जमीन के नीचे छिपा है अंबानी का सबसे बड़ा दांव! ₹2.73 लाख करोड़ लगाकर कोयला निकाले बिना बनाएंगे गैस, क्या बदल जाएगी भारत की ऊर्जा कहानी?
मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने ऊर्जा क्षेत्र में एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना सामने रखी है। कंपनी ने आंध्र प्रदेश के एलुरु जिले में भारत का पहला इंटीग्रेटेड अंडरग्राउंड कोल गैसिफिकेशन यानी UCG कॉम्प्लेक्स स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है। इस परियोजना के लिए रिलायंस ने अगले 30 वर्षों में करीब 2.73 लाख करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव रखा है। हालांकि, यह निवेश और परियोजना का आगे बढ़ना शुरुआती एक्सप्लोरेशन और इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता पर निर्भर करेगा।
यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में पहली बार वाणिज्यिक कोयला खदानों के समझौतों में अंडरग्राउंड कोल गैसिफिकेशन की व्यवस्था शामिल की गई है। केंद्रीय कोयला मंत्रालय के अनुसार, अप्रैल 2026 में रिलायंस इंडस्ट्रीज को Recherla और Chintalpudi Sector A1 कोल माइंस मिली थीं। ये ब्लॉक आंध्र प्रदेश में हैं और इन्हीं में UCG तकनीक के इस्तेमाल की दिशा में काम किया जा रहा है।
30 साल में पूरा होगा ₹2.73 लाख करोड़ का निवेश
रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस का प्रस्तावित निवेश एक साथ नहीं किया जाएगा। कंपनी ने इसे अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ाने की योजना बनाई है। शुरुआती चरण में कोयले की गुणवत्ता, भूगर्भीय स्थिति और UCG तकनीक की व्यावसायिक व्यवहार्यता का परीक्षण किया जाएगा।
बताया गया है कि पहले चरण में 2026 की तीसरी तिमाही से 2027 के अंत तक एक्सप्लोरेशन और पायलट गतिविधियों पर करीब 3,000 करोड़ रुपये तक खर्च किए जाने का प्रस्ताव है।
अगर यह चरण सफल रहता है और परियोजना व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य पाई जाती है, तो 2028 से 2030 के बीच बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए करीब 1.20 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजना है।
इसके बाद कमर्शियल उत्पादन के लिए लगभग 1.50 लाख करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है। इस तरह पूरी योजना का अनुमानित निवेश करीब 2.73 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचता है। हालांकि, इतनी बड़ी रकम का वास्तविक निवेश परियोजना की प्रगति, तकनीकी परिणामों और आर्थिक व्यवहार्यता पर निर्भर करेगा।
रिलायंस को मिले हैं दो बड़े कोल ब्लॉक
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने 14वें दौर की कमर्शियल कोल माइनिंग नीलामी में Recherla और Chintalpudi Sector A1 कोयला खदानें हासिल की थीं। केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने अप्रैल 2026 में इन खदानों से जुड़े Coal Mine Development and Production Agreements यानी CMDPAs पर हस्ताक्षर किए थे।
खास बात यह है कि इन समझौतों में अंडरग्राउंड कोल गैसिफिकेशन से संबंधित प्रावधान शामिल हैं। सरकार के अनुसार, यह भारत में पहली ऐसी वाणिज्यिक कोयला खदानों की खेप है, जिनके समझौतों में UCG प्रावधान जोड़े गए हैं।
उपलब्ध रिपोर्टों में Recherla और Chintalpudi ब्लॉकों में कुल मिलाकर करीब 3,130.61 मिलियन टन कोयले के संसाधन का अनुमान बताया गया है। हालांकि, पूरे संसाधन का व्यावसायिक रूप से उपयोग हो पाएगा या नहीं, यह आगे होने वाले अध्ययन और तकनीकी परीक्षणों से स्पष्ट होगा।
Underground Coal Gasification यानी UCG क्या है?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर UCG तकनीक क्या है और रिलायंस इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों मान रही है?
