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जिस सॉफ्टवेयर पर करते हैं आंख बंद करके भरोसा, वही बन सकता है हैकर्स का हथियार! भारत अलर्ट



आज के डिजिटल दौर में इंटरनेट और तकनीक हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। बैंकिंग से लेकर खरीदारी, सरकारी सेवाओं, ऑफिस के काम और निजी बातचीत तक लगभग हर काम ऑनलाइन हो रहा है। लेकिन डिजिटल सुविधाओं के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर अपराध का खतरा भी तेजी से बढ़ रहा है। अब साइबर हमलावर केवल पासवर्ड या बैंकिंग डिटेल चोरी करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भरोसेमंद सॉफ्टवेयर, ओपन-सोर्स पैकेज और सप्लाई-चेन को निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर हमले कर रहे हैं।

साइबर सुरक्षा कंपनी कैस्परस्काई की ताजा रिपोर्ट ने इसी बढ़ते खतरे को लेकर गंभीर तस्वीर सामने रखी है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत एशिया-पैसिफिक यानी APAC क्षेत्र के उन शीर्ष पांच देशों में शामिल है, जिन्हें एडवांस्ड और लक्षित साइबर हमलों का लगातार सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब साइबर अपराधियों के पास आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI जैसी तकनीक भी उपलब्ध है, जिससे हमले पहले की तुलना में ज्यादा तेज, बड़े पैमाने पर और अनुकूलित तरीके से किए जा सकते हैं।

भारत समेत ये देश साइबर हमलावरों के निशाने पर

कैस्परस्काई की ग्लोबल रिसर्च एंड एनालिसिस टीम यानी GReAT की रिपोर्ट में एडवांस्ड परसिस्टेंट थ्रेट्स यानी APTs को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है। कंपनी दुनिया भर में बड़ी संख्या में APT समूहों की गतिविधियों पर नजर रखती है।

रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा प्रभावित देशों की सूची में एशिया-पैसिफिक क्षेत्र के पांच देश शामिल हैं। इनमें भारत के अलावा चीन, म्यांमार, पाकिस्तान और वियतनाम का नाम सामने आया है।

ये आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि APT हमले सामान्य साइबर अपराध से काफी अलग होते हैं। इनमें हमलावर किसी सिस्टम में प्रवेश करने के बाद तुरंत बाहर निकलने के बजाय लंबे समय तक अपनी मौजूदगी छिपाकर रख सकते हैं। इस दौरान वे संवेदनशील जानकारी जुटाने, नेटवर्क की निगरानी करने और महत्वपूर्ण डेटा तक पहुंच बनाने की कोशिश करते हैं।

छह महीने में करोड़ों साइबर हमले नाकाम

रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2026 की पहली छमाही के दौरान APAC क्षेत्र में कैस्परस्काई ने ऑनलाइन संसाधनों से जुड़े लगभग 7.5 करोड़ हमलों को ब्लॉक किया।

जनवरी से जून के बीच लाखों खतरनाक गतिविधियों को रोकने का दावा किया गया। इनमें लगभग 34 लाख बैकडोर हमले, करीब 24 लाख पासवर्ड चोरी करने वाले हमले और लगभग 2.5 लाख रैनसमवेयर घटनाएं शामिल थीं।

इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि डिजिटल दुनिया में साइबर हमले कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं। किसी संगठन या व्यक्ति के लिए केवल मजबूत पासवर्ड रखना ही अब पर्याप्त सुरक्षा नहीं माना जा सकता।

AI ने साइबर अपराधियों को बनाया और खतरनाक

साइबर अपराध की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बनकर सामने आया है।

AI की मदद से हमलावर किसी संभावित लक्ष्य के बारे में शुरुआती जानकारी जुटाने यानी Reconnaissance की प्रक्रिया को ज्यादा तेजी से पूरा कर सकते हैं। इसके अलावा मालवेयर तैयार करने और हमलों को बड़े पैमाने पर फैलाने की क्षमता भी बढ़ सकती है।

पहले जहां किसी साइबर हमले को तैयार करने में काफी समय और तकनीकी संसाधनों की जरूरत होती थी, वहीं AI आधारित टूल्स इस प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं। इससे हमलावर अलग-अलग लक्ष्यों के हिसाब से अपने तरीके बदलने में भी सक्षम हो रहे हैं।

यही वजह है कि साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के सामने अब केवल पुराने वायरस और पासवर्ड चोरी जैसे खतरे नहीं हैं। AI आधारित हमलों से निपटना आने वाले समय में बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

आखिर APT हमला होता क्या है?

