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अब सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं रहा स्ट्रोक! 30-40 की उम्र में भी बढ़ रहा खतरा, इन 6 संकेतों को भूलकर भी नजरअंदाज न करें

एक समय था जब स्ट्रोक का नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में बुजुर्ग व्यक्ति की तस्वीर आती थी। लेकिन अब यह सोच बदलने की जरूरत है। भारत में कम उम्र के लोगों में भी स्ट्रोक के मामले चिंता का विषय बन रहे हैं। एक राष्ट्रीय स्तर के विश्लेषण में भारत के करीब 35 हजार स्ट्रोक मामलों को देखा गया, जिनमें लगभग 13.8 प्रतिशत मरीज 45 साल से कम उम्र के थे। यानी करीब हर सात में से एक स्ट्रोक मरीज 45 साल से कम उम्र का था।

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि 30 और 40 की उम्र में पहुंचने वाले कई लोग खुद को स्ट्रोक के खतरे से बाहर मानते हैं। नौकरी, परिवार, कारोबार और रोजमर्रा की भागदौड़ के बीच लोग ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, वजन, नींद और तनाव जैसी चीजों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते। विशेषज्ञों के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, धूम्रपान, शारीरिक निष्क्रियता, खराब खान-पान और लंबे समय तक बना तनाव कम उम्र में स्ट्रोक के जोखिम को बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण कारकों में शामिल हैं।

यानी जिस बीमारी को लोग अक्सर उम्र बढ़ने के साथ जोड़कर देखते हैं, वह अब युवाओं के लिए भी एक गंभीर चेतावनी बनती जा रही है।

आखिर स्ट्रोक होता क्या है?

स्ट्रोक उस स्थिति को कहा जाता है जब मस्तिष्क के किसी हिस्से तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो जाती है या मस्तिष्क की किसी रक्त वाहिका से रक्तस्राव होने लगता है।

मस्तिष्क को लगातार ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की जरूरत होती है। जब रक्त का प्रवाह बाधित होता है, तो प्रभावित हिस्से की कोशिकाएं तेजी से क्षतिग्रस्त होने लगती हैं।

यही कारण है कि स्ट्रोक को मेडिकल इमरजेंसी माना जाता है। इसमें इलाज शुरू करने में देरी होने पर स्थायी मस्तिष्क क्षति, बोलने या चलने में परेशानी, लकवा और गंभीर मामलों में मृत्यु तक हो सकती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्ट्रोक के दौरान हर मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए लक्षण दिखाई देने के बाद यह सोचकर इंतजार करना कि थोड़ी देर में अपने आप ठीक हो जाएगा, खतरनाक हो सकता है।

30-40 की उम्र में क्यों बढ़ रहा खतरा?

युवा लोगों में स्ट्रोक के पीछे एक ही कारण नहीं होता। कई मामलों में पारंपरिक जोखिम कारक कम उम्र में ही विकसित हो जाते हैं।

1. हाई ब्लड प्रेशर

हाई ब्लड प्रेशर को स्ट्रोक के सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में गिना जाता है। राष्ट्रीय स्ट्रोक रजिस्ट्री के विश्लेषण में भी हाई ब्लड प्रेशर को प्रमुख जोखिम कारक बताया गया है।

समस्या यह है कि हाई ब्लड प्रेशर कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के लंबे समय तक बना रहता है। व्यक्ति खुद को पूरी तरह स्वस्थ समझता रहता है, जबकि लगातार बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर रक्त वाहिकाओं पर दबाव डालता रहता है।

यही कारण है कि सिर्फ 50-60 साल की उम्र के बाद ही नहीं, बल्कि युवा उम्र में भी नियमित ब्लड प्रेशर जांच जरूरी है।

2. डायबिटीज भी बढ़ा सकती है खतरा

डायबिटीज शरीर की रक्त वाहिकाओं और हृदय संबंधी स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। अगर ब्लड शुगर लंबे समय तक नियंत्रित न रहे, तो रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ सकता है।

आज कम उम्र में भी टाइप-2 डायबिटीज और प्री-डायबिटीज के मामले देखने को मिल रहे हैं। खराब खान-पान, वजन बढ़ना और शारीरिक गतिविधि की कमी इसके जोखिम को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए अगर परिवार में डायबिटीज का इतिहास है या वजन तेजी से बढ़ रहा है, तो नियमित जांच को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

3. धूम्रपान और तंबाकू

सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद रक्त वाहिकाओं के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं और स्ट्रोक के जोखिम से जुड़े हैं।

