500 की सीमा से 19 गुना ऊपर पहुंचा TDS! हरियाणा के पानी को लेकर सामने आया ऐसा आंकड़ा, जिसने बढ़ाई चिंता
हरियाणा में पेयजल संकट अब केवल पानी की उपलब्धता का सवाल नहीं रह गया है। प्रदेश के कई हिस्सों में भूजल की गुणवत्ता लगातार खराब होने के आंकड़े सामने आने के बाद चिंता और बढ़ गई है। विधानसभा के मानसून सत्र में सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, हरियाणा के 142 ब्लॉकों में से 88 ब्लॉक ऐसे हैं, जहां भूजल का औसत टीडीएस यानी टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स 500 मिलीग्राम प्रति लीटर की स्वीकार्य सीमा से ऊपर है।
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि वर्ष 2022 से 2025 के बीच 93 ब्लॉकों में भूजल की गुणवत्ता खराब हुई है। यानी करीब 65.5 फीसदी ब्लॉकों में तीन साल के दौरान पानी में घुले ठोस पदार्थों की मात्रा बढ़ी है। प्रदेश का औसत टीडीएस भी 2022 में 658 मिलीग्राम प्रति लीटर से बढ़कर 2025 में 737 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गया।
ये आंकड़े कांग्रेस विधायक आदित्य सुरजेवाला की ओर से पूछे गए अतारांकित सवाल के जवाब में विधानसभा में रखे गए। जनस्वास्थ्य मंत्री रणबीर गंगवा ने सरकार की ओर से भूजल और नहरी पेयजल की स्थिति से जुड़े आंकड़े सदन के सामने रखे। आंकड़ों ने प्रदेश में पेयजल व्यवस्था और भूजल पर बढ़ती निर्भरता को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
142 में से 88 ब्लॉकों में TDS सीमा से ऊपर
पानी की गुणवत्ता समझने के लिए टीडीएस एक महत्वपूर्ण संकेतक है। TDS का मतलब पानी में घुले विभिन्न खनिजों, लवणों और अन्य घुलनशील पदार्थों की कुल मात्रा से है। इसकी मात्रा बढ़ने पर पानी का स्वाद, उपयोगिता और दूसरी गुणवत्ता संबंधी विशेषताएं प्रभावित हो सकती हैं।
हरियाणा में 142 ब्लॉकों के औसत आंकड़ों में से 88 ब्लॉकों का TDS 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाया गया है। यानी प्रदेश के एक बड़े हिस्से में भूजल की गुणवत्ता को लेकर चुनौती मौजूद है।
हालांकि किसी पानी की सुरक्षा का फैसला केवल TDS के आधार पर नहीं किया जा सकता। पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक, भारी धातु और बैक्टीरियोलॉजिकल प्रदूषण जैसे दूसरे मानकों की भी जांच जरूरी होती है। इसके बावजूद लगातार बढ़ता TDS भूजल की बदलती गुणवत्ता का महत्वपूर्ण संकेत जरूर माना जा रहा है।
तीन साल में 93 ब्लॉकों की स्थिति हुई खराब
सरकारी आंकड़ों में सबसे बड़ा संकेत 2022 से 2025 के बीच हुए बदलाव से मिलता है।
इस अवधि में 142 में से 93 ब्लॉकों में भूजल की गुणवत्ता खराब हुई। इसका अर्थ है कि हर तीन में से करीब दो ब्लॉक ऐसे हैं जहां तीन वर्षों के दौरान भूजल के TDS स्तर में बढ़ोतरी दर्ज की गई।
प्रदेश का औसत TDS 658 से बढ़कर 737 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गया। यानी औसत स्तर में लगभग 12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
लेकिन राज्य के सभी हिस्सों की स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ जिलों में हालात औसत से कहीं ज्यादा गंभीर दिखाई दे रहे हैं।
1500 से ज्यादा TDS वाले ब्लॉक बढ़े
भूजल की बिगड़ती स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1,500 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा TDS वाले ब्लॉकों की संख्या 2022 में सिर्फ दो थी, जो 2025 में बढ़कर नौ हो गई।
इसके अलावा प्रदेश के 35 ब्लॉकों में TDS 1,000 मिलीग्राम प्रति लीटर या उससे अधिक दर्ज किया गया।
इस तरह आंकड़े बताते हैं कि समस्या सिर्फ कुछ चुनिंदा स्थानों तक सीमित नहीं है। हरियाणा के कई हिस्सों में भूजल की गुणवत्ता को लेकर लगातार निगरानी और सुधार की जरूरत दिखाई दे रही है।
पलवल में 940 से बढ़कर 1,636 पहुंचा TDS
