पहले नाम-पता गायब किया, फिर अचानक वापस लाया विभाग! बिजली बिल का पूरा मामला क्या है?
लखनऊ: बिजली उपभोक्ताओं के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। बिजली बिल पर उपभोक्ताओं का नाम और पता स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं होने की व्यवस्था को पावर कॉरपोरेशन ने वापस ले लिया है। अब अगस्त महीने में जारी किए जा रहे बिजली बिलों में पहले की तरह उपभोक्ताओं का नाम और पूरा पता स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।
दरअसल, पिछले महीने बिजली बिल को लेकर अचानक एक बदलाव किया गया था। बिल तैयार करने वाले सॉफ्टवेयर में बदलाव के बाद उपभोक्ताओं के नाम और पते के कई अक्षरों की जगह ‘X’ दिखाई देने लगा था। शुरुआत में यह बदलाव सामान्य तकनीकी प्रक्रिया का हिस्सा माना गया, लेकिन जल्द ही इसका असर उन लाखों उपभोक्ताओं पर पड़ने लगा जो बिजली बिल को अपने पते के प्रमाण के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
नाम और पता स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देने के कारण लोगों को बैंक, सरकारी विभागों और दूसरी जरूरी सेवाओं में दस्तावेज जमा करने के दौरान परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। मामले को लेकर राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने भी आपत्ति जताई थी। इसके बाद पावर कॉरपोरेशन ने सॉफ्टवेयर में दोबारा बदलाव किया और पुरानी व्यवस्था बहाल कर दी।
अगस्त के बिल में फिर साफ दिख रहा नाम और पता
नए बदलाव के बाद अगस्त में जारी होने वाले बिजली बिलों में उपभोक्ताओं को पहले की तरह उनका नाम और पता स्पष्ट रूप से दर्ज दिखाई दे रहा है। इससे उन लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है जिन्हें बिजली बिल को पते के दस्तावेज के रूप में इस्तेमाल करना पड़ता है।
पिछले महीने बिल में नाम और पते के कुछ हिस्सों की जगह ‘X’ आने के कारण यह स्पष्ट करना मुश्किल हो गया था कि बिल वास्तव में किस व्यक्ति और किस पते से संबंधित है। ऐसे में उपभोक्ताओं के लिए यह सिर्फ बिजली भुगतान से जुड़ी समस्या नहीं थी, बल्कि पहचान और पते के प्रमाण से जुड़ा मामला भी बन गया था।
अब पावर कॉरपोरेशन के सॉफ्टवेयर में किए गए बदलाव के बाद यह समस्या दूर कर दी गई है।
आखिर क्यों हटाया गया था नाम और पता?
बताया गया कि पिछले महीने पावर कॉरपोरेशन ने बिजली बिल बनाने वाले सॉफ्टवेयर में बदलाव किया था। इसके पीछे उपभोक्ताओं की व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित होने से रोकने का उद्देश्य बताया गया था।
इसी व्यवस्था के तहत उपभोक्ताओं के नाम और पते के कुछ अक्षरों को हटाकर उनकी जगह ‘X’ प्रदर्शित किया जाने लगा। माना गया कि इससे बिजली बिल देखने वाले किसी बाहरी व्यक्ति को उपभोक्ता की पूरी व्यक्तिगत जानकारी आसानी से उपलब्ध नहीं होगी।
हालांकि, व्यवस्था लागू करते समय इसका दूसरा पहलू सामने नहीं आया। बड़ी संख्या में लोग बिजली बिल का इस्तेमाल अपने पते के प्रमाण के तौर पर करते हैं। जब बिल पर नाम और पता ही स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देगा तो कई जगह यह दस्तावेज उपयोगी नहीं रहेगा।
यही वजह रही कि इस बदलाव के खिलाफ उपभोक्ताओं की परेशानी सामने आने लगी।
उपभोक्ता परिषद ने जताई थी आपत्ति
मामले को लेकर राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने पावर कॉरपोरेशन और नियामक आयोग के सामने आपत्ति दर्ज कराई थी।
उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष और राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए इसे विद्युत वितरण संहिता-2003 की भावना के विपरीत बताया था।
उनका कहना था कि बिजली बिल सिर्फ बिजली का भुगतान करने के लिए जारी किया जाने वाला कागज नहीं है। उपभोक्ता लंबे समय से इसे विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी कामों में पते के दस्तावेज के तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं।
