17 साल की उम्र में किया खौफनाक अपराध, 20 साल की सजा के बाद कोर्ट ने सुनाया चौंकाने वाला आदेश
करीब दो साल पुराने नाबालिग बालिका से दुष्कर्म के मामले में पॉक्सो क्रम संख्या दो न्यायालय ने कड़ा और सुधारात्मक फैसला सुनाया है। अदालत ने अपराध में दोषी पाए गए किशोर को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही दोषी पर 6,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। मामले की खास बात यह है कि अदालत ने केवल सजा सुनाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि दोषी के भविष्य और उसके मानसिक, शारीरिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक विकास को ध्यान में रखते हुए कई सुधारात्मक गतिविधियों के निर्देश भी दिए हैं।
अदालत के आदेश के अनुसार दोषी को 21 साल की उम्र तक प्रतिदिन शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सेवा से जुड़े कार्य करने होंगे। इस फैसले को मामले की गंभीरता के साथ-साथ दोषी के सुधार और पुनर्वास को ध्यान में रखने वाला फैसला माना जा रहा है।
24 सितंबर 2024 को सामने आया था मामला
विशिष्ट लोक अभियोजक वीरेंद्र सिंह भाणावत के अनुसार यह मामला 24 सितंबर 2024 का है। शहर के एक थाना क्षेत्र में रहने वाली नाबालिग बालिका को उसके नाबालिग दोस्त द्वारा बहला-फुसलाकर अपने साथ ले जाने का आरोप था। आरोप के मुताबिक आरोपी बालिका को अपने साथ ले गया और करीब तीन से चार दिनों तक बंधक बनाकर रखा। इसी दौरान उसके साथ दुष्कर्म किए जाने का आरोप सामने आया।
घटना के बाद पीड़िता की ओर से 25 सितंबर 2024 को पुलिस में मामला दर्ज कराया गया। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए त्वरित कार्रवाई की और आरोपी नाबालिग को निरुद्ध कर किशोर सुधार गृह भेज दिया।
मामला सामने आने के बाद पुलिस ने संबंधित साक्ष्यों को जुटाया और आरोपों की जांच शुरू की। इसके बाद प्रकरण न्यायिक प्रक्रिया में पहुंचा, जहां आरोपी की उम्र और अपराध की गंभीरता के आधार पर आगे की कार्रवाई की गई।
आरोपी की उम्र 16 साल से अधिक होने के कारण बदली सुनवाई की प्रक्रिया
घटना के समय आरोपी की उम्र 17 साल से कम थी। इसलिए शुरुआती कार्रवाई किशोर न्याय व्यवस्था के तहत की जा रही थी। हालांकि, मामले में अपराध की गंभीरता को देखते हुए आरोपी की उम्र भी महत्वपूर्ण आधार बनी।
बताया गया कि आरोपी की उम्र 16 साल से अधिक होने और अपराध की गंभीरता को देखते हुए किशोर न्याय बोर्ड ने मामले को वयस्क की तरह सुनवाई के लिए पॉक्सो क्रम संख्या दो न्यायालय में स्थानांतरित किया। इसके बाद मामले की नियमित सुनवाई पॉक्सो कोर्ट में शुरू हुई।
मामले की नियमित सुनवाई 5 फरवरी 2025 से चल रही थी। इस दौरान अदालत के समक्ष गवाहों के बयान और मामले से जुड़े साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर मामले की सुनवाई पूरी की और बुधवार को अपना अंतिम फैसला सुनाया।
कोर्ट ने सुनाई 20 साल के कठोर कारावास की सजा
सभी पक्षों को सुनने और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने आरोपी को दोषी माना। इसके बाद कोर्ट ने उसे 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही उस पर 6,000 रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है।
इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने दोषी की कम उम्र को देखते हुए केवल दंडात्मक कार्रवाई पर जोर नहीं दिया, बल्कि उसके सुधार और सामाजिक पुनर्वास को भी फैसले का हिस्सा बनाया।
अदालत ने माना कि दोषी के मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और शैक्षणिक विकास पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से 21 वर्ष की आयु तक उसके लिए प्रतिदिन अलग-अलग गतिविधियां निर्धारित की गई हैं।
