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Video : जेल में बैठे सीरियल किलर ने खोला ऐसा राज, जिसे सुनकर कांप जाएगी रूह! इंसानी मांस के स्वाद का दावा… लेकिन सच आज भी रहस्य

 


नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर पुराने अपराधियों के इंटरव्यू और जेल में दिए गए बयान अक्सर दोबारा वायरल हो जाते हैं। इन दिनों अमेरिका के कुख्यात सीरियल किलर आर्थर जॉन शॉक्रॉस से जुड़े पुराने इंटरव्यू और उनके कथित कबूलनामे भी चर्चा में हैं। शॉक्रॉस को ‘जेनेसी रिवर किलर’ के नाम से जाना जाता था।

शॉक्रॉस ने जेल में दिए कुछ इंटरव्यू में नरभक्षण से जुड़े बेहद सनसनीखेज दावे किए थे। उन्होंने कथित तौर पर इंसानी मांस के स्वाद की तुलना रोस्ट पोर्क और हैम से की थी। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र और ठोस वैज्ञानिक पुष्टि कभी नहीं हो सकी। यही वजह है कि उनके बयानों को लेकर आज भी सवाल बने हुए हैं।

उनकी कहानी केवल उनके भयावह अपराधों की वजह से नहीं, बल्कि इस वजह से भी महत्वपूर्ण मानी जाती है कि उनके मामले ने पैरोल व्यवस्था, अपराधियों के जोखिम आकलन और न्यायिक प्रणाली की खामियों पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

कौन था आर्थर शॉक्रॉस?

आर्थर जॉन शॉक्रॉस का जन्म 1945 में अमेरिका में हुआ था। बाद में वह न्यूयॉर्क राज्य में अपराधों के लिए कुख्यात हुआ। उसके अपराधों का पहला बड़ा मामला 1972 में सामने आया, जब वाटरटाउन इलाके में दो बच्चों की हत्या के मामले में उसे गिरफ्तार किया गया।

शॉक्रॉस ने इन हत्याओं के मामले में समझौते के तहत कम गंभीर आरोप में दोष स्वीकार किया। उसे 25 साल तक की सजा मिली और उसने लगभग 14-15 साल जेल में बिताए। इसके बाद उसे पैरोल पर रिहा कर दिया गया।

यहीं से उसके मामले का सबसे विवादित अध्याय शुरू हुआ।

जेल से बाहर आने के बाद फिर शुरू हुआ अपराध

1987 में पैरोल पर रिहा होने के बाद शॉक्रॉस रोचेस्टर इलाके में रहने लगा। लेकिन कुछ ही समय बाद वहां महिलाओं की हत्याओं का सिलसिला शुरू हो गया।

1988 और 1989 के दौरान कई महिलाओं की हत्या हुई। इनमें से कई पीड़िताएं सेक्स वर्कर थीं और उनके शव अलग-अलग स्थानों पर मिले। पुलिस ने इन मामलों को जोड़ना शुरू किया और धीरे-धीरे जांच का दायरा शॉक्रॉस तक पहुंचा।

आखिरकार जनवरी 1990 में उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

उसके खिलाफ कई हत्याओं के मामले चले और अदालत ने उसे कई मामलों में दोषी पाया। 1991 में उसे दस हत्याओं के लिए लगातार सजा सुनाई गई, जिसकी कुल अवधि 250 साल थी। बाद में एक अन्य हत्या के मामले में भी उसे दोषी ठहराया गया।

जेल इंटरव्यू में किया था सबसे चौंकाने वाला दावा

शॉक्रॉस के जेल में दिए गए इंटरव्यू बाद में अपराध संबंधी डॉक्यूमेंट्री और कार्यक्रमों में चर्चा का विषय बने।

इंटरव्यू के दौरान उससे कथित नरभक्षण के बारे में सवाल किए गए। उसने इंसानी मांस के स्वाद की तुलना पके हुए पोर्क और हैम से की थी।

उसके कुछ बयानों में यह भी दावा सामने आया कि उसने मानव शरीर के कुछ हिस्सों को खाया था।

इन दावों ने लोगों को हैरान कर दिया। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शॉक्रॉस के इन दावों को स्वतंत्र वैज्ञानिक प्रमाण से पूरी तरह साबित नहीं किया जा सका।

क्या सच में किया था नरभक्षण?

