नेपाल जैसी तबाही अब कश्मीर में भी? 5 ग्लेशियल झीलों ने बढ़ाई टेंशन, खतरे में हजारों इमारतें!
नेपाल में हुई विनाशकारी हिमालयी बाढ़ ने पूरे क्षेत्र में ग्लेशियरों, ग्लेशियल झीलों और ऊंचाई वाले इलाकों में बदलती प्राकृतिक परिस्थितियों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने के बाद बर्फ, चट्टान और मलबे का विशाल बहाव नदी तंत्र में पहुंचा और देखते ही देखते निचले इलाकों में तबाही मच गई। इस घटना में जान-माल का भारी नुकसान हुआ। वैज्ञानिकों का कहना है कि गर्म होते हिमालय में इस तरह की घटनाओं के खतरे को गंभीरता से लेने की जरूरत है।
नेपाल की इस त्रासदी ने जम्मू-कश्मीर में भी ग्लेशियल झीलों से जुड़े संभावित खतरों पर ध्यान खींचा है। हाल ही में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में कश्मीर हिमालय की 155 ग्लेशियल झीलों का आकलन किया गया। अध्ययन में पांच झीलों—ब्रमसार, चिरसार, नंडकोल, गंगाबल और भागसर—को GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड के लिहाज से ‘वेरी हाई’ संवेदनशीलता वाली श्रेणी में रखा गया है। अध्ययन के अनुसार, इन झीलों से संभावित बाढ़ की स्थिति में हजारों इमारतों, प्रमुख पुलों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञों की चेतावनी को इस अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए कि इन झीलों के तत्काल फटने की भविष्यवाणी हो चुकी है। वैज्ञानिक अध्ययन मुख्य रूप से संभावित जोखिम और संवेदनशीलता का आकलन करते हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में लगातार निगरानी और आपदा प्रबंधन की तैयारी बेहद जरूरी हो जाती है।
क्या है GLOF और क्यों खतरनाक है?
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF उस स्थिति को कहा जाता है जब ग्लेशियर के पास बनी झील से अचानक बड़ी मात्रा में पानी बाहर निकल जाता है। ऐसी झीलें अक्सर बर्फ, चट्टानों और ग्लेशियर द्वारा जमा किए गए मलबे से बनी प्राकृतिक बाधाओं के पीछे स्थित होती हैं।
अगर झील की प्राकृतिक दीवार कमजोर हो जाए या उसके ऊपर अचानक बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा गिर जाए, तो पानी तेजी से बाहर निकल सकता है। भूस्खलन, तेज बर्फ पिघलना, भारी बारिश और भूकंपीय गतिविधियां भी कुछ परिस्थितियों में जोखिम बढ़ा सकती हैं।
सबसे खतरनाक बात यह है कि ऊंचाई वाले इलाकों से निकलने वाला पानी सिर्फ बाढ़ का रूप नहीं लेता, बल्कि अपने साथ चट्टान, मिट्टी, बर्फ और पेड़-पौधों का मलबा भी नीचे ला सकता है। इससे नदी घाटियों में रहने वाली आबादी और बुनियादी ढांचे को बहुत कम समय में भारी नुकसान हो सकता है।
कश्मीर हिमालय पर हुए अध्ययन में भी झीलों की संवेदनशीलता का आकलन करते समय बांध की प्रकृति, ढलान, भूकंपीय गतिविधि, आसपास के भू-भाग और अन्य कारकों को शामिल किया गया है।
कश्मीर की पांच झीलों ने बढ़ाई चिंता
अध्ययन में जिन पांच झीलों को अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है, उनमें ब्रमसार, चिरसार, नंडकोल, गंगाबल और भागसर शामिल हैं। इन झीलों के आसपास का भूगोल और उनसे जुड़े जल निकासी मार्ग इन्हें आपदा जोखिम के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, संभावित GLOF की स्थिति में पानी का बहाव नीचे की ओर कई किलोमीटर तक असर डाल सकता है। अध्ययन में संभावित प्रभाव क्षेत्र में करीब 2,704 इमारतों और लगभग 15 प्रमुख पुलों के अलावा सड़क नेटवर्क और एक जलविद्युत परियोजना की पहचान की गई है।
यही वजह है कि विशेषज्ञ अब केवल झीलों की निगरानी तक सीमित रहने के बजाय पूरे डाउनस्ट्रीम क्षेत्र की तैयारी पर जोर दे रहे हैं। यदि किसी झील से अचानक पानी का बहाव शुरू होता है तो उसका असर केवल ऊंचाई वाले क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नीचे बसे गांवों, कस्बों और परिवहन नेटवर्क तक पहुंच सकता है।
नेपाल की घटना ने क्यों बढ़ाई चिंता?
