रुपया गिरने से पहले RBI ने चला ऐसा दांव, डॉलर के खेल में अब क्या होने वाला है?
नई दिल्ली। भारतीय मुद्रा बाजार में इन दिनों एक बार फिर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये पर बढ़ते दबाव के बीच केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में लगातार सक्रिय दिखाई दे रहा है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और डॉलर की मांग ने रुपये के सामने चुनौती बढ़ा दी है। ऐसे समय में RBI की कोशिश रुपये में तेज और असामान्य उतार-चढ़ाव को रोकने की है।
हालिया कारोबारी सत्र में रुपया 17 अगस्त को करीब दो सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गया और लगभग 95.60 रुपये प्रति डॉलर के आसपास बंद हुआ। इससे पहले भी मुद्रा पर लगातार दबाव देखने को मिला था। हालांकि, बाजार में RBI की सक्रियता के कारण रुपये में गिरावट अपेक्षाकृत नियंत्रित रही है। कारोबारियों के मुताबिक सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री की गतिविधियां बढ़ी हैं, जिसे बाजार RBI के हस्तक्षेप के रूप में देख रहा है।
आखिर रुपये पर इतना दबाव क्यों है?
भारतीय रुपये की कमजोरी के पीछे इस समय कई अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की कीमतों से आ रहा है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो भारतीय कंपनियों को ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव बनता है।
हालिया रिपोर्टों के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 89 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई थी। तेल की कीमतों में यह तेजी भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है।
इसके अलावा आयातकों की डॉलर मांग भी रुपये की कमजोरी का एक बड़ा कारण है। जब भारतीय कंपनियां विदेशों से कच्चा माल, ऊर्जा, मशीनरी या अन्य सामान खरीदती हैं तो उन्हें डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ने पर रुपये पर अतिरिक्त दबाव आता है।
RBI क्यों बेच रहा है डॉलर?
RBI की भूमिका यहां बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। केंद्रीय बैंक का मुख्य उद्देश्य रुपये को किसी एक निश्चित स्तर पर स्थायी रूप से रोकना नहीं है, बल्कि मुद्रा बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को कम करना है।
जब बाजार में डॉलर की मांग बहुत बढ़ती है और रुपया तेजी से कमजोर होने लगता है, तब RBI डॉलर बेचकर बाजार में विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ा सकता है। इससे डॉलर की कमी कुछ हद तक कम होती है और रुपये पर तत्काल दबाव घट सकता है।
अगस्त में RBI की विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रियता लगातार दिखाई दे रही है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी बैंक विभिन्न स्तरों पर डॉलर बेचते हुए रुपये को एक सीमित दायरे में रखने में मदद कर रहे हैं। इसके कारण रुपये की वास्तविक उतार-चढ़ाव दर लगभग 2 प्रतिशत तक नीचे आई है।
यह कदम बाजार में एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पैदा करता है। कारोबारियों को यह संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक अचानक और तेज गिरावट को रोकने के लिए बाजार में मौजूद है। इससे अत्यधिक सट्टेबाजी पर भी अंकुश लग सकता है।
विदेशी मुद्रा भंडार भी मजबूत हुआ
दिलचस्प बात यह है कि रुपये पर दबाव के बावजूद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत स्थिति में पहुंचा है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर से ऊपर बना हुआ है। यह स्थिति RBI को जरूरत पड़ने पर मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच देती है।
दरअसल, हाल के महीनों में भारत को विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर महत्वपूर्ण मदद मिली है। RBI की विशेष योजनाओं के जरिए गैर-निवासी भारतीयों से बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा देश में आई। रिपोर्टों के मुताबिक इन उपायों से लगभग 57 अरब डॉलर तक की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई, जिससे भारत के भुगतान संतुलन और विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति बेहतर हुई।
यही कारण है कि RBI के पास फिलहाल रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश दिखाई देती है।
FCNR(B) योजना ने भी बदली तस्वीर
रुपये और विदेशी मुद्रा बाजार से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण घटना RBI की FCNR(B) जमा से जुड़ी विशेष स्वैप सुविधा को समय से पहले बंद करने का फैसला है।
इस सुविधा का उद्देश्य विदेशी मुद्रा को भारत में आकर्षित करना था। इसके तहत बैंकों को विदेशी मुद्रा जमा से जुड़ी स्वैप सुविधा उपलब्ध कराई गई थी। योजना को उम्मीद से बेहतर प्रतिक्रिया मिली और विदेशी मुद्रा का बड़ा प्रवाह भारत में आया।
रिपोर्टों के अनुसार, FCNR(B) से जुड़े विदेशी मुद्रा प्रवाह ने RBI को अपेक्षा से अधिक डॉलर जुटाने में मदद की। इसके बाद केंद्रीय बैंक ने इस सुविधा की समयसीमा को पहले ही समाप्त करने का फैसला किया।
यह फैसला बताता है कि RBI के पास फिलहाल विदेशी मुद्रा की उपलब्धता को लेकर पहले की तुलना में ज्यादा आरामदायक स्थिति है। हालांकि, बाजार ने इस फैसले को तुरंत सकारात्मक तरीके से नहीं लिया और रुपये पर कुछ दबाव देखने को मिला।
क्या RBI रुपये को 95 के आसपास रोक पाएगा?