पलवल का उदाहरण इस बदलाव को सबसे स्पष्ट तरीके से दिखाता है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पलवल में औसत TDS वर्ष 2022 में 940 मिलीग्राम प्रति लीटर था, जो 2025 में बढ़कर 1,636 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया।
यानी तीन साल के भीतर औसत TDS में लगभग 74 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।
पलवल जैसे क्षेत्रों में जहां लोग लंबे समय से भूजल पर निर्भर रहे हैं, वहां पानी की गुणवत्ता में इस तरह की गिरावट चिंता का विषय बन जाती है। अगर वैकल्पिक सुरक्षित जल स्रोतों की पहुंच सीमित हो, तो लोगों के पास उपलब्ध पानी के स्रोतों पर निर्भर रहने के अलावा बहुत कम विकल्प बचते हैं।
नूंह के इंदी ब्लॉक में TDS 1,974
नूंह के इंदी ब्लॉक की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है।
यहां TDS वर्ष 2022 में 1,002 मिलीग्राम प्रति लीटर था, जो 2025 में बढ़कर 1,974 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया।
यानी तीन वर्षों में इसमें लगभग दोगुनी बढ़ोतरी हुई।
इससे पता चलता है कि कुछ क्षेत्रों में भूजल की गुणवत्ता राज्य के औसत स्तर से काफी ज्यादा खराब हो रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार कुछ पेयजल स्रोतों में TDS 9,553 मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज किया गया।
500 मिलीग्राम प्रति लीटर के संदर्भ स्तर की तुलना में यह आंकड़ा करीब 19 गुना ज्यादा है। हालांकि, किसी स्रोत का पानी स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय केवल TDS देखकर नहीं किया जा सकता। इसके लिए पानी में मौजूद अन्य रासायनिक और जैविक तत्वों की भी जांच आवश्यक है।
नहरी पानी की कवरेज पर भी उठे सवाल
एक तरफ भूजल की गुणवत्ता खराब हो रही है, वहीं दूसरी तरफ कई जिलों में नहरी पेयजल की पहुंच बेहद सीमित है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक फरीदाबाद, गुरुग्राम, पलवल, पंचकूला और यमुनानगर में नहरी पानी की कवरेज शून्य है।
सबसे अहम सवाल यह है कि इन जिलों में वर्ष 2014 में भी नहरी पानी की कवरेज शून्य थी। यानी करीब 13 वर्षों की अवधि में भी स्थिति में बदलाव नहीं आया।
ऐसे समय में जब कई इलाकों में भूजल की गुणवत्ता खराब होने के आंकड़े सामने आ रहे हैं, नहरी पेयजल की सीमित पहुंच सरकार के सामने बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है।
करनाल में भी नहरी पेयजल की कवरेज करीब 1.90 फीसदी ही बताई गई है।
दूषित पेयजल की शिकायतों में सात गुना से ज्यादा बढ़ोतरी
पानी की गुणवत्ता को लेकर सिर्फ भूजल के आंकड़े ही चिंता नहीं बढ़ा रहे हैं। आम लोगों की ओर से दर्ज कराई जाने वाली शिकायतों में भी बड़ा इजाफा हुआ है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2019 में दूषित पेयजल से जुड़ी 1,356 शिकायतें दर्ज हुई थीं। वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर 9,769 हो गई।
यानी छह वर्षों के दौरान शिकायतों की संख्या करीब 7.2 गुना बढ़ी।
वर्ष 2026 में भी अब तक 6,676 शिकायतें दर्ज होने की बात सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि पेयजल की गुणवत्ता को लेकर समस्या लोगों के दैनिक जीवन में भी महसूस की जा रही है।
हालांकि शिकायतों में वृद्धि के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन लगातार बड़ी संख्या में शिकायतें सामने आना जलापूर्ति व्यवस्था और गुणवत्ता की निगरानी को मजबूत करने की जरूरत जरूर बताता है।
भूजल पर बढ़ता दबाव बना बड़ी चुनौती
हरियाणा में कृषि, उद्योग और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण भूजल पर लगातार दबाव बढ़ा है। कई इलाकों में सिंचाई और घरेलू जरूरतों के लिए लंबे समय से भूजल का इस्तेमाल किया जाता रहा है।