आपत्ति दर्ज होने के बाद इस मामले पर पावर कॉरपोरेशन के स्तर पर भी विचार किया गया और अंततः सॉफ्टवेयर में फिर से बदलाव किया गया।
बिजली बिल सिर्फ भुगतान की रसीद नहीं
अवधेश कुमार वर्मा के मुताबिक, बिजली बिल उपभोक्ताओं के लिए कई महत्वपूर्ण कामों में उपयोगी दस्तावेज है। लोग इसे आधार से जुड़े काम, पासपोर्ट, बैंक खाते, ड्राइविंग लाइसेंस, गैस कनेक्शन और दूसरे सरकारी कार्यों में पते के प्रमाण के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
ऐसे में बिल पर उपभोक्ता का नाम और पता स्पष्ट रूप से दर्ज होना बेहद महत्वपूर्ण है।
अगर बिल में नाम और पते की जगह सिर्फ कुछ अक्षर या ‘X’ दिखाई दें तो दस्तावेज की उपयोगिता प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि उपभोक्ता परिषद ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज कराते हुए व्यवस्था को वापस लेने की मांग की थी।
अब अगस्त के बिल में पुरानी व्यवस्था लौटने से उपभोक्ताओं को राहत मिली है।
बिना नियामक आयोग की अनुमति के लिया गया था फैसला?
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है। सूत्रों के अनुसार, उपभोक्ताओं के नाम और पते को स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं करने की व्यवस्था लागू करने से पहले पावर कॉरपोरेशन की ओर से नियामक आयोग से अनुमति नहीं ली गई थी।
बताया जा रहा है कि नाम और पते को आंशिक रूप से छिपाने का उद्देश्य उपभोक्ताओं की व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक होने से रोकना था। लेकिन इस फैसले के लागू होने के बाद इसके व्यावहारिक असर सामने आने लगे।
बिजली बिल को पते के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल करने वाले लोगों को परेशानी हुई और मामला उपभोक्ता संगठनों तक पहुंच गया।
इसके बाद पावर कॉरपोरेशन को अपना फैसला वापस लेना पड़ा।
अब सामने आया बिजली व्यवस्था से जुड़ा दूसरा बड़ा सवाल
बिजली बिल में नाम-पता वापस दर्ज करने से उपभोक्ताओं को राहत तो मिली है, लेकिन इसी के साथ बिजली व्यवस्था में बड़े पैमाने पर किए जा रहे खर्च और उसके परिणाम को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने रिवैंप्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम यानी RDSS के तहत खर्च और काम की समीक्षा की मांग की है।
इस योजना के तहत बिजली वितरण व्यवस्था को आधुनिक बनाने और उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव है।
RDSS में 44 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का प्रस्ताव
राज्य में RDSS के तहत कुल 44,094 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव बताया गया है। इसमें करीब 27 हजार करोड़ रुपये स्मार्ट मीटर लगाने पर खर्च किए जाने हैं।
इसके अलावा बिजली व्यवस्था से जुड़े कई दूसरे काम भी इस योजना में शामिल हैं। इनमें छूटे हुए मजरों का विद्युतीकरण, बिजली आपूर्ति के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, नए ट्रांसफॉर्मर लगाना और एरियल बंच कंडक्टर लगाने जैसे कार्य शामिल हैं।
योजना का उद्देश्य बिजली वितरण व्यवस्था को आधुनिक और बेहतर बनाना है। इसके जरिए बिजली कटौती और ब्रेकडाउन कम करने, बिलिंग व्यवस्था में सुधार करने और उपभोक्ताओं की शिकायतों का बेहतर समाधान करने का दावा किया गया था।
लेकिन उपभोक्ता परिषद का कहना है कि बड़ी रकम खर्च होने के बावजूद जमीन पर उपभोक्ताओं को अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा है।
करीब एक करोड़ स्मार्ट मीटर लगने के बाद भी सवाल