यही इस पूरी कहानी का सबसे रहस्यमय हिस्सा है।

शॉक्रॉस के बयानों में नरभक्षण की बातें सामने आईं, लेकिन जांचकर्ताओं और विशेषज्ञों ने उनके कई दावों पर संदेह किया। शवों की स्थिति खराब होने और उनके विघटन के कारण ऑटोप्सी से ऐसे ठोस प्रमाण हासिल करना मुश्किल था जिनसे निश्चित रूप से यह कहा जा सके कि मानव ऊतक का सेवन किया गया था।

कुछ शवों पर गंभीर चोट और म्यूटिलेशन के निशान जरूर दर्ज किए गए थे, लेकिन इससे अकेले नरभक्षण साबित नहीं होता।

इसलिए शॉक्रॉस का यह दावा आज भी विवादित और अपुष्ट माना जाता है।

वियतनाम की कहानी पर भी उठे सवाल

शॉक्रॉस ने अपने कुछ बयानों में वियतनाम युद्ध के दौरान किए गए कथित अपराधों और नरभक्षण का जिक्र किया था।

उसने ऐसे दावे किए जिनमें बेहद भयावह घटनाओं का वर्णन था। लेकिन बाद में उसके सैन्य रिकॉर्ड और उसके बयानों की तुलना किए जाने पर कई सवाल उठे।

कुछ विशेषज्ञों और जांचकर्ताओं ने उसके वियतनाम से जुड़े दावों पर विश्वास नहीं किया। उसके कथनों में कई विरोधाभास भी पाए गए।

यानी शॉक्रॉस ने जो कुछ कैमरे के सामने कहा, उसका हर हिस्सा सच था, ऐसा मानने का कोई ठोस आधार नहीं है।

उसके बयान लगातार बदलते रहे

शॉक्रॉस की कहानी को और पेचीदा बनाने वाली बात यह थी कि वह अलग-अलग समय पर अपने अपराधों और कथित अनुभवों के बारे में अलग-अलग बातें करता था।

कभी वह अपने अपराधों की जिम्मेदारी स्वीकार करता, तो कभी उन्हें किसी दूसरे कारण से जोड़ने की कोशिश करता।

इसी वजह से अपराध विशेषज्ञों ने उसके बयानों को सावधानी से देखने की सलाह दी।

किसी अपराधी का कैमरे के सामने दिया गया बयान अपने आप में अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। खासकर तब, जब उसके बयान बार-बार बदलते रहे हों और स्वतंत्र सबूत उनका समर्थन न करते हों।

फिर सोशल मीडिया पर क्यों वायरल हो रहा है मामला?

पुराने अपराधियों के इंटरव्यू और डॉक्यूमेंट्री के वीडियो सोशल मीडिया पर अक्सर नए संदर्भ में वायरल होते हैं।

शॉक्रॉस के मामले में भी यही हुआ। उसके पुराने इंटरव्यू के छोटे-छोटे हिस्से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर किए जाते हैं और उनमें उसके कथित नरभक्षण वाले बयान को सबसे ज्यादा उछाला जाता है।

ऐसे वीडियो कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं।

लेकिन समस्या यह है कि कई बार वीडियो के साथ यह स्पष्ट नहीं किया जाता कि कौन सी बात अदालत के रिकॉर्ड से साबित है और कौन सी बात अपराधी का अपना दावा है।

