Breaking News

नेपाल में कुदरत का कहर! 95 मौतों के बाद 1000 लोग लापता, 19 पुल और 11 हाइड्रो प्रोजेक्ट तबाह—सैलाब ने मचाई ऐसी तबाही



नेपाल में बुधवार को आई भीषण फ्लैश फ्लड ने हिमालयी क्षेत्र में भारी तबाही मचा दी। भोटेकोशी नदी में अचानक आए तेज सैलाब ने रसुवा से लेकर नुवाकोट, धादिंग और चितवन तक कई इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। पानी के साथ आया मलबा इतना शक्तिशाली था कि घर, बाजार, सड़कें, पुल और बिजली से जुड़े ढांचे तक बह गए। कई इलाकों में लोगों का संपर्क पूरी तरह टूट गया है और बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं।

दिन बढ़ने के साथ इस आपदा की गंभीरता सामने आती गई। विभिन्न रिपोर्टों में मृतकों और लापता लोगों के आंकड़े अलग-अलग समय पर बदलते रहे हैं। शाम तक कई अंतरराष्ट्रीय और भारतीय रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 95 तक पहुंचने और सैकड़ों लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई। वहीं नेपाल के आपदा प्राधिकरण और स्थानीय प्रशासन की कुछ शुरुआती गणनाओं में अलग आंकड़े सामने आए थे। इसका मुख्य कारण यह है कि कई प्रभावित इलाकों में संचार और सड़क संपर्क टूट चुका है और बचाव दल अभी भी दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।

नेपाल पर्यटन बोर्ड की प्रारंभिक सूची के मुताबिक 384 यात्रियों का संपर्क नहीं हो पा रहा था, जिनमें 291 विदेशी नागरिक और 93 नेपाली नागरिक शामिल थे। विदेशी नागरिकों में 105 भारतीयों के भी लापता होने की जानकारी सामने आई है। इन आंकड़ों को अंतिम संख्या नहीं माना जा रहा, क्योंकि ट्रैवल एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन से लगातार नई जानकारी जुटाई जा रही है।

सुबह अचानक आया सैलाब, किसी को संभलने का मौका नहीं मिला

रिपोर्टों के मुताबिक बुधवार सुबह करीब 9 बजे भोटेकोशी नदी में अचानक बेहद तेज बहाव आया। कुछ ही समय में नदी का पानी किनारों से बाहर निकल गया और आसपास के इलाकों में मलबे के साथ तेजी से फैलने लगा।

रसुवा जिले का टिमुरे, स्याफ्रुबेसी और आसपास के क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित बताए गए हैं। इसके बाद पानी और मलबा नीचे की ओर बढ़ता हुआ नुवाकोट और धादिंग तक पहुंचा। कई स्थानों पर सड़कें टूट गईं और पुल पानी के तेज बहाव में बह गए। प्रभावित इलाकों में राहत एवं बचाव अभियान जारी है।

कई जगहों पर बाढ़ का बहाव इतना तेज था कि स्थानीय लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने का भी समय नहीं मिला। नदियों के किनारे बने बाजार और बस्तियों में पानी के साथ भारी मात्रा में पत्थर, मिट्टी और अन्य मलबा पहुंचा, जिससे नुकसान और बढ़ गया।

आखिर इतनी कम बारिश में इतनी बड़ी बाढ़ कैसे आई?

इस आपदा का सबसे बड़ा सवाल यही है कि भोटेकोशी नदी में अचानक इतना विशाल सैलाब आया कैसे?

उपलब्ध शुरुआती वैज्ञानिक आकलनों के मुताबिक यह सामान्य बारिश से पैदा हुई बाढ़ नहीं थी। रॉयटर्स ने अधिकारियों और शुरुआती विश्लेषणों के हवाले से बताया कि नेपाल-तिब्बत सीमा के पास चट्टानों और मलबे के खिसकने से ल्हेंदे नदी का बहाव बाधित हुआ हो सकता है। इसके पीछे 4.4 तीव्रता के भूकंप की भूमिका की भी जांच की जा रही है। यदि किसी पहाड़ी हिस्से के खिसकने से नदी का रास्ता कुछ समय के लिए बंद हुआ और फिर यह प्राकृतिक अवरोध अचानक टूटा, तो उसके पीछे जमा पानी और मलबा एक साथ नीचे की ओर आ सकता है।

यही प्रक्रिया फ्लैश फ्लड को सामान्य नदी की बाढ़ से कहीं ज्यादा खतरनाक बना देती है। इसमें पानी धीरे-धीरे बढ़ने के बजाय अचानक बेहद तेज रफ्तार से नीचे की ओर आता है।

नदी के रास्ते में आया मलबा बना तबाही की वजह

हिमालयी इलाकों में ऊंचाई पर मौजूद चट्टानें, बर्फ और ढलानें अस्थिर होने पर अचानक नीचे खिसक सकती हैं। अगर ऐसा मलबा नदी के रास्ते में जमा हो जाए तो अस्थायी बांध जैसा बन सकता है।

