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77 साल के मरीज की खुली छाती भी नहीं… डॉक्टरों ने दिल में किया ऐसा कमाल, जानकर रह जाएंगे हैरान!



पटना: इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) ने हृदय चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के कार्डियोलॉजी विभाग में पहली बार 77 वर्षीय हृदय रोगी का ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व इंप्लांटेशन (TAVI) सफलतापूर्वक किया गया। इस उपचार की सबसे खास बात यह रही कि मरीज की छाती खोले बिना ही खराब हो चुके एओर्टिक वाल्व की जगह नया कृत्रिम वाल्व प्रत्यारोपित किया गया।

मरीज पहले से कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा था। उसे गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस के साथ कोरोनरी आर्टरी डिजीज और फेफड़ों से जुड़ी बीमारी थी। इसके अलावा उसे प्रोस्टेट संबंधी समस्या भी थी और पूर्व में कोरोनरी स्टेंट लगाया जा चुका था। उम्र अधिक होने और कई बीमारियां साथ होने के कारण पारंपरिक ओपन-हार्ट सर्जरी में जोखिम काफी ज्यादा माना जा रहा था।

ऐसे में कार्डियोलॉजी विशेषज्ञों की टीम ने मरीज की विस्तृत जांच की और उसके लिए TAVI को अपेक्षाकृत उपयुक्त उपचार विकल्प माना। सफल प्रक्रिया के बाद IGIMS में आधुनिक और कम इनवेसिव हृदय उपचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

छाती खोले बिना बदला गया खराब वाल्व

TAVI की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पारंपरिक ओपन-हार्ट सर्जरी की तरह मरीज की छाती को खोलने की आवश्यकता नहीं होती। इस मामले में भी चिकित्सकों ने पैर की धमनी के रास्ते एक विशेष कैथेटर को हृदय तक पहुंचाया।

इसी कैथेटर की मदद से नया कृत्रिम एओर्टिक वाल्व खराब वाल्व की जगह लगाया गया। प्रक्रिया के दौरान पुराने वाल्व को निकालने की जरूरत नहीं पड़ती। नया वाल्व अपनी निर्धारित जगह पर फैलकर काम करना शुरू करता है और रक्त के प्रवाह को बेहतर बनाने में मदद करता है।

IGIMS कार्डियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. डॉ. रवि विष्णुप्रसाद के अनुसार, पूरी प्रक्रिया संस्थान की कैथ लैब में की गई। मरीज की छाती खोलने और हृदय को रोकने की जरूरत नहीं पड़ी।

आखिर क्या होता है एओर्टिक स्टेनोसिस?

एओर्टिक स्टेनोसिस हृदय से जुड़ी एक गंभीर स्थिति है। हमारे हृदय में एओर्टिक वाल्व रक्त को हृदय से शरीर की मुख्य धमनी यानी एओर्टा की ओर जाने में मदद करता है।

जब यह वाल्व मोटा, कठोर या संकीर्ण हो जाता है तो उसके पूरी तरह खुलने में परेशानी होती है। इसके कारण हृदय को शरीर तक पर्याप्त रक्त पहुंचाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ सकती है।

समय के साथ गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस हृदय पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। इसके कारण मरीज को सांस फूलने, सीने में दर्द या दबाव, जल्दी थकान, चक्कर आने और बेहोशी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

गंभीर मामलों में इसका इलाज नहीं होने पर हृदय की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है।

77 साल की उम्र में क्यों बढ़ गया था सर्जरी का जोखिम?

इस मरीज के मामले में चुनौती केवल एओर्टिक वाल्व की बीमारी नहीं थी। उसकी उम्र 77 वर्ष थी और साथ ही कई दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी मौजूद थीं।

उसे कोरोनरी आर्टरी डिजीज थी और पहले कोरोनरी स्टेंट भी लगाया जा चुका था। इसके अलावा फेफड़ों की बीमारी और प्रोस्टेट संबंधी समस्या भी थी।

ऐसी परिस्थितियों में किसी मरीज के लिए ओपन-हार्ट सर्जरी का जोखिम तय करते समय केवल हृदय की समस्या नहीं देखी जाती, बल्कि उसकी उम्र, दूसरी बीमारियां, शारीरिक स्थिति और सर्जरी के दौरान संभावित जटिलताओं का भी आकलन किया जाता है।

इसी व्यापक मूल्यांकन के बाद चिकित्सकों की टीम ने TAVI को इस मरीज के लिए उपयुक्त विकल्प माना।

पैर की धमनी से पहुंचा कैथेटर

TAVI प्रक्रिया में आमतौर पर एक कैथेटर को रक्त वाहिका के रास्ते हृदय तक पहुंचाया जाता है। इस मामले में भी पैर की धमनी के रास्ते कैथेटर को आगे बढ़ाकर एओर्टिक वाल्व तक पहुंचाया गया।

इसके बाद कृत्रिम वाल्व को निर्धारित स्थान पर लगाया गया। वाल्व के अपनी जगह पर स्थापित होने के बाद वह रक्त के प्रवाह के लिए रास्ता खोलने में मदद करता है।

इस तकनीक में बड़े चीरे और पारंपरिक ओपन-हार्ट सर्जरी की तुलना में कम इनवेसिव तरीका इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, यह हर मरीज के लिए उपयुक्त हो, ऐसा जरूरी नहीं है। इसका निर्णय विशेषज्ञों की टीम मरीज की पूरी मेडिकल स्थिति का आकलन करने के बाद करती है।

किन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है TAVI?