इस वजह से तथ्य और सनसनी के बीच अंतर करना जरूरी हो जाता है।

असली कहानी केवल नरभक्षण की नहीं

शॉक्रॉस की कहानी को केवल उसके कथित नरभक्षण के दावों तक सीमित करना उसके मामले के सबसे महत्वपूर्ण पहलू को नजरअंदाज करना होगा।

उसका मामला अमेरिका की पैरोल व्यवस्था और जोखिम मूल्यांकन पर लंबे समय तक चर्चा का विषय रहा।

1972 में दो बच्चों की हत्या के बाद उसे अपेक्षाकृत कम सजा मिली और वह वर्षों बाद जेल से बाहर आया। पैरोल पर रिहाई के बाद उसने फिर हत्याएं कीं।

यही वजह है कि बाद में विशेषज्ञों ने सवाल उठाया कि क्या ऐसे गंभीर अपराधी को समाज में वापस भेजने से पहले जोखिम का सही मूल्यांकन किया गया था।

सिस्टम की विफलता पर उठे बड़े सवाल

शॉक्रॉस के मामले ने यह सवाल खड़ा किया कि किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में निर्णय लेते समय किन बातों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिसके पीछे गंभीर हिंसक अपराधों का इतिहास हो।

क्या जेल में व्यवहार बदल जाने को समाज के लिए सुरक्षित होने का पर्याप्त संकेत माना जा सकता है?

क्या मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन पर्याप्त था?

क्या पैरोल बोर्ड के पास उपलब्ध जानकारी पूरी थी?

ऐसे कई सवालों ने बाद में अमेरिका में अपराधियों की निगरानी और पैरोल प्रक्रिया को लेकर बहस को जन्म दिया।

पीड़ितों को भूलना नहीं चाहिए

ऐसे मामलों में सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा ध्यान अपराधी के बयान और उसकी विचित्र कहानियों पर चला जाता है। लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे दुखद हिस्सा वे लोग हैं जिनकी जान चली गई और उनके परिवार हैं।

शॉक्रॉस की हत्याओं ने कई परिवारों को हमेशा के लिए प्रभावित किया। इसलिए उसके कथित नरभक्षण या सनसनीखेज इंटरव्यू को मनोरंजन की तरह देखने के बजाय इस मामले को अपराध और न्याय व्यवस्था के संदर्भ में समझना अधिक जरूरी है।

2008 में जेल में हुई मौत

आर्थर शॉक्रॉस अपनी लंबी जेल सजा के दौरान ही 2008 में बीमार पड़ा। इलाज के लिए अस्पताल ले जाए जाने के बाद उसकी मौत हो गई।

उसकी मौत के साथ उसके कई सवालों के जवाब भी हमेशा के लिए रहस्य बन गए।

विशेष रूप से उसके नरभक्षण और वियतनाम से जुड़े दावों को लेकर आज भी यह स्पष्ट नहीं है कि उसके बयानों में कितना सच था और कितना झूठ।

सबसे बड़ा रहस्य आज भी बरकरार

आर्थर शॉक्रॉस का नाम अमेरिकी अपराध इतिहास में एक बेहद कुख्यात सीरियल किलर के तौर पर दर्ज है। उसकी हत्याएं अदालत में साबित हुईं, लेकिन इंसानी मांस खाने से जुड़े उसके सनसनीखेज दावे अलग श्रेणी में आते हैं और उनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई।

उसने इंटरव्यू में जो बातें कहीं, उन्होंने दुनिया को जरूर चौंकाया, लेकिन किसी अपराधी के दावे को बिना सबूत ऐतिहासिक तथ्य मान लेना सही नहीं होगा।

शॉक्रॉस की कहानी का असली सबक शायद उसके कथित ‘खौफनाक स्वाद’ से कहीं ज्यादा बड़ा है—यह मामला बताता है कि गंभीर अपराधियों के जोखिम का सही आकलन, पैरोल व्यवस्था और समाज की सुरक्षा कितनी महत्वपूर्ण है।

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