर खत्म नहीं हुआ।

उनके जेहन में बार-बार वही दृश्य घूम रहा है—पहाड़ से अचानक नीचे आता मलबा, काले कीचड़ का तेज बहाव, पानी में बहती गाड़ियां, टूटता हुआ पुल और जान बचाने के लिए भागते लोग।

'मौत के बारे में सुनना अलग, सामने देखना अलग'

घर लौटने के बाद कल्याण ने अपने अनुभव को बेहद डरावना बताया। उनका कहना है कि मौत के बारे में सुनना एक अलग बात है, लेकिन मौत को इतनी करीब से देखना बिल्कुल अलग अनुभव है।

उनके चेहरे और आंखों पर उस घटना का डर अब भी साफ दिखाई देता है। जिस यात्रा को वह धार्मिक और आध्यात्मिक अनुभव के रूप में देख रहे थे, वह अचानक जिंदगी और मौत के संघर्ष में बदल गई।

चाय पीने के लिए कुछ मिनटों का रुकना उनके लिए एक ऐसा संयोग बन गया, जिसने शायद उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। आज वह उस छोटी सी देरी को सिर्फ यात्रा का एक सामान्य पड़ाव नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी बचाने वाला फैसला मानते हैं।

डरावनी यादों से सामान्य जिंदगी में लौटने में लगेगा समय

नेपाल से सुरक्षित लौटने के बाद भी कल्याण उस घटना को भुला नहीं पा रहे हैं। उनका कहना है कि उस दिन का अनुभव उनके मन में लंबे समय तक रहेगा। आंखों के सामने हुई तबाही की तस्वीरें इतनी गहरी हैं कि उन्हें सामान्य होने में कुछ समय लग सकता है।

उनकी कहानी यह भी बताती है कि पहाड़ी इलाकों में मौसम कितनी तेजी से अपना रूप बदल सकता है। कुछ मिनट पहले तक सामान्य नजर आने वाला रास्ता अचानक बेहद खतरनाक हो सकता है। बारिश और पहाड़ों में अचानक आने वाले मलबे के बहाव के सामने इंसान की तैयारी कई बार बेहद छोटी पड़ जाती है।

कल्याण अब यही उम्मीद करते हैं कि जिस तरह वह और उनके साथी सुरक्षित लौट पाए, उसी तरह दूसरे लोग भी ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहें। उनके लिए कैलाश मानसरोवर की यह यात्रा अब केवल एक धार्मिक यात्रा की याद नहीं है, बल्कि जिंदगी को बेहद करीब से महसूस करने वाला वह अनुभव है, जिसे वह शायद कभी भूल नहीं पाएंगे।

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