कुछ समय तक पानी इसके पीछे जमा होता रहता है। लेकिन जब यह प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो पानी सामान्य बहाव की तुलना में कहीं ज्यादा ताकत के साथ नीचे आता है। इस तरह की घटना को फ्लैश फ्लड और मलबा-प्रवाह की स्थिति के रूप में देखा जाता है।

भोटेकोशी की इस घटना में भी शुरुआती जांच इसी तरह की प्राकृतिक प्रक्रिया की ओर इशारा कर रही है। हालांकि अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष के लिए विस्तृत सर्वेक्षण और अध्ययन जरूरी होगा।

सड़क और पुल हुए तबाह

बाढ़ ने नेपाल की परिवहन व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया है। नेपाल के सड़क विभाग के शुरुआती आकलन के अनुसार कम से कम 19 पुल क्षतिग्रस्त हुए हैं और करीब 40 किलोमीटर सड़कें क्षतिग्रस्त या बह गई हैं। इससे प्रभावित इलाकों का संपर्क दूसरे क्षेत्रों से टूट गया है।

सड़क और पुल टूटने का सबसे बड़ा असर राहत कार्य पर पड़ता है। जिन इलाकों में जमीन के रास्ते राहत सामग्री और बचाव दल आसानी से पहुंच सकते थे, वहां अब मलबे और टूटे रास्तों की वजह से पहुंचना मुश्किल हो गया है।

इसी कारण हेलीकॉप्टरों पर निर्भरता बढ़ गई है। लेकिन पहाड़ी क्षेत्र में खराब मौसम और कम दृश्यता के कारण हवाई अभियान भी लगातार चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

हेलीकॉप्टर से 88 लोगों को बचाया गया

नेपाल सेना ने राहत और बचाव अभियान में हेलीकॉप्टरों को उतारा है। सेना के मुताबिक बुधवार दोपहर तक 88 लोगों को हवाई अभियान के जरिए सुरक्षित निकाला गया था। इनमें से 13 लोगों को इलाज के लिए काठमांडू के त्रिभुवन यूनिवर्सिटी टीचिंग हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जबकि अन्य लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।

बचाव अभियान के लिए सेना और निजी कंपनियों के हेलीकॉप्टर लगाए गए थे। लेकिन खराब मौसम के कारण कई उड़ानों को बीच रास्ते से वापस लौटना पड़ा। कुछ हेलीकॉप्टर राहत सामग्री लेकर प्रभावित क्षेत्रों की ओर गए थे, लेकिन मौसम की स्थिति खराब होने के कारण उन्हें भी काठमांडू लौटना पड़ा।

यही वजह है कि लापता लोगों तक पहुंचना बचाव दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।

105 भारतीयों के लापता होने से बढ़ी चिंता

नेपाल में इस आपदा के बाद भारत में भी चिंता बढ़ गई है। नेपाल पर्यटन बोर्ड की शुरुआती सूची के मुताबिक 291 विदेशी नागरिकों का संपर्क नहीं हो पा रहा था, जिनमें 105 भारतीय नागरिक शामिल थे। यह संख्या ट्रैवल एजेंसियों से मिली शुरुआती जानकारी पर आधारित है और इसकी पुष्टि की प्रक्रिया जारी है।

कई भारतीय यात्री कैलाश मानसरोवर यात्रा के सिलसिले में इस क्षेत्र से गुजर रहे थे। प्रभावित इलाके नेपाल-तिब्बत सीमा के नजदीक हैं और यहां से कैलाश मानसरोवर यात्रा के रास्ते जुड़े हुए हैं। ऐसे में यात्रियों के परिवारों में चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।

भारतीय अधिकारियों की ओर से नेपाल के साथ संपर्क बनाए रखने और प्रभावित भारतीयों की स्थिति का पता लगाने की कोशिश की जा रही है।

सुरक्षाकर्मी और हाइड्रोपावर कर्मचारी भी फंसे

यह आपदा केवल आम नागरिकों और पर्यटकों तक सीमित नहीं रही। राहत, सुरक्षा और सीमा से जुड़े काम में तैनात कई कर्मचारी भी इसकी चपेट में आए हैं।

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद में बताया कि प्रभावित इलाकों में पुलिस, सशस्त्र पुलिस और नेपाली सेना के कई जवान संपर्क से बाहर हैं। उनके अनुसार 26 पुलिसकर्मी, 9 सशस्त्र पुलिसकर्मी और 44 नेपाली सेना के जवान लापता लोगों में शामिल हैं।

इसके अलावा रसुवा के लांगटांग खोला जलविद्युत परियोजना से जुड़े करीब 60 लोग भी संपर्क से बाहर बताए गए हैं। परियोजना से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक इनमें इंजीनियर, ड्राइवर, रसोई कर्मचारी और सुरंग के अंदर काम करने वाले कर्मचारी शामिल हैं।

