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दिल्ली के अस्पतालों में करोड़ों का ‘राज’! धूल फांक रहीं महंगी मशीनें, हाईकोर्ट की जांच में खुला ऐसा सच कि मचा हड़कंप



नई दिल्ली। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में मरीजों के इलाज और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए जनता के पैसों से खरीदे गए करोड़ों रुपये के अत्याधुनिक मेडिकल उपकरण वर्षों से इस्तेमाल का इंतजार कर रहे हैं। कहीं मशीन चलाने के लिए डॉक्टर नहीं हैं, कहीं प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ की कमी है, कहीं जरूरी मंजूरी नहीं मिली और कहीं मशीन लगाने के लिए पर्याप्त जगह तक उपलब्ध नहीं है। नतीजा यह है कि जिन उपकरणों से मरीजों को आधुनिक इलाज मिलना था, उनमें से कई लंबे समय से बंद पड़े हैं।

इस पूरे मामले का खुलासा दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान हुआ। अदालत ने दिल्ली सरकार के अस्पतालों में महंगे मेडिकल उपकरणों के निष्क्रिय पड़े होने पर गंभीर चिंता जताई और इसे सार्वजनिक संसाधनों की गंभीर बर्बादी बताया। इसके बाद राजधानी के सरकारी अस्पतालों में खरीदे गए लेकिन इस्तेमाल में नहीं आ रहे उपकरणों का ऑडिट कराने का निर्देश दिया गया। हाईकोर्ट के 3 जुलाई 2026 के आदेश में खास तौर पर दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट की ₹15.42 करोड़ की PET Cyclotron मशीन का मामला सामने आया, जो लंबे समय से काम नहीं कर रही थी।

₹15.42 करोड़ की मशीन, लेकिन मरीजों को फायदा नहीं

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला उदाहरण दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट का है। यहां 2017 में PET से जुड़ी न्यूक्लियर मेडिसिन सेवाओं के लिए एक अत्याधुनिक PET Cyclotron लगाया गया था। इसकी लागत करीब ₹15.42 करोड़ बताई गई है।

अदालत के समक्ष रखी गई जानकारी के अनुसार यह मशीन अप्रैल 2022 से गैर-कार्यात्मक थी। इसका मुख्य कारण प्रशिक्षित मैनपावर की कमी बताया गया। इतना ही नहीं, मशीन से जुड़ा नियामकीय लाइसेंस फरवरी 2024 में समाप्त हो गया था और उसका नवीनीकरण भी नहीं हुआ था।

हाईकोर्ट ने इस स्थिति को बेहद गंभीर माना। अदालत ने कहा कि इतनी बड़ी राशि खर्च करने के बावजूद मशीन वर्षों से काम नहीं कर रही है और यह सार्वजनिक संसाधनों की गंभीर बर्बादी है। इसके बाद अदालत ने दिल्ली सरकार के सभी अस्पतालों को अपने यहां पड़े ऐसे उपकरणों की सूची तैयार कर ऑडिट रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।

सिर्फ मशीन खरीदना काफी नहीं, चलाने वाला भी चाहिए

इस मामले की सबसे बड़ी विडंबना यह सामने आती है कि अत्याधुनिक मशीनें खरीदने के बाद उनके संचालन के लिए जरूरी डॉक्टर, तकनीकी विशेषज्ञ और प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध नहीं कराए गए।

किसी हाई-एंड मेडिकल मशीन को चलाने के लिए सिर्फ मशीन खरीद लेना पर्याप्त नहीं होता। उसके लिए विशेषज्ञ डॉक्टर, प्रशिक्षित टेक्नीशियन, नियमित रखरखाव, जरूरी लाइसेंस, बिजली और अन्य तकनीकी सुविधाओं की जरूरत होती है।