सामान्य कोयला खनन में जमीन के नीचे मौजूद कोयले को खदान के जरिए बाहर निकाला जाता है। इसके बाद कोयले को अलग-अलग औद्योगिक प्रक्रियाओं में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन Underground Coal Gasification में कोयले को पारंपरिक तरीके से बाहर निकालने के बजाय उसी भूमिगत कोयला परत में गैसीफाई करने का विचार है।
इस प्रक्रिया में नियंत्रित परिस्थितियों में भूमिगत कोयले को गैस में परिवर्तित किया जाता है और इससे बनने वाली सिंथेसिस गैस यानी Syngas को सतह पर लाया जा सकता है। यह तकनीक खास तौर पर ऐसे कोयला संसाधनों के इस्तेमाल की संभावना खोल सकती है, जिन्हें पारंपरिक खनन के जरिए निकालना कठिन या आर्थिक रूप से कम आकर्षक हो।
यानी आसान भाषा में समझें तो UCG का मकसद है—कोयले को पहले बाहर निकालने के बजाय जमीन के अंदर ही उसे गैस में बदलना।
क्या UCG से भारत की ऊर्जा जरूरतों को फायदा होगा?
रिलायंस के लिए UCG सिर्फ कोयले के इस्तेमाल की तकनीक नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा और केमिकल सेक्टर के लिए नए फीडस्टॉक का स्रोत बन सकती है। कंपनी के चेयरमैन के बयान के मुताबिक, रिलायंस UCG पर काम आगे बढ़ा रही है और इसका उद्देश्य भारत के कम गुणवत्ता वाले या आर्थिक रूप से कठिन कोयला संसाधनों को सिंथेटिक गैस में बदलना है। कंपनी ने इसे आयातित LNG के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावना से भी जोड़ा है।
Syngas का इस्तेमाल आगे कई औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जा सकता है। इससे केमिकल, फ्यूल और अन्य औद्योगिक उत्पादों के लिए फीडस्टॉक तैयार करने की संभावनाएं बनती हैं।
इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है, खासकर तब जब देश घरेलू संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल करके आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है।
क्या इससे कच्चे तेल का आयात कम होगा?
रिलायंस की प्रस्तावित परियोजना को भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की बड़ी रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में घरेलू कोयला संसाधनों से गैस और केमिकल फीडस्टॉक तैयार करने की तकनीकें आयातित ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती हैं।
हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि UCG परियोजना सीधे तौर पर भारत के कच्चे तेल के आयात में कितना बदलाव करेगी। इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि परियोजना से कितनी मात्रा में गैस या अन्य उत्पाद बनते हैं और उनका व्यावसायिक उपयोग किस स्तर तक होता है।
इसलिए इसे तत्काल क्रूड ऑयल इंपोर्ट का विकल्प मानने के बजाय भारत की व्यापक ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का एक संभावित हिस्सा समझना ज्यादा उचित होगा।
रोजगार के मोर्चे पर भी बड़ा असर
इतने बड़े निवेश वाली परियोजना का असर सिर्फ ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं रहने की उम्मीद है। प्रस्तावित परियोजना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है।
रिपोर्टों में प्रत्यक्ष रूप से हजारों लोगों और अप्रत्यक्ष रूप से इससे कहीं अधिक लोगों के रोजगार से जुड़ने की उम्मीद जताई गई है। इसके अलावा निर्माण, इंजीनियरिंग, लॉजिस्टिक्स, मशीनरी, सर्विसेज और अन्य सहायक उद्योगों को भी फायदा मिल सकता है।
अगर परियोजना व्यावसायिक उत्पादन के चरण तक पहुंचती है तो एलुरु और आसपास के क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इससे स्थानीय स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर, परिवहन और अन्य सेवाओं की मांग भी बढ़ने की संभावना है।
सरकार की UCG नीति से भी जुड़ा है प्रोजेक्ट
रिलायंस की यह योजना ऐसे समय में सामने आई है जब केंद्र सरकार कोयला गैसीफिकेशन को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठा रही है। अप्रैल 2026 में कोयला मंत्रालय ने UCG प्रावधानों वाले पहले कमर्शियल कोल माइन एग्रीमेंट्स पर हस्ताक्षर किए थे। मंत्रालय के अनुसार, इसका उद्देश्य भारत के विशाल कोयला संसाधनों के नए तरीके से उपयोग और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है।
सरकार ने कोयला गैसीफिकेशन को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग योजनाएं और नीतिगत पहल भी जारी रखी हैं। कोयला मंत्रालय की वेबसाइट पर 2026 में Surface Coal/Lignite Gasification Projects को बढ़ावा देने से संबंधित योजनाएं और आवेदन प्रक्रिया भी प्रकाशित की गई हैं।
लेकिन पर्यावरण को लेकर भी उठेंगे सवाल
UCG को पारंपरिक खनन से अलग तकनीक माना जाता है, लेकिन इसे पूरी तरह पर्यावरणीय जोखिम से मुक्त मानना सही नहीं होगा। जमीन के नीचे कोयले को गैस में बदलने की प्रक्रिया में भूजल, गैस रिसाव, भूमिगत संरचनाओं और उत्सर्जन से जुड़े जोखिमों का वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी है।
यही वजह है कि रिलायंस के प्रस्ताव में शुरुआती एक्सप्लोरेशन और पायलट चरण को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पहले यह समझना होगा कि संबंधित कोयला परतों में तकनीक सुरक्षित और आर्थिक रूप से कितनी प्रभावी साबित होती है।
यदि शुरुआती परीक्षण सफल होते हैं, तभी परियोजना को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ेंगे।
रिलायंस के लिए क्यों है यह बड़ा दांव?