जब किसी क्षेत्र में भूजल का अत्यधिक दोहन होता है तो जलस्तर में गिरावट के साथ उसकी रासायनिक गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है। अलग-अलग क्षेत्रों में भूगर्भीय संरचना, मिट्टी, चट्टानों और मानव गतिविधियों के कारण पानी में विभिन्न घुलनशील पदार्थों की मात्रा अलग हो सकती है।
दक्षिण हरियाणा और एनसीआर से जुड़े कई क्षेत्रों में भूजल की गुणवत्ता को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। पलवल और नूंह के मौजूदा आंकड़े इस चुनौती को और स्पष्ट करते हैं।
आदित्य सुरजेवाला ने मांगा श्वेत पत्र
कांग्रेस विधायक आदित्य सुरजेवाला ने सरकार से वर्ष 2014 से अब तक की नहर आधारित पेयजल योजनाओं पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है।
उनका कहना है कि हरियाणा नहरों वाला प्रदेश है और इसके बावजूद कई जिलों में नहरी पेयजल की पहुंच नहीं बढ़ पाई है। उनका आरोप है कि भूजल की गुणवत्ता खराब होने का असर आम लोगों के स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है।
सुरजेवाला ने मांग की कि सरकार केवल औसत TDS आंकड़े जारी करने के बजाय स्रोतवार जल गुणवत्ता रिपोर्ट सार्वजनिक करे, ताकि लोगों को अपने इलाके में उपलब्ध पानी की वास्तविक स्थिति का पता चल सके।
1,000 TDS से ऊपर वाले स्रोतों की जांच की मांग
कांग्रेस विधायक ने 1,000 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक TDS वाले सभी जल स्रोतों की विस्तृत जांच कराने की मांग की है।
उन्होंने विशेष रूप से फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और भारी धातुओं की जांच कराने की बात कही है।
यह मांग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पानी की गुणवत्ता को केवल TDS से नहीं समझा जा सकता। अगर किसी इलाके में TDS ज्यादा है, तो यह जानना भी जरूरी है कि उसमें कौन-कौन से पदार्थ घुले हुए हैं और उनकी मात्रा कितनी है।
स्रोतवार जांच से सरकार को यह पहचानने में मदद मिल सकती है कि कौन से इलाके तत्काल हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।
पलवल-नूंह समेत प्रभावित इलाकों के लिए योजना की मांग
विधायक ने पलवल, नूंह और फरीदाबाद समेत गंभीर रूप से प्रभावित जिलों के लिए समयबद्ध नहरी पेयजल योजनाएं शुरू करने की मांग की है।
उनका तर्क है कि जिन क्षेत्रों में भूजल की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है, वहां सुरक्षित वैकल्पिक जल स्रोत उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए।
इसके साथ ही भूजल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, जल स्रोतों की नियमित जांच और पाइपलाइन व्यवस्था की निगरानी पर भी जोर देना जरूरी होगा।
हरियाणा के सामने दोहरी चुनौती
विधानसभा में सामने आए आंकड़ों ने हरियाणा के सामने पेयजल को लेकर दोहरी चुनौती स्पष्ट कर दी है।
पहली चुनौती है भूजल की लगातार खराब होती गुणवत्ता और दूसरी चुनौती है वैकल्पिक नहरी पेयजल की सीमित पहुंच।
93 ब्लॉकों में तीन साल के भीतर गुणवत्ता खराब होना, 35 ब्लॉकों में TDS का 1,000 से ऊपर पहुंचना और 1,500 से ज्यादा TDS वाले ब्लॉकों की संख्या का दो से बढ़कर नौ होना इस समस्या की गंभीरता दिखाता है।
अब जरूरत सिर्फ नए पानी के स्रोत खोजने की नहीं, बल्कि उपलब्ध जल स्रोतों की गुणवत्ता पर लगातार नजर रखने की भी है। सरकार के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि लोगों तक पहुंचने वाला पानी केवल पर्याप्त मात्रा में ही न हो, बल्कि गुणवत्ता के मानकों पर भी खरा उतरे।
हरियाणा में बढ़ता TDS फिलहाल एक चेतावनी की तरह सामने आया है। आने वाले समय में भूजल संरक्षण, नहरी पेयजल के विस्तार और पानी की स्रोतवार जांच पर कितना प्रभावी काम होता है, यही तय करेगा कि प्रदेश इस बढ़ती जल गुणवत्ता की समस्या को कितना नियंत्रित कर पाता है।

कोई टिप्पणी नहीं