अगर इनमें से कोई एक कड़ी भी गायब हो जाए तो करोड़ों रुपये की मशीन मरीजों के लिए उपयोगी होने के बजाय अस्पताल में रखी महंगी वस्तु बनकर रह जाती है।

दिल्ली हाईकोर्ट के सामने PET Cyclotron का मामला इसी समस्या की ओर इशारा करता है।

कैंसर संस्थान में कई और महंगे उपकरण

दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में केवल Cyclotron ही चिंता का विषय नहीं है। उपलब्ध ऑडिट विवरण में कई अन्य महंगे उपकरणों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल सामने आए हैं।

2017 में खरीदे गए Dual-Head Gamma Camera with SPECT, Multislice CT और RT Simulation जैसे उपकरणों की उपयोगिता पर भी सवाल उठे हैं। ये सभी कैंसर की जांच और उपचार से जुड़ी महत्वपूर्ण तकनीकें हैं।

ऐसे उपकरणों के लंबे समय तक इस्तेमाल में न आने का सीधा असर उन मरीजों पर पड़ सकता है जिन्हें सरकारी अस्पताल में आधुनिक जांच और उपचार की उम्मीद होती है।

कैंसर जैसे गंभीर रोग में समय पर जांच और उपचार बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में अगर अस्पताल में मशीन मौजूद हो लेकिन वह मरीज के काम न आ सके, तो यह केवल वित्तीय नुकसान नहीं बल्कि स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता से जुड़ा सवाल भी बन जाता है।

जर्मनी से आया उपकरण, लेकिन जगह ही नहीं मिली

मामले का एक और हैरान करने वाला उदाहरण KUGEL Grossing Station से जुड़ा बताया गया है। यह उपकरण जर्मनी से कैंसर के नमूनों की जांच और टिश्यू प्रोसेसिंग से संबंधित काम के लिए आया था।

लेकिन समस्या यह थी कि अस्पताल में इसे स्थापित करने के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध नहीं थी।

यानी उपकरण खरीदा गया, अस्पताल पहुंचा, लेकिन उसे इस्तेमाल करने के लिए आवश्यक स्थान की योजना पहले से सुनिश्चित नहीं की गई। ऐसी स्थिति सरकारी खरीद प्रक्रिया और अस्पताल की योजना के बीच तालमेल पर सवाल खड़े करती है।

यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि किसी महंगे मेडिकल उपकरण की खरीद से पहले यह क्यों सुनिश्चित नहीं किया गया कि उसे स्थापित करने के लिए आवश्यक कमरा, बिजली, तकनीकी ढांचा और प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध हैं या नहीं।

रेडियोलॉजिस्ट नहीं, बंद पड़ा अल्ट्रासाउंड

मैनपावर की कमी का एक और उदाहरण डॉ. बी.आर. सुर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एवं रिसर्च सेंटर से जुड़ा बताया गया है।

यहां करीब ₹19 लाख की अल्ट्रासाउंड मशीन उपलब्ध है और मशीन के चालू होने के बावजूद उसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। वजह बताई गई कि अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं है।

इस मामले ने एक अहम सवाल खड़ा किया है—जब अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर का पद ही पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं है, तो ऐसी मशीन खरीदने की योजना किस आधार पर बनाई गई?

अगर मशीन के साथ विशेषज्ञ की व्यवस्था पहले से होती, तो मरीजों को उसका लाभ मिल सकता था।

DDU अस्पताल में भी महंगे उपकरण बेकार

दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल यानी DDU अस्पताल में भी कई उपकरणों के इस्तेमाल को लेकर सवाल सामने आए हैं।

Eye Bank शुरू करने के उद्देश्य से 2019-20 में करीब ₹22.15 लाख के आधुनिक उपकरण खरीदे गए थे। इनमें स्पेक्युलर माइक्रोस्कोप और लैमिनार एयर फ्लो से जुड़े उपकरण शामिल थे।