बिजली व्यवस्था को भी भारी नुकसान

बाढ़ ने नेपाल के ऊर्जा क्षेत्र को भी बड़ा झटका दिया है। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक कई जलविद्युत परियोजनाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। एक रिपोर्ट में 11 जलविद्युत परियोजनाओं और एक सौर ऊर्जा केंद्र को नुकसान पहुंचने तथा करीब 431.1 मेगावाट क्षमता के बिजली उत्पादन के राष्ट्रीय ग्रिड से बाहर होने की जानकारी दी गई है। यह आंकड़ा प्रारंभिक है और नुकसान का आकलन आगे बदल सकता है।

नेपाल की अर्थव्यवस्था में जलविद्युत क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। ऐसे में परियोजनाओं को नुकसान केवल तत्काल बिजली संकट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि निर्माण और संचालन से जुड़े आर्थिक नुकसान का असर भी लंबे समय तक रह सकता है।

बैंक और टेलीकॉम नेटवर्क भी प्रभावित

बाढ़ के कारण कई इलाकों में बैंक शाखाओं और अन्य संस्थानों को भी नुकसान पहुंचा है। नेपाल के बैंकर्स एसोसिएशन के मुताबिक रसुवा में कई वाणिज्यिक बैंक शाखाएं बाढ़ की चपेट में आईं और कई कर्मचारियों से संपर्क नहीं हो पा रहा था।

दूसरी तरफ टेलीकॉम नेटवर्क बाधित होने से प्रभावित परिवारों के लिए अपने रिश्तेदारों से संपर्क करना मुश्किल हो गया है। मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट कनेक्टिविटी प्रभावित होने से राहत एजेंसियों के लिए भी लोगों की सही स्थिति जानना कठिन हो रहा है।

यही कारण है कि लापता लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आ रहे हैं।

खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ

बाढ़ का पानी कम होने के बावजूद खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा रहा। नेपाल के अधिकारियों ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के किनारे रहने वाले लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। लगातार खराब मौसम, कमजोर पहाड़ी ढलान और ऊपर की तरफ मौजूद मलबे के कारण आगे भी अचानक पानी बढ़ने का जोखिम बना हुआ है।

रॉयटर्स के अनुसार विशेषज्ञों को संभावित दूसरे बाढ़-प्रवाह की भी चिंता है, क्योंकि ऊपरी हिस्से में बना कोई प्राकृतिक अवरोध टूटने की स्थिति में नीचे के इलाकों में फिर से अचानक पानी और मलबा आ सकता है।

इसलिए प्रशासन ने लोगों से नदियों, पुलों और बाढ़ प्रभावित इलाकों से दूर रहने की अपील की है।

भारत भी मदद के लिए तैयार

नेपाल की इस त्रासदी पर भारत ने भी सहायता का भरोसा दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बातचीत कर संवेदना जताई और हर संभव मानवीय सहायता देने की बात कही। भारत की ओर से राहत और बचाव में सहयोग की तैयारी की जा रही है।

भारतीय एजेंसियां नेपाल में मौजूद भारतीय नागरिकों की स्थिति की जानकारी जुटाने में भी लगी हैं। इस बीच भारत-नेपाल सीमा से लगे भारतीय राज्यों में भी प्रशासन को सतर्क किया गया है, क्योंकि नेपाल से आने वाली नदियों के जलस्तर में बदलाव का असर सीमा से लगे क्षेत्रों पर पड़ सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल—लापता लोगों का क्या हुआ?

नेपाल में आई इस बाढ़ ने एक साथ कई मोर्चों पर संकट पैदा किया है। सड़कों और पुलों के टूटने से संपर्क बाधित है, टेलीकॉम नेटवर्क प्रभावित है, बिजली परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा है और खराब मौसम के कारण हेलीकॉप्टर अभियान भी पूरी क्षमता से नहीं चल पा रहा।

सबसे बड़ी चिंता उन सैकड़ों लोगों को लेकर है जिनसे अभी तक संपर्क नहीं हो सका है। नेपाल पर्यटन बोर्ड की शुरुआती सूची में 384 यात्रियों के लापता होने की जानकारी है, जिनमें 291 विदेशी नागरिक और 93 नेपाली नागरिक शामिल हैं। इनमें 105 भारतीय भी बताए गए हैं।

वहीं अलग-अलग सरकारी और मीडिया अपडेट में कुल मृतकों की संख्या भी तेजी से बदलती रही है। कुछ आधिकारिक स्थानीय गणनाओं में देर शाम तक 72 या उससे कम मौतों की पुष्टि थी, जबकि बाद की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 95 तक पहुंचने की जानकारी दी गई। इसलिए अंतिम आधिकारिक आंकड़े का इंतजार जरूरी है।

फिलहाल नेपाली सेना, पुलिस और अन्य बचाव दल लगातार अभियान चला रहे हैं। हेलीकॉप्टरों से लोगों को निकालने के साथ-साथ जमीन पर भी खोज अभियान जारी है। नेपाल के लिए अब हर गुजरता घंटा बेहद महत्वपूर्ण है—क्योंकि मलबे के नीचे, टूटे रास्तों के उस पार और संपर्क से बाहर इलाकों में फंसे लोगों तक पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

कोई टिप्पणी नहीं