अब बाजार में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले दिनों में रुपया किस स्तर पर कारोबार करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि RBI रुपये की किसी खास दर को बचाने की कोशिश करने के बजाय उसकी अस्थिरता को सीमित करने पर ज्यादा ध्यान दे सकता है।
हालिया बाजार आकलनों में सितंबर के अंत तक रुपये के लगभग 94.50 से 96 रुपये प्रति डॉलर के दायरे में रहने की संभावना जताई गई है। हालांकि, यह अनुमान तेल की कीमतों, वैश्विक डॉलर मांग और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों में बदलाव के साथ तेजी से बदल सकता है।
अगर कच्चा तेल लगातार महंगा रहता है और डॉलर की मांग बढ़ती है तो रुपये पर दबाव जारी रह सकता है। इसके उलट यदि तेल की कीमतों में गिरावट आती है और वैश्विक बाजार में डॉलर कमजोर होता है तो रुपये को राहत मिल सकती है।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
रुपये की चाल सिर्फ शेयर बाजार या विदेशी मुद्रा कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है।
अगर रुपया कमजोर होता है तो आयातित सामान महंगा हो सकता है। कच्चा तेल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। तेल महंगा होने से पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक सामान, कुछ औद्योगिक मशीनरी और विदेश से आने वाले कई कच्चे माल की लागत बढ़ सकती है।
विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और विदेश यात्रा करने वाले लोगों पर भी रुपये की कमजोरी का असर पड़ता है। उन्हें समान मात्रा में डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
दूसरी तरफ निर्यातकों को कमजोर रुपये से कुछ फायदा हो सकता है, क्योंकि विदेशी मुद्रा में मिलने वाली आय को रुपये में बदलने पर उन्हें अधिक राशि मिल सकती है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल रुपये के लिए सबसे बड़ी चुनौती बाहरी परिस्थितियां हैं। कच्चे तेल की कीमत, पश्चिम एशिया का तनाव, अमेरिकी डॉलर की दिशा और वैश्विक निवेशकों का रुख आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय कर सकते हैं।
RBI की सक्रियता ने रुपये में अचानक होने वाली गिरावट को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन केंद्रीय बैंक लंबे समय तक केवल डॉलर बेचकर मुद्रा को नियंत्रित नहीं कर सकता। इसलिए विदेशी पूंजी प्रवाह, निर्यात वृद्धि और भुगतान संतुलन की मजबूत स्थिति भी उतनी ही जरूरी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले समय में RBI का फोकस रुपये की किसी एक कीमत को बचाने के बजाय बाजार में व्यवस्थित कारोबार और सीमित अस्थिरता बनाए रखने पर रहने की संभावना है। फिलहाल मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार RBI को जरूरी स्थिति में हस्तक्षेप करने की क्षमता देता है, लेकिन वैश्विक तेल और डॉलर बाजार की दिशा रुपये के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
रुपये पर दबाव जरूर है, लेकिन फिलहाल भारत के पास उससे निपटने के लिए मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और केंद्रीय बैंक की सक्रिय रणनीति मौजूद है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि वैश्विक बाजार की परिस्थितियां रुपये को किस दिशा में ले जाती हैं और RBI कितनी मजबूती से मुद्रा बाजार को संभालता है।

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