लेकिन प्रशिक्षित कॉर्निया विशेषज्ञ और डॉक्टरों की कमी के कारण इन उपकरणों का इस्तेमाल शुरू नहीं हो सका।

यानी यहां भी समस्या मशीन की गुणवत्ता या उपलब्धता नहीं, बल्कि मैनपावर और विशेषज्ञता की कमी बनी।

₹1.26 करोड़ का बायोकैमिस्ट्री एनालाइजर भी सवालों में

DDU अस्पताल के लैब मेडिसिन विभाग में करीब ₹1.26 करोड़ का बायोकैमिस्ट्री एनालाइजर भी उपयोग से बाहर होने की बात सामने आई है।

बताया गया कि आवश्यक रीएजेंट उपलब्ध नहीं होने के कारण मशीन का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा था। अब इसे कंडम घोषित करने की प्रक्रिया में डाले जाने की जानकारी सामने आई है।

यह स्थिति सरकारी खरीद व्यवस्था पर एक और सवाल खड़ा करती है। यदि मशीन के साथ नियमित रूप से इस्तेमाल होने वाले रीएजेंट और अन्य जरूरी उपभोग्य सामग्री की व्यवस्था नहीं है, तो महंगी मशीन खरीदने का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है।

कोविड के दौरान मिले उपकरण भी पड़े हैं

कोरोना महामारी के दौरान दिल्ली के सरकारी अस्पतालों को बड़ी संख्या में वेंटिलेटर, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, BiPAP मशीन और मरीजों की निगरानी करने वाले मॉनिटर उपलब्ध कराए गए थे।

महामारी के दौरान इन उपकरणों की बेहद जरूरत थी। लेकिन संक्रमण का दबाव कम होने के बाद इनमें से कई उपकरणों के इस्तेमाल और रखरखाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

DDU अस्पताल को 2021 में ₹94.82 लाख का मेडिकल ऑक्सीजन बफर टैंक दान में मिला था। आरोपित विवरण के अनुसार यह टैंक कभी मेडिकल गैस पाइपलाइन सिस्टम यानी MGPS से कनेक्ट ही नहीं किया गया।

अगर यह स्थिति सही है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उपकरण अस्पताल को मिलने के बाद उसके इंस्टॉलेशन और इस्तेमाल की जिम्मेदारी किसकी थी।

वेंटिलेटर और ऑक्सीजन उपकरणों का भी सवाल

DDU अस्पताल में कोविड काल के दौरान उपलब्ध कराए गए कई वेंटिलेटर, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर और BiPAP मशीनों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल सामने आए हैं।

इसी तरह लोक नायक अस्पताल में कोविड काल में उपलब्ध कराए गए पेशेंट मॉनिटर्स, BiPAP मशीनों और ऑक्सीजन कंसंट्रेटरों का बड़ा हिस्सा नियमित उपयोग में नहीं होने की बात सामने आई है।

हालांकि अस्पताल प्रशासन की ओर से यह तर्क दिया गया है कि जरूरत पड़ने पर कुछ उपकरणों को अलग-अलग वार्डों में भेजा जाता है।

इसलिए प्रत्येक उपकरण की वास्तविक स्थिति का अलग-अलग सत्यापन जरूरी है। केवल अस्पताल में रखा होना और पूरी तरह बेकार होना—दोनों बातें एक जैसी नहीं हैं।

26 अस्पतालों का ऑडिट क्यों महत्वपूर्ण है?

हाईकोर्ट ने PET Cyclotron के मामले को सामने आने के बाद केवल एक अस्पताल तक कार्रवाई सीमित नहीं रखी। अदालत ने दिल्ली सरकार के सभी अस्पतालों को निर्देश दिया कि वे अपने यहां खरीदे गए और इस्तेमाल में नहीं आ रहे उपकरणों की जानकारी दें।

अदालत ने विशेष रूप से कहा कि रिपोर्ट में उपकरण का नाम, उसका उद्देश्य, खरीद की लागत और वर्ष, वह इस्तेमाल में है या नहीं और अगर इस्तेमाल नहीं हो रहा है तो उसका कारण स्पष्ट किया जाए।

यानी अब सरकार को केवल यह नहीं बताना है कि कौन-सी मशीन बंद है, बल्कि यह भी बताना होगा कि वह क्यों बंद है और उसे दोबारा चालू करने के लिए क्या किया जा रहा है।

असली समस्या खरीद से ज्यादा योजना की?