TAVI विशेष रूप से उन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण उपचार विकल्प बन सकती है, जिनमें गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस हो और ओपन-हार्ट सर्जरी का जोखिम अधिक माना जाता हो।

उम्रदराज मरीजों के अलावा ऐसे मरीज जिनको हृदय, फेफड़ों या अन्य गंभीर बीमारियां हों, उनके मामले में उपचार का विकल्प चुनना अधिक जटिल हो सकता है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर बुजुर्ग मरीज के लिए TAVI ही सबसे बेहतर उपचार है। मरीज की उम्र, वाल्व की संरचना, बीमारी की गंभीरता, अन्य स्वास्थ्य समस्याओं और सर्जिकल जोखिम समेत कई बातों पर विचार किया जाता है।

डॉक्टरों की पूरी टीम ने निभाई अहम भूमिका

IGIMS में हुई इस प्रक्रिया को सफल बनाने में कई विशेषज्ञों और स्वास्थ्यकर्मियों ने मिलकर काम किया। प्रक्रिया में डॉ. रवि विष्णुप्रसाद, डॉ. गौतम कुमार और डॉ. चंद्रभानु चंदन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

इसके अलावा रेजिडेंट डॉक्टरों, एनेस्थीसिया विशेषज्ञों, नर्सिंग स्टाफ और कैथ लैब तकनीशियनों ने भी प्रक्रिया में सहयोग किया।

हृदय संबंधी ऐसी जटिल प्रक्रियाओं में केवल मुख्य चिकित्सक ही नहीं, बल्कि पूरी मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। मरीज की जांच से लेकर प्रक्रिया, निगरानी और बाद की देखभाल तक कई स्तरों पर विशेषज्ञों के बीच समन्वय की जरूरत होती है।

TAVI ने बढ़ाई आधुनिक इलाज की उम्मीद

IGIMS में पहली बार इस तरह की प्रक्रिया का सफल होना संस्थान के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इससे उन मरीजों के लिए भी उम्मीद बढ़ सकती है, जिन्हें गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस है लेकिन किसी अन्य बीमारी या अधिक उम्र के कारण ओपन-हार्ट सर्जरी में ज्यादा जोखिम हो सकता है।

प्रो. डॉ. रवि विष्णुप्रसाद ने कहा कि गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस वाले ऐसे मरीजों के लिए TAVI नई उम्मीद है, जिनके लिए पारंपरिक ओपन-हार्ट सर्जरी उपयुक्त नहीं होती।

उन्होंने इस सफलता को संस्थान में आधुनिक हृदय चिकित्सा सुविधाओं और विशेषज्ञता के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

IGIMS प्रशासन ने टीम को दी बधाई

सफल TAVI प्रक्रिया के बाद संस्थान के निदेशक डॉ. बिंदे कुमार और उपनिदेशक डॉ. विभूति प्रसन्न सिन्हा ने चिकित्सकों और पूरी टीम को बधाई दी।

संस्थान में इस तरह की अत्याधुनिक प्रक्रिया का सफलतापूर्वक किया जाना बिहार में उन्नत हृदय चिकित्सा सेवाओं के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे गंभीर हृदय रोगियों को इलाज के लिए दूसरे बड़े चिकित्सा केंद्रों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

मरीज के लिए क्यों खास है यह उपलब्धि?

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 77 वर्षीय मरीज को एक साथ कई स्वास्थ्य समस्याएं थीं। ऐसे मरीज में किसी बड़े ऑपरेशन का निर्णय लेना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

TAVI के जरिए चिकित्सकों ने पैर की धमनी के रास्ते हृदय तक पहुंचकर खराब एओर्टिक वाल्व की जगह नया कृत्रिम वाल्व स्थापित किया। इस दौरान मरीज की छाती नहीं खोली गई।

यही वजह है कि इस प्रक्रिया को मरीज की स्थिति को देखते हुए एक महत्वपूर्ण उपचार विकल्प माना गया।

IGIMS में 77 वर्षीय मरीज का सफल TAVI उपचार बिहार में आधुनिक हृदय चिकित्सा के विस्तार की दिशा में एक अहम उपलब्धि है। गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस के साथ कोरोनरी आर्टरी डिजीज, फेफड़ों की बीमारी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे इस मरीज के लिए ओपन-हार्ट सर्जरी का जोखिम अधिक था।

विशेषज्ञों की टीम ने विस्तृत जांच और जोखिम के आकलन के बाद TAVI का विकल्प चुना। पैर की धमनी के रास्ते कैथेटर को हृदय तक पहुंचाकर खराब एओर्टिक वाल्व की जगह नया कृत्रिम वाल्व लगाया गया और इसके लिए मरीज की छाती खोलने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

यह उपलब्धि न केवल IGIMS की कार्डियोलॉजी टीम के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस से जूझ रहे उन मरीजों के लिए भी उम्मीद जगाती है, जिनमें पारंपरिक सर्जरी का जोखिम ज्यादा हो सकता है।

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