नेपाल में हालिया घटना इस खतरे का एक बेहद गंभीर उदाहरण बनकर सामने आई है। शुरुआती रिपोर्टों में इसे GLOF से जोड़ा गया था, लेकिन बाद की वैज्ञानिक जांच में संकेत मिला कि वहां एक बड़े ग्लेशियर के हिस्से के टूटने से बर्फ और चट्टानों का विशाल मलबा नीचे आया, जिसने नदी में जाकर बेहद शक्तिशाली मलबा बहाव पैदा किया।
इस घटना से एक अहम सबक सामने आया है—हिमालय में खतरा केवल ग्लेशियल झील के फटने से नहीं है। ग्लेशियर का टूटना, अस्थिर चट्टानें, पर्माफ्रॉस्ट का कमजोर होना और भूस्खलन भी अचानक बाढ़ और मलबे के विनाशकारी बहाव को जन्म दे सकते हैं।
यही वजह है कि जम्मू-कश्मीर जैसे हिमालयी क्षेत्र में सिर्फ ग्लेशियल झीलों पर नजर रखना पर्याप्त नहीं होगा। ग्लेशियर, पहाड़ी ढलान, नदी घाटियां और वहां मौजूद बुनियादी ढांचे को एक साथ ध्यान में रखकर जोखिम का आकलन करना होगा।
भूकंप और भूस्खलन का खतरा भी अहम
जम्मू-कश्मीर हिमालय भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है। ऐसे में ग्लेशियल झीलों और ऊंचाई वाले अस्थिर ढलानों की निगरानी को और महत्वपूर्ण माना जाता है। किसी बड़े भूकंप से पहाड़ी ढलानों पर भूस्खलन हो सकता है और कुछ परिस्थितियों में प्राकृतिक जल निकासी मार्ग या झीलों के आसपास की संरचनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि किसी निश्चित समय पर जम्मू-कश्मीर में रिक्टर पैमाने पर 8 तीव्रता का भूकंप आएगा। भूकंप का सटीक समय और स्थान वैज्ञानिक रूप से पहले से बताना संभव नहीं है। इसलिए ऐसी संभावनाओं को लेकर तैयारी जरूरी है, लेकिन उन्हें निश्चित भविष्यवाणी के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
इसी तरह, जम्मू-कश्मीर में हजारों ग्लेशियरों के बहुत तेजी से पिघलने जैसे दावों को भी आधिकारिक और वैज्ञानिक आंकड़ों से पुष्टि किए बिना निश्चित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण हिमालयी ग्लेशियरों में बदलाव को लेकर वैज्ञानिक समुदाय लगातार चिंता जताता रहा है।
लैंडस्लाइड का खतरा भी कम नहीं
जम्मू-कश्मीर में भूस्खलन का खतरा निश्चित रूप से गंभीर है। पहाड़ी इलाकों में सड़क निर्माण, भारी बारिश, कमजोर चट्टानें, ढलानों की अस्थिरता और बदलती जलवायु जैसी परिस्थितियां जोखिम बढ़ा सकती हैं।
ऐसे इलाकों में सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और बस्तियां एक साथ मौजूद होने के कारण किसी बड़े भूस्खलन की स्थिति में नुकसान काफी बढ़ सकता है। खासकर वे क्षेत्र ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं जहां पहाड़ी ढलान सीधे नदी घाटियों से जुड़ी हैं।
आपदा प्रबंधन के लिए यह जरूरी है कि संभावित लैंडस्लाइड जोन की वैज्ञानिक मैपिंग की जाए और उन क्षेत्रों में रहने वाली आबादी तथा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की पहचान की जाए।
अब क्या करने की जरूरत?
विशेषज्ञों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में सबसे पहले उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी जरूरी है। इसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों के साथ जमीन पर वैज्ञानिक सर्वे, झीलों के जलस्तर की निगरानी और जरूरत पड़ने पर सेंसर आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किया जा सकता है।
इसके अलावा उन गांवों और कस्बों की पहचान जरूरी है जो संभावित बाढ़ के रास्ते में आते हैं। वहां रहने वाले लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि आपात स्थिति में किस दिशा में जाना है, सुरक्षित स्थान कहां हैं और चेतावनी मिलने के बाद कितनी जल्दी इलाके को खाली करना होगा।
प्रशासन को संभावित आपदा के लिए नियमित मॉक ड्रिल भी आयोजित करनी चाहिए। पुलिस, आपदा प्रबंधन बल, स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के बीच बेहतर समन्वय बेहद महत्वपूर्ण होगा।
समय रहते तैयारी ही सबसे बड़ा बचाव
नेपाल की त्रासदी ने यह साफ कर दिया है कि हिमालय में प्राकृतिक आपदाएं बेहद तेजी से अपना रूप बदल सकती हैं। कुछ ही मिनटों में नदी का जलस्तर बढ़ सकता है और बर्फ, चट्टान तथा मलबे का बहाव कई किलोमीटर तक तबाही मचा सकता है।
जम्मू-कश्मीर में पांच ग्लेशियल झीलों की अत्यधिक संवेदनशीलता का वैज्ञानिक आकलन पहले ही सामने आ चुका है। इसलिए इसे डर फैलाने के बजाय समय रहते तैयारी करने की चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए।
बेहतर निगरानी, वैज्ञानिक जोखिम मानचित्र, रियल-टाइम चेतावनी प्रणाली, मजबूत संचार नेटवर्क, सुरक्षित निकासी मार्ग और स्थानीय लोगों की नियमित ट्रेनिंग—ये ऐसे कदम हैं जो किसी संभावित आपदा के प्रभाव को काफी कम कर सकते हैं।
नेपाल में हुई त्रासदी ने हिमालय के बदलते खतरे की गंभीर तस्वीर सामने रखी है। अब जम्मू-कश्मीर के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि अगली आपदा कब आएगी, बल्कि यह है कि अगर अचानक ग्लेशियर, झील या पहाड़ी ढलान से बड़ा खतरा पैदा हुआ तो क्या लोगों को समय रहते सुरक्षित निकालने की पर्याप्त तैयारी मौजूद है?
यही सवाल आने वाले समय में प्रशासन, वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदायों के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहेगा। हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, बेहतर योजना और समय पर चेतावनी के जरिए जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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