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक राज्य में करीब एक करोड़ स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं। बिजली के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए प्रस्तावित कई काम भी पूरे होने की बात कही जा रही है।
इसके बावजूद उपभोक्ताओं की शिकायतें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।
उपभोक्ता परिषद का आरोप है कि बिजली बिल, शिकायतों के निस्तारण और बिजली कनेक्शन जैसी सेवाओं में अभी भी कई समस्याएं बनी हुई हैं।
परिषद के अनुसार, पिछले 15 महीनों में राज्य के करीब 67 हजार उपभोक्ताओं को पहली बार बिजली बिल नहीं मिला। इसके अलावा कुछ उपभोक्ताओं के मीटर में रिचार्ज होने के बावजूद कनेक्शन दोबारा शुरू नहीं हुआ।
इन मामलों को लेकर नियामक आयोग की ओर से पावर कॉरपोरेशन पर जुर्माना लगाए जाने की बात भी सामने आई है।
1912 पर शिकायतों के समाधान को लेकर भी सवाल
बिजली विभाग की शिकायतों के लिए 1912 हेल्पलाइन उपलब्ध है। लेकिन उपभोक्ता परिषद का कहना है कि इस नंबर पर आने वाली सभी शिकायतों का निर्धारित समय में समाधान नहीं हो पा रहा है।
अगर किसी उपभोक्ता को बिजली बिल में गड़बड़ी, मीटर की समस्या, कनेक्शन से जुड़ी परेशानी या बिजली आपूर्ति में दिक्कत हो और शिकायत का समय पर समाधान न हो, तो इससे पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।
उपभोक्ता परिषद ने यह भी कहा है कि बिजली उपभोक्ताओं को मुआवजा देने से संबंधित नियमों का भी पूरी तरह पालन नहीं हो पाया है।
किस डिस्कॉम के लिए कितनी रकम?
RDSS के तहत अलग-अलग बिजली वितरण कंपनियों के लिए बड़ी रकम प्रस्तावित है।
| डिस्कॉम | प्रस्तावित खर्च |
|---|---|
| मध्यांचल | ₹13,539.33 करोड़ |
| पश्चिमांचल | ₹12,695.42 करोड़ |
| पूर्वांचल | ₹9,481.52 करोड़ |
| दक्षिणांचल | ₹7,434.66 करोड़ |
| केस्को | ₹943.33 करोड़ |
इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिजली वितरण व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए राज्य में कितने बड़े स्तर पर निवेश किया जा रहा है।
अब जवाबदेही तय करने की मांग
उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा का कहना है कि जब बिजली व्यवस्था को सुधारने के लिए इतनी बड़ी राशि खर्च की जा रही है, तो उसके परिणाम भी उपभोक्ताओं को दिखाई देने चाहिए।
उनका कहना है कि अगर स्मार्ट मीटर लगाने, बिजली के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और दूसरी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद बिलिंग, बिजली आपूर्ति और शिकायत निस्तारण की समस्याएं बनी रहती हैं तो इसकी गंभीर समीक्षा होनी चाहिए।
परिषद ने निचले स्तर से लेकर पावर कॉरपोरेशन के चेयरमैन स्तर तक जवाबदेही तय करने की मांग की है।
उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल राहत की खबर
फिलहाल सबसे बड़ी राहत यह है कि बिजली बिल में उपभोक्ताओं का नाम और पता दोबारा स्पष्ट रूप से दर्ज किया जा रहा है। इससे उन करोड़ों उपभोक्ताओं को फायदा होगा जो बिजली बिल को अपने पते के प्रमाण के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
हालांकि, इस पूरे मामले ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि बिजली व्यवस्था को डिजिटल और आधुनिक बनाने के दौरान उपभोक्ताओं की वास्तविक जरूरतों का कितना ध्यान रखा जा रहा है।
एक तरफ स्मार्ट मीटर और डिजिटल बिलिंग पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बिल पर उपभोक्ता का नाम और पता जैसे बुनियादी विवरण हटने से ही बड़ी परेशानी खड़ी हो गई।
अब नाम और पता वापस आ गया है, लेकिन RDSS के तहत किए जा रहे भारी-भरकम खर्च के बदले बिजली आपूर्ति, बिलिंग, शिकायत निस्तारण और उपभोक्ता सेवाओं में वास्तविक सुधार कब और कितना दिखाई देगा, यह आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल बना रहेगा।

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