इस पूरे मामले से एक बड़ा सवाल सामने आता है। क्या सरकारी अस्पतालों में महंगी मशीनें खरीदते समय उनके संचालन की पूरी योजना बनाई जाती है?

किसी उपकरण की खरीद से पहले यह देखना जरूरी है कि उसके लिए विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं या नहीं, प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी हैं या नहीं, मशीन लगाने की जगह है या नहीं, जरूरी बिजली और तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं और उसका लाइसेंस तथा रखरखाव कैसे होगा।

अगर इन सवालों का जवाब पहले नहीं खोजा गया तो मशीन खरीदने के बाद उसका इस्तेमाल मुश्किल हो सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश में भी उच्च तकनीक वाले चिकित्सा उपकरणों के रखरखाव और उन्हें कार्यशील बनाए रखने की जरूरत पर पहले से ध्यान दिए जाने का संदर्भ मिलता है।

मरीजों पर पड़ता है सबसे बड़ा असर

करोड़ों रुपये की मशीनों का इस्तेमाल न होना केवल सरकारी खजाने का मामला नहीं है। इसका सबसे बड़ा असर मरीजों पर पड़ता है।

सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज इलाज के लिए आते हैं जो निजी अस्पतालों में महंगी जांच और उपचार का खर्च नहीं उठा सकते। अगर सरकारी अस्पताल में मशीन मौजूद होने के बावजूद मरीज को जांच के लिए बाहर जाना पड़े, तो उसका अतिरिक्त खर्च बढ़ जाता है और इलाज में देरी भी हो सकती है।

खासकर कैंसर और गंभीर बीमारियों के मामले में समय महत्वपूर्ण होता है।

अब हाईकोर्ट की नजर में पूरा सिस्टम

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में जो रुख अपनाया है, उससे साफ है कि अदालत केवल एक मशीन के बंद होने को लेकर चिंतित नहीं है। सवाल पूरे सरकारी स्वास्थ्य तंत्र में संसाधनों के इस्तेमाल और जवाबदेही का है।

26 या उससे अधिक सरकारी अस्पतालों में उपकरणों की स्थिति सामने आने के बाद यह पता चल सकेगा कि समस्या कितनी व्यापक है और कितनी मशीनें वास्तव में उपयोग से बाहर हैं।

अब असली सवाल यह है कि ऑडिट में सामने आने वाली मशीनों को दोबारा उपयोग में लाने के लिए सरकार क्या कदम उठाती है।

करोड़ों की मशीनें धूल न खाएं, यही सबसे बड़ी चुनौती

दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में अत्याधुनिक उपकरण उपलब्ध होना निश्चित रूप से अच्छी बात है, लेकिन उनका इस्तेमाल होना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

मशीन खरीदना किसी परियोजना का अंतिम चरण नहीं बल्कि शुरुआत है। उसके बाद विशेषज्ञ डॉक्टर, तकनीकी स्टाफ, प्रशिक्षण, रखरखाव, लाइसेंस, जगह और जरूरी उपभोग्य सामग्री की व्यवस्था करनी पड़ती है।

PET Cyclotron के मामले में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ने इसी पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।

अब आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दिल्ली सरकार के अस्पतालों की ऑडिट रिपोर्ट में कितने करोड़ रुपये के उपकरण निष्क्रिय मिलते हैं और उनमें से कितनों को दोबारा मरीजों के इलाज के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

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