हाथ कांपने का इंतजार मत कीजिए! पार्किंसन आने से पहले शरीर देता है ये खामोश संकेत, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे नजरअंदाज?
पार्किंसन रोग का नाम सुनते ही अक्सर लोगों के दिमाग में सबसे पहले हाथों का कांपना आता है। आम धारणा है कि अगर किसी व्यक्ति के हाथ आराम की स्थिति में कांपने लगें तो यह पार्किंसन का संकेत हो सकता है। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार कहानी इतनी सीधी नहीं है। पार्किंसन रोग से जुड़े कुछ बदलाव हाथों में कंपकंपी दिखाई देने से पहले भी नजर आ सकते हैं।
यही वजह है कि शरीर में होने वाले छोटे और लगातार बने रहने वाले बदलावों को केवल उम्र बढ़ने या सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। हालांकि इनमें से किसी एक लक्षण का मतलब पार्किंसन रोग होना नहीं है। कई सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं में भी ऐसे संकेत दिखाई दे सकते हैं। सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी होती है।
पार्किंसन एक प्रगतिशील न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें दिमाग के कुछ हिस्सों में डोपामिन बनाने वाली तंत्रिका कोशिकाओं के काम में धीरे-धीरे कमी आने लगती है। इसके कारण शरीर की गतिविधियों, संतुलन और कई अन्य शारीरिक कार्यों पर असर पड़ सकता है। बीमारी हर व्यक्ति में एक जैसी नहीं होती और इसके शुरुआती संकेत भी अलग-अलग हो सकते हैं।
हाथ कांपना ही पहला संकेत नहीं
पार्किंसन से जुड़ा कंपकंपी यानी tremor सबसे ज्यादा पहचाना जाने वाला लक्षण है, लेकिन यह हर मरीज में शुरुआती या अनिवार्य लक्षण नहीं होता। कुछ लोगों में पहले शरीर की गति धीमी होने लगती है, चाल बदल जाती है या रोजमर्रा के काम करने का तरीका अलग नजर आने लगता है।
इसी वजह से शरीर के छोटे बदलावों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। खासतौर पर तब, जब कोई बदलाव लगातार बना रहे और समय के साथ बढ़ता दिखाई दे।
1. हाथों की स्वाभाविक गतिविधि कम होना
चलते समय आम तौर पर दोनों हाथ शरीर के साथ स्वाभाविक रूप से आगे-पीछे होते हैं। अगर किसी व्यक्ति का एक हाथ अचानक पहले की तुलना में कम हिलने लगे या एक तरफ की गतिविधि लगातार कम दिखाई दे, तो इसे ध्यान देने योग्य बदलाव माना जा सकता है।
पार्किंसन में शरीर के एक हिस्से से लक्षण शुरू होना आम बात हो सकती है। हालांकि केवल हाथ कम हिलाने से पार्किंसन का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। कंधे, हाथ या मांसपेशियों की दूसरी समस्याएं भी इसकी वजह हो सकती हैं।
2. शरीर की गतिविधियां धीमी पड़ना
पार्किंसन के शुरुआती बदलावों में bradykinesia यानी शरीर की गतिविधियों का धीमा होना महत्वपूर्ण लक्षण माना जाता है।
व्यक्ति को ऐसा लग सकता है कि रोज के काम पहले की तुलना में ज्यादा समय लेने लगे हैं। कपड़े पहनना, बटन लगाना, लिखना, खाना खाना या बिस्तर से उठना जैसे कामों में पहले से अधिक समय लग सकता है।
कई बार परिवार के लोग सबसे पहले इस बदलाव को नोटिस करते हैं। व्यक्ति की चाल धीमी हो सकती है और चेहरे के भाव भी पहले की तुलना में कम दिखाई दे सकते हैं।
3. लिखावट अचानक छोटी होने लगे
लिखावट में बदलाव भी एक संकेत हो सकता है। पार्किंसन से जुड़े कुछ लोगों में handwriting पहले की तुलना में छोटी और सिकुड़ी हुई होने लगती है। इसे चिकित्सा भाषा में micrographia कहा जाता है।
अगर किसी व्यक्ति की लिखावट अचानक बदल जाए और अक्षर लगातार छोटे होते जाएं, तो इसका कारण सिर्फ पार्किंसन ही नहीं है। हाथों की अन्य समस्याएं भी लिखावट को प्रभावित कर सकती हैं।