रिलायंस इंडस्ट्रीज पिछले कुछ वर्षों में अपने पारंपरिक तेल और पेट्रोकेमिकल कारोबार के साथ-साथ न्यू एनर्जी और नए ऊर्जा क्षेत्रों में भी विस्तार कर रही है। कंपनी ने अपनी 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट और शेयरधारक संचार में UCG को कम गुणवत्ता वाले कोयले को Syngas में बदलने वाली अपनी नई ऊर्जा पहलों में शामिल किया है।
ऐसे में आंध्र प्रदेश का प्रस्तावित UCG कॉम्प्लेक्स कंपनी के लिए एक बड़ा रणनीतिक प्रोजेक्ट बन सकता है। अगर तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है तो रिलायंस को न सिर्फ घरेलू कोयला संसाधनों का नया इस्तेमाल करने का मौका मिलेगा, बल्कि गैस और केमिकल फीडस्टॉक के क्षेत्र में भी नई संभावनाएं खुल सकती हैं।
2030 के बाद दिखेगा असली असर
प्रस्तावित योजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसका टाइमलाइन है। 2026-27 में एक्सप्लोरेशन, 2028-30 के दौरान विकास और उसके बाद कमर्शियल प्रोडक्शन की दिशा में बढ़ने की योजना है। यानी इस परियोजना का वास्तविक प्रभाव तुरंत नहीं बल्कि आने वाले वर्षों में दिखाई देगा।
अगर एक्सप्लोरेशन सफल रहता है, तकनीकी चुनौतियां नियंत्रित रहती हैं और परियोजना आर्थिक रूप से व्यवहार्य साबित होती है, तो आंध्र प्रदेश का यह प्रोजेक्ट भारत के कोयला और गैस सेक्टर में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
जमीन के नीचे छिपे कोयले से गैस बनाने की तैयारी
रिलायंस इंडस्ट्रीज का आंध्र प्रदेश में प्रस्तावित 2.73 लाख करोड़ रुपये का Underground Coal Gasification Complex भारत के ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ा प्रयोग माना जा रहा है। परियोजना का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि इसमें कोयले को पारंपरिक तरीके से निकालने के बजाय भूमिगत स्तर पर ही गैस में बदलने की तकनीक का इस्तेमाल किया जाना है।
रिलायंस को Recherla और Chintalpudi Sector A1 कोल माइंस मिलने तथा इन समझौतों में UCG प्रावधान शामिल होने से इस योजना को नीतिगत आधार भी मिला है।
हालांकि, अभी यह परियोजना प्रस्ताव और एक्सप्लोरेशन के चरण में है। इसलिए निवेश, उत्पादन, रोजगार और आयात में कमी से जुड़े अनुमानों को अंतिम उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आने वाले वर्षों में एक्सप्लोरेशन के परिणाम तय करेंगे कि भारत में UCG तकनीक वास्तव में कितनी सफल और व्यावसायिक साबित होती है।
अगर यह प्रयोग सफल रहा तो एलुरु की जमीन के नीचे मौजूद विशाल कोयला संसाधन भारत की ऊर्जा कहानी का एक नया अध्याय लिख सकते हैं।

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