Advanced Persistent Threat यानी APT एक अत्यधिक लक्षित और लंबे समय तक चलने वाला साइबर हमला होता है। इसमें हमलावर किसी नेटवर्क या कंप्यूटर सिस्टम में अनधिकृत तरीके से प्रवेश करते हैं और अपनी गतिविधियों को छिपाकर लंबे समय तक सिस्टम के अंदर बने रहने की कोशिश करते हैं।

ऐसे हमलों का उद्देश्य केवल तत्काल आर्थिक नुकसान पहुंचाना नहीं होता। कई मामलों में साइबर जासूसी, संवेदनशील जानकारी की चोरी, रणनीतिक डेटा हासिल करना या किसी संगठन की महत्वपूर्ण डिजिटल व्यवस्था को समझना भी मकसद हो सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में दुनिया भर की गंभीर सुरक्षा घटनाओं में APT गतिविधियों की हिस्सेदारी करीब 24 प्रतिशत रही। इसके बाद सोशल इंजीनियरिंग और सामान्य मालवेयर जैसे खतरे प्रमुख रहे।

APAC क्षेत्र क्यों बना बड़ा साइबर टारगेट?

एशिया-पैसिफिक क्षेत्र तेजी से डिजिटल हो रहा है। ऑनलाइन सेवाओं, क्लाउड सिस्टम, डिजिटल भुगतान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।

कैस्परस्काई के APAC और META रिसर्च यूनिट से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, क्षेत्र में डिजिटल परिवर्तन की तेज रफ्तार और AI एजेंट्स को अपनाने के साथ जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी इसे साइबर हमलावरों के लिए हाई-वैल्यू टारगेट बनाती हैं।

जितना ज्यादा कोई क्षेत्र डिजिटल सिस्टम पर निर्भर होता है, उतना ही बड़ा साइबर हमले का संभावित प्रभाव हो सकता है। यही कारण है कि सरकारों, कंपनियों और आम यूजर्स के लिए डिजिटल सुरक्षा अब पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।

अब सीधे सिस्टम पर नहीं, भरोसेमंद सॉफ्टवेयर पर हमला

साइबर हमले का तरीका भी तेजी से बदल रहा है। पहले हमलावर सीधे किसी व्यक्ति या कंपनी के सिस्टम में सेंध लगाने की कोशिश करते थे। अब वे उस सॉफ्टवेयर को निशाना बना सकते हैं जिस पर लाखों लोग भरोसा करते हैं।

इसे Software Supply-Chain Attack कहा जाता है।

इस तरह के हमले में किसी सॉफ्टवेयर कंपनी, अपडेट सर्वर, डेवलपर अकाउंट या ओपन-सोर्स पैकेज को निशाना बनाया जा सकता है। यदि उसमें दुर्भावनापूर्ण कोड डाल दिया जाए तो वही सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने वाले हजारों या लाखों यूजर्स तक खतरा पहुंच सकता है।

यानी खतरा अब केवल यह नहीं है कि आपने कौन सी वेबसाइट खोली। खतरा यह भी हो सकता है कि आपने जिस सॉफ्टवेयर को सुरक्षित समझकर अपने कंप्यूटर में इंस्टॉल किया, वह खुद संक्रमित हो चुका हो।

eScan घटना ने बढ़ाई चिंता

रिपोर्ट में भारत से जुड़े eScan मामले का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कथित तौर पर मुंबई स्थित साइबर सुरक्षा कंपनी के अपडेट इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया गया।

हमलावरों ने भरोसेमंद अपडेट सिस्टम का इस्तेमाल ग्राहकों तक दुर्भावनापूर्ण सॉफ्टवेयर पहुंचाने के लिए किया। इस घटना ने यह दिखाया कि साइबर सुरक्षा कंपनी का इंफ्रास्ट्रक्चर भी सप्लाई-चेन हमले का माध्यम बन सकता है।

इस तरह के हमले आम यूजर के लिए विशेष रूप से खतरनाक होते हैं, क्योंकि उसे यह अंदाजा तक नहीं होता कि जिस सॉफ्टवेयर अपडेट को वह सुरक्षा के लिए डाउनलोड कर रहा है, उसमें खतरा छिपा हो सकता है।

Notepad++ और Daemon Tools भी निशाने पर

साइबर सुरक्षा रिपोर्ट में Notepad++ से जुड़े मामले का भी उल्लेख किया गया है। यह डेवलपर्स और IT पेशेवरों के बीच लोकप्रिय ओपन-सोर्स टेक्स्ट एडिटर है।

रिपोर्ट के अनुसार हमलावरों ने दुर्भावनापूर्ण इंस्टॉलर के जरिए ट्रोजन बैकडोर पहुंचाने की कोशिश की। ऐसे हमले का उद्देश्य प्रभावित सिस्टम पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखना हो सकता है।

इसी तरह Daemon Tools की आधिकारिक वेबसाइट से जुड़े एक सप्लाई-चेन अभियान की पहचान किए जाने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। इस अभियान में वास्तविक सॉफ्टवेयर के साथ मालवेयर पहुंचने की आशंका सामने आई और 100 से ज्यादा देशों के 2,000 से अधिक यूजर्स प्रभावित बताए गए।

ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर पर भी मंडरा रहा खतरा

ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर आधुनिक तकनीकी दुनिया की रीढ़ बन चुका है। बड़ी संख्या में वेबसाइट, मोबाइल ऐप और क्लाउड सेवाएं ऐसे कोड और पैकेज पर निर्भर करती हैं।

लेकिन यही व्यापक इस्तेमाल अब साइबर अपराधियों को आकर्षित कर रहा है।

कैस्परस्काई के आंकड़ों के अनुसार 2024 में 14,197 दुर्भावनापूर्ण ओपन-सोर्स पैकेज की पहचान हुई थी। 2025 में यह संख्या बढ़कर 19,484 हो गई। यानी एक साल में लगभग 37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

हैकिंग टूल्स से जुड़े मामलों में भी वृद्धि बताई गई है। इससे संकेत मिलता है कि डेवलपर्स और कंपनियों को केवल अपने मुख्य सिस्टम की सुरक्षा पर ही नहीं, बल्कि इस्तेमाल किए जा रहे प्रत्येक थर्ड-पार्टी सॉफ्टवेयर और पैकेज की सुरक्षा पर भी ध्यान देना होगा।

Axios मामले ने खोला नया मोर्चा

ओपन-सोर्स इकोसिस्टम से जुड़े Axios मामले ने भी साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ाई। Axios एक लोकप्रिय JavaScript लाइब्रेरी है और इसका इस्तेमाल बड़ी संख्या में डेवलपर्स करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 में इसके एक प्रमुख मेंटेनर के अकाउंट को निशाना बनाकर दुर्भावनापूर्ण पैकेज प्रकाशित किए जाने की घटना सामने आई।

इस घटना की जांच में इसके तार कथित तौर पर BlueNoroff से जोड़े गए, जिसे उत्तर कोरियाई Lazarus समूह से जुड़ा वित्तीय रूप से प्रेरित समूह माना जाता है। यह समूह विशेष रूप से वित्तीय संस्थानों और क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए जाना जाता है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ऐसे समूह डेवलपर्स को फर्जी नौकरी, कोडिंग टेस्ट या पेशेवर अवसरों का झांसा देकर निशाना बना सकते हैं।

आम यूजर के लिए क्या है खतरे की घंटी?

कैस्परस्काई की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि साइबर सुरक्षा अब केवल IT विभाग की जिम्मेदारी नहीं रह गई है।

आम यूजर्स को भी सावधानी बरतनी होगी। किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक करने से बचना, संदिग्ध ईमेल और मैसेज से दूरी रखना, हर जगह एक ही पासवर्ड इस्तेमाल न करना और मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन को सक्रिय रखना बेहद जरूरी है।

साथ ही सॉफ्टवेयर और ऑपरेटिंग सिस्टम को समय पर अपडेट करना चाहिए, लेकिन अपडेट केवल आधिकारिक स्रोतों से ही डाउनलोड करना अधिक सुरक्षित है।

डेवलपर्स और कंपनियों के लिए चुनौती और बड़ी है। उन्हें थर्ड-पार्टी पैकेज, ओपन-सोर्स निर्भरता, अपडेट सर्वर और सप्लाई-चेन की नियमित सुरक्षा जांच करनी होगी।

आने वाला समय और भी चुनौतीपूर्ण

कैस्परस्काई की रिपोर्ट से साफ संकेत मिलता है कि साइबर अपराध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब खतरा केवल किसी संदिग्ध वेबसाइट, वायरस या फिशिंग मैसेज तक सीमित नहीं है।

AI साइबर हमलों को तेज और अधिक अनुकूलित बना सकता है, जबकि सप्लाई-चेन हमले भरोसेमंद सॉफ्टवेयर को ही हमले का माध्यम बना सकते हैं। ओपन-सोर्स पैकेज और डेवलपर अकाउंट भी साइबर अपराधियों के लिए महत्वपूर्ण लक्ष्य बनते जा रहे हैं।

भारत जैसे तेजी से डिजिटल होते देश के लिए यह चेतावनी बेहद गंभीर है। डिजिटल सुविधाओं का विस्तार जितनी तेजी से हो रहा है, उसी गति से साइबर सुरक्षा को भी मजबूत करना होगा। सरकारों, कंपनियों, डेवलपर्स और आम यूजर्स के बीच बेहतर सहयोग और लगातार सुरक्षा जागरूकता ही आने वाले डिजिटल खतरों से बचाव की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है।

क्योंकि अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हैकर आपके पासवर्ड तक पहुंच पाएगा या नहीं। असली सवाल यह है कि जिस सॉफ्टवेयर पर आप आंख बंद करके भरोसा कर रहे हैं, कहीं वही आपके सिस्टम तक हैकर का रास्ता तो नहीं बन चुका है।

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