लेकिन यदि इसके साथ शरीर की गति धीमी होना या दूसरी न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लेना उचित है।
4. सूंघने की क्षमता में कमी
कुछ लोगों में पार्किंसन के मोटर लक्षणों से पहले ही सूंघने की क्षमता कम होने जैसी समस्या दिखाई दे सकती है। व्यक्ति को पहले की तुलना में गंध पहचानने में परेशानी हो सकती है।
हालांकि सूंघने की क्षमता कम होने के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। सर्दी-जुकाम, एलर्जी, नाक से जुड़ी समस्या या वायरल संक्रमण के बाद भी smell कम हो सकती है।
इसलिए केवल गंध पहचानने में परेशानी को पार्किंसन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन अगर यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है और अन्य बदलाव भी साथ दिखाई देते हैं, तो डॉक्टर से चर्चा करना बेहतर है।
5. नींद के दौरान असामान्य हरकतें
नींद में बहुत ज्यादा हिलना-डुलना, सपनों के दौरान हाथ-पैर चलाना या सपने के अनुसार आवाज निकालना कुछ लोगों में REM sleep behavior disorder से जुड़ा हो सकता है।
यह स्थिति कुछ न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ी हो सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इस तरह की नींद की समस्या वाले हर व्यक्ति को भविष्य में पार्किंसन होगा।
अगर कोई व्यक्ति बार-बार नींद में जोर से हरकत करता है या खुद या अपने साथी को चोट पहुंचने का खतरा बनता है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
6. कब्ज की समस्या भी हो सकती है संकेत
पार्किंसन रोग केवल शरीर की गति से जुड़ी बीमारी नहीं है। कुछ लोगों में कब्ज जैसी non-motor समस्याएं भी दिखाई दे सकती हैं।
लगातार कब्ज के कई सामान्य कारण हो सकते हैं, जैसे कम फाइबर वाला भोजन, पर्याप्त पानी न पीना, शारीरिक गतिविधि की कमी या कुछ दवाएं। इसलिए कब्ज को सीधे पार्किंसन से जोड़ना उचित नहीं है।
लेकिन यदि लंबे समय से कब्ज के साथ अन्य न्यूरोलॉजिकल बदलाव भी दिखाई दें, तो डॉक्टर को इसकी जानकारी देना महत्वपूर्ण हो सकता है।
7. आवाज में बदलाव
कुछ लोगों में आवाज धीमी या पहले की तुलना में कम स्पष्ट हो सकती है। परिवार के लोगों को लग सकता है कि व्यक्ति पहले जितनी तेज आवाज में बात नहीं कर रहा या उसकी आवाज में पहले जैसी स्पष्टता नहीं रही।
ऐसे बदलाव धीरे-धीरे आने के कारण व्यक्ति खुद उन्हें महसूस नहीं कर पाता। आसपास के लोग इन्हें पहले नोटिस कर सकते हैं।
हालांकि आवाज में बदलाव गले, सांस की समस्या या अन्य कारणों से भी हो सकता है। इसलिए इसे केवल पार्किंसन से जोड़ना सही नहीं होगा।
8. चेहरे के भाव कम होना
पार्किंसन में मांसपेशियों की गतिविधि धीमी होने के कारण चेहरे के भाव कम दिखाई दे सकते हैं। व्यक्ति पहले की तुलना में कम मुस्कुराता हुआ या कम भाव प्रदर्शित करता हुआ नजर आ सकता है।
कई बार परिवार इसे मूड में बदलाव समझ सकता है। लेकिन अगर चेहरे की गतिविधियों में लगातार बदलाव के साथ शरीर की गति भी धीमी हो रही हो, तो चिकित्सकीय सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
9. चाल और संतुलन में बदलाव
बीमारी आगे बढ़ने पर चलने के तरीके में बदलाव आ सकता है। कदम छोटे हो सकते हैं और शरीर आगे की ओर झुका हुआ दिखाई दे सकता है। कुछ लोगों को मुड़ने या दिशा बदलने में परेशानी महसूस हो सकती है।
हालांकि संतुलन की समस्या कई अन्य कारणों से भी हो सकती है। उम्र, मांसपेशियों की कमजोरी, कान की समस्या, आंखों की कमजोरी और दूसरी न्यूरोलॉजिकल स्थितियां भी इसकी वजह हो सकती हैं।
अगर चाल में अचानक या लगातार बदलाव दिखाई दे रहा है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
क्या हर कंपकंपी पार्किंसन होती है?