राष्ट्रीय स्तर के स्ट्रोक डेटा में भी धूम्रपान और तंबाकू के इस्तेमाल को महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में शामिल किया गया है।

कई युवा यह मानते हैं कि कम उम्र में कुछ वर्षों तक धूम्रपान करने से कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा। लेकिन रक्त वाहिकाओं पर पड़ने वाला प्रभाव उम्र का इंतजार नहीं करता।

4. लगातार बैठकर काम करना

आज की नौकरी और जीवनशैली में घंटों कंप्यूटर के सामने बैठना सामान्य हो गया है।

सुबह ऑफिस, दिनभर कुर्सी, शाम को मोबाइल और रात में टीवी या लैपटॉप—ऐसी दिनचर्या में शारीरिक गतिविधि काफी कम हो सकती है।

लंबे समय तक निष्क्रिय जीवनशैली वजन, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। विशेषज्ञ युवा स्ट्रोक के बढ़ते जोखिम के संदर्भ में शारीरिक निष्क्रियता को भी महत्वपूर्ण कारक मानते हैं।

5. खराब नींद और लगातार तनाव

आज के समय में तनाव को सामान्य जीवन का हिस्सा मान लिया गया है। नौकरी का दबाव, आर्थिक चिंता, पारिवारिक जिम्मेदारियां और लगातार स्क्रीन इस्तेमाल नींद को प्रभावित कर सकते हैं।

लंबे समय तक खराब नींद और तनाव का संबंध ब्लड प्रेशर तथा अन्य हृदय-रक्तवाहिका जोखिमों से हो सकता है।

इसलिए सिर्फ खाना और व्यायाम ही नहीं, पर्याप्त और नियमित नींद भी स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।

सबसे बड़ा खतरा—इन 6 संकेतों को नजरअंदाज करना

स्ट्रोक में सबसे महत्वपूर्ण चीज है इसके लक्षणों को जल्दी पहचानना।

अगर अचानक इनमें से कोई संकेत दिखाई दे तो तुरंत मेडिकल मदद लेनी चाहिए:

पहला—चेहरे का एक हिस्सा टेढ़ा होना।

मुस्कुराने पर अगर चेहरे का एक हिस्सा सामान्य तरीके से न हिले या मुंह एक तरफ खिंचा हुआ दिखाई दे, तो यह चेतावनी हो सकती है।

दूसरा—हाथ या पैर में अचानक कमजोरी।

अगर एक हाथ या पैर अचानक कमजोर या सुन्न हो जाए, खासकर शरीर के एक तरफ, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

तीसरा—बोलने में अचानक परेशानी।

व्यक्ति की आवाज अस्पष्ट हो जाए, उसे शब्द बोलने में परेशानी हो या सामने वाले की बात समझने में अचानक दिक्कत हो, तो यह स्ट्रोक का संकेत हो सकता है।

चौथा—अचानक देखने में परेशानी।

एक या दोनों आंखों से अचानक धुंधला दिखाई देना या नजर में अचानक बदलाव भी गंभीर संकेत हो सकता है।

पांचवां—अचानक चलने में परेशानी।

अचानक चक्कर आना, संतुलन बिगड़ना या बिना वजह चलने में परेशानी होने पर सावधानी जरूरी है।

छठा—अचानक तेज सिरदर्द।

खासकर ऐसा सिरदर्द जो अचानक बहुत तेज शुरू हो और सामान्य सिरदर्द से बिल्कुल अलग महसूस हो, उसे गंभीरता से लेना चाहिए।

FAST नियम याद रखें

स्ट्रोक की पहचान के लिए FAST जैसा आसान तरीका इस्तेमाल किया जाता है।

F — Face: चेहरा एक तरफ झुक रहा है?

A — Arms: दोनों हाथ उठाने पर क्या एक हाथ नीचे गिर रहा है?

S — Speech: बोलने में अचानक परेशानी हो रही है?

T — Time: अगर इनमें से कोई संकेत है तो समय बर्बाद न करें और तुरंत चिकित्सा सहायता लें।

यह याद रखना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्ट्रोक के इलाज में समय की बहुत बड़ी भूमिका होती है।

क्या हर चक्कर स्ट्रोक का संकेत है?