21 साल की उम्र तक रोज करने होंगे तीन विशेष कार्य
कोर्ट के निर्देश के अनुसार दोषी को 21 साल की उम्र तक प्रतिदिन तीन प्रकार के विशेष कार्य करने होंगे। इन गतिविधियों का उद्देश्य केवल समय बिताना नहीं, बल्कि उसे शिक्षा, जिम्मेदारी, अनुशासन, पर्यावरण संरक्षण और समाज के प्रति संवेदनशील बनाने से जुड़ा है।
1. रोज दो घंटे शिक्षा और तकनीकी विकास
अदालत ने दोषी के शैक्षणिक विकास पर विशेष जोर दिया है। आदेश के अनुसार उसे प्रतिदिन दो घंटे किसी तकनीकी या शैक्षणिक संस्थान में परामर्श और पढ़ाई करनी होगी।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जेल या सुधारात्मक व्यवस्था के दौरान उसकी शिक्षा बाधित न हो और वह भविष्य में अपने जीवन को सकारात्मक दिशा देने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल हासिल कर सके।
2. दो घंटे पर्यावरण संरक्षण के कार्य
दूसरे कार्य के रूप में दोषी को प्रतिदिन दो घंटे पर्यावरण से जुड़े कार्य करने होंगे। इसके तहत उसे उपवन संरक्षक या संबंधित कार्यालय के निर्देशन में पौधारोपण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्य करने के निर्देश दिए गए हैं।
इस व्यवस्था के पीछे उद्देश्य दोषी में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना और उसे समाजोपयोगी गतिविधियों से जोड़ना है।
3. एक घंटे सामाजिक सेवा
अदालत ने प्रतिदिन एक घंटे सामाजिक सेवा करने का भी निर्देश दिया है। इसके तहत दोषी को ‘अपना घर’ या किसी अन्य आश्रय स्थल पर बुजुर्गों और मानसिक रूप से दिव्यांग लोगों की सेवा करनी होगी।
सामाजिक सेवा के माध्यम से उसे समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्गों के साथ समय बिताने तथा उनके प्रति संवेदनशीलता विकसित करने का अवसर मिलेगा।
अभी 18 साल 19 दिन की उम्र
जानकारी के अनुसार वर्तमान में दोषी की उम्र 18 साल 19 दिन हो चुकी है। अदालत के निर्देश के अनुसार उसे 21 वर्ष की उम्र तक किशोर सुधार गृह में रखा जाएगा। इसके बाद उसे केंद्रीय कारागार भेजे जाने की बात कही गई है।
इस तरह अदालत के फैसले में सजा के साथ-साथ सुधारात्मक गतिविधियों को भी शामिल किया गया है। शिक्षा, पर्यावरण सेवा और सामाजिक सेवा के जरिए दोषी को समाज के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराने का प्रयास किया गया है।
फैसले में सजा और सुधार दोनों पर जोर
इस मामले में अदालत का फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसमें अपराध की गंभीरता के अनुरूप कठोर सजा के साथ दोषी के सुधार और पुनर्वास को भी महत्व दिया गया है। एक ओर जहां अदालत ने 20 साल के कठोर कारावास और जुर्माने का आदेश दिया, वहीं दूसरी ओर उसकी शिक्षा और सामाजिक विकास के लिए दैनिक गतिविधियां भी निर्धारित कीं।
ऐसे मामलों में न्याय व्यवस्था का उद्देश्य पीड़िता को न्याय दिलाने के साथ-साथ अपराध की गंभीरता को स्पष्ट संदेश देना भी होता है। वहीं किशोर अवस्था से जुड़े मामलों में सुधार और पुनर्वास का पहलू भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
अदालत द्वारा निर्धारित तीनों गतिविधियां—शिक्षा, पर्यावरण सेवा और सामाजिक सेवा—दोषी को अनुशासित दिनचर्या में रखने के साथ उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं के विकास से जुड़ी हैं।
फिलहाल करीब दो साल पुराने इस मामले में अदालत का फैसला आने के बाद न्यायिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया है। अब दोषी को अदालत द्वारा निर्धारित सजा के साथ-साथ 21 वर्ष की उम्र तक दिए गए सुधारात्मक निर्देशों का भी पालन करना होगा।

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