नहीं। हाथ कांपने के कई कारण हो सकते हैं। तनाव, ज्यादा कैफीन, कुछ दवाएं, थायरॉइड की समस्या और दूसरी न्यूरोलॉजिकल स्थितियां भी कंपकंपी का कारण बन सकती हैं।
इसी तरह हाथ कांपने की अनुपस्थिति का अर्थ यह भी नहीं है कि पार्किंसन नहीं हो सकता। पार्किंसन का निदान केवल एक लक्षण देखकर नहीं किया जाता।
डॉक्टर आम तौर पर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, लक्षणों, शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल जांच के आधार पर स्थिति का आकलन करते हैं। कुछ मामलों में अन्य बीमारियों को बाहर करने के लिए अतिरिक्त जांच की आवश्यकता पड़ सकती है।
कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
अगर शरीर में कोई बदलाव लगातार बना हुआ है, धीरे-धीरे बढ़ रहा है या रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित करने लगा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
खासतौर पर अगर शरीर की गति धीमी होने, एक तरफ के हाथ की गतिविधि कम होने, चाल बदलने, लिखावट में लगातार बदलाव, आवाज धीमी होने या आराम की स्थिति में कंपकंपी जैसे कई लक्षण एक साथ दिखाई दें, तो न्यूरोलॉजिस्ट या संबंधित चिकित्सक से सलाह लेना उचित है।
जल्दी डॉक्टर से संपर्क करने का फायदा यह है कि लक्षणों के पीछे का वास्तविक कारण पता लगाने की कोशिश समय रहते शुरू की जा सकती है।
पार्किंसन का मतलब जिंदगी रुक जाना नहीं
पार्किंसन एक प्रगतिशील बीमारी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मरीज सामान्य जीवन पूरी तरह छोड़ देता है। उपचार, व्यायाम, फिजियोथेरेपी, संतुलित दिनचर्या और डॉक्टर की सलाह से कई लोगों को लंबे समय तक अपनी दैनिक गतिविधियां बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
बीमारी की प्रकृति हर व्यक्ति में अलग हो सकती है। इसलिए इंटरनेट पर पढ़े किसी एक लक्षण के आधार पर खुद से बीमारी का निष्कर्ष निकालने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना सबसे बेहतर तरीका है।
पार्किंसन की पहचान केवल हाथ कांपने से नहीं होती। शरीर की गतिविधियों का धीमा होना, लिखावट में बदलाव, सूंघने की क्षमता कम होना, नींद में असामान्य हरकतें, आवाज धीमी होना, चेहरे के भाव कम होना और चाल में बदलाव जैसे कई संकेत कुछ लोगों में बीमारी के शुरुआती चरणों से जुड़े हो सकते हैं।
लेकिन इन सभी लक्षणों के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं। इसलिए किसी एक संकेत को देखकर घबराने की जरूरत नहीं है। सबसे जरूरी बात है कि शरीर में लगातार हो रहे असामान्य बदलावों को नजरअंदाज न करें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सही सलाह लें।

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