नहीं।

हर चक्कर, सिरदर्द या हाथ-पैर में कमजोरी का मतलब स्ट्रोक नहीं होता। इन लक्षणों के पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।

लेकिन समस्या यह है कि घर पर बैठकर यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि लक्षण सामान्य हैं या गंभीर।

इसलिए अगर लक्षण अचानक शुरू हुए हैं, खासकर शरीर के एक हिस्से में कमजोरी, बोलने में परेशानी, चेहरे का टेढ़ापन या अचानक देखने में समस्या है, तो सुरक्षित विकल्प यही है कि तुरंत चिकित्सा सहायता ली जाए।

युवाओं में स्ट्रोक के कुछ दूसरे कारण भी हो सकते हैं

कम उम्र के मरीजों में स्ट्रोक के कारण हमेशा वही नहीं होते जो बुजुर्गों में सामान्य रूप से देखे जाते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार युवा लोगों में कुछ मामलों में रक्त के थक्के बनने से जुड़ी समस्याएं, रक्त वाहिकाओं की संरचना से संबंधित समस्या, धमनियों में डिसेक्शन और कुछ अन्य स्थितियां भी भूमिका निभा सकती हैं।

इसलिए किसी युवा व्यक्ति को स्ट्रोक होने पर डॉक्टर केवल उम्र देखकर कारण को नजरअंदाज नहीं करते। मरीज की मेडिकल हिस्ट्री और परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग जांच की जरूरत पड़ सकती है।

क्या स्ट्रोक को रोका जा सकता है?

स्ट्रोक के हर मामले को रोकना संभव नहीं है, लेकिन कई प्रमुख जोखिम कारकों को नियंत्रित करके खतरा कम किया जा सकता है।

सबसे पहले नियमित रूप से ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए। अगर डॉक्टर ने दवा लिखी है तो उसे अपनी मर्जी से बंद नहीं करना चाहिए।

धूम्रपान और तंबाकू छोड़ना बेहद महत्वपूर्ण है। भोजन में अत्यधिक नमक और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को कम करना और संतुलित आहार लेना भी मददगार हो सकता है।

इसके साथ नियमित शारीरिक गतिविधि को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाना चाहिए।

युवा उम्र में चेकअप क्यों जरूरी है?

कई युवा लोग तब तक डॉक्टर के पास नहीं जाते जब तक कोई बड़ी परेशानी सामने न आ जाए।

यही सोच कई जोखिम कारकों को लंबे समय तक छिपे रहने का मौका दे सकती है।

हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं शुरुआती दौर में स्पष्ट लक्षण नहीं देतीं। इसलिए व्यक्ति को स्वस्थ महसूस होने के बावजूद उम्र और व्यक्तिगत जोखिम के अनुसार नियमित स्वास्थ्य जांच पर ध्यान देना चाहिए।

भारत में बदल रही है स्ट्रोक की तस्वीर

राष्ट्रीय स्ट्रोक रजिस्ट्री के विश्लेषण में 2020 से 2022 के बीच 30 अस्पतालों के लगभग 35 हजार मामलों को शामिल किया गया था। इसमें 13.8 प्रतिशत मरीज 45 साल से कम उम्र के थे।

हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश के न्यूरोलॉजिस्टों ने भी 30 और 40 की उम्र के लोगों में स्ट्रोक को लेकर चिंता जताई है और हाई ब्लड प्रेशर तथा ब्लड शुगर को समय रहते नियंत्रित करने पर जोर दिया है।

इससे साफ है कि स्ट्रोक को केवल बुजुर्गों की बीमारी समझना अब सुरक्षित सोच नहीं है।

सबसे जरूरी बात—लक्षण आए तो इंतजार न करें

स्ट्रोक में सबसे बड़ा नुकसान कभी-कभी बीमारी से ज्यादा इलाज में हुई देरी के कारण हो सकता है।

अगर किसी युवा व्यक्ति को अचानक बोलने में दिक्कत, चेहरे का एक हिस्सा टेढ़ा होना, एक हाथ या पैर में कमजोरी, अचानक देखने में परेशानी या चलने में संतुलन बिगड़ने जैसी समस्या होती है, तो उसे घर पर आराम कराने या घरेलू इलाज करने में समय नहीं गंवाना चाहिए।

याद रखें—स्ट्रोक उम्र देखकर नहीं आता। 30 या 40 साल की उम्र में होना इसका खतरा पूरी तरह खत्म नहीं करता।

हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, तंबाकू, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, खराब नींद और लंबे समय का तनाव जैसे जोखिम कारकों को नियंत्रित करना बेहद जरूरी है।

आज की सबसे बड़ी चेतावनी यही है कि अगर उम्र कम है और शरीर बाहर से बिल्कुल फिट दिख रहा है, तब भी अचानक आने वाले न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सही समय पर पहचान और तुरंत चिकित्सा सहायता स्ट्रोक के परिणाम को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। 

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