रेगिस्तान में अचानक दिखा कपड़ों का विशाल पहाड़… सैटेलाइट से दिखा खौफनाक राज, जानकर दुनिया रह गई दंग!
क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी अलमारी से बाहर निकलने के बाद पुराने कपड़ों का आखिर क्या होता है? जब कोई टी-शर्ट, जींस, जैकेट या कोई अन्य कपड़ा पहनने लायक नहीं रहता, तो आमतौर पर उसे कूड़े में डाल दिया जाता है, किसी जरूरतमंद को दे दिया जाता है या कबाड़ी के जरिए आगे भेज दिया जाता है। लेकिन दुनिया के एक हिस्से में पुराने और बिक न पाने वाले कपड़ों का ऐसा विशाल जमावड़ा तैयार हो चुका है, जिसने फैशन इंडस्ट्री के छिपे हुए पर्यावरणीय संकट को पूरी दुनिया के सामने ला दिया है।
दक्षिण अमेरिका के चिली स्थित अटाकामा रेगिस्तान में पुराने और फेंके गए कपड़ों के बड़े-बड़े ढेर मौजूद हैं। इस इलाके को अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अक्सर दुनिया के ‘फैशन कब्रिस्तान’ के रूप में बताया जाता है। यहां कपड़ों के ढेर इतने बड़े हो गए हैं कि कुछ तस्वीरों में वे दूर से किसी पहाड़ी या रेगिस्तानी टीले जैसे दिखाई देते हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने भी अटाकामा में कपड़ों के बड़े कचरा-ढेरों का उल्लेख करते हुए कहा है कि यहां जमा कपड़े अंतरिक्ष से दिखाई देने तक ऊंचे हो चुके हैं।
यह कहानी केवल चिली की नहीं है। इसके पीछे पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ता फास्ट फैशन, जरूरत से ज्यादा कपड़े खरीदने की आदत और इस्तेमाल के बाद कपड़ों को तेजी से फेंक देने की संस्कृति जुड़ी हुई है।
आखिर अटाकामा में ही क्यों जमा होते हैं कपड़े?
चिली का अटाकामा रेगिस्तान दुनिया के सबसे शुष्क इलाकों में गिना जाता है। इसके उत्तरी हिस्से में इकीके और ऑल्टो हॉस्पिसियो के आसपास कपड़ों का व्यापार और आयात लंबे समय से महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि रहा है।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से सेकंड-हैंड और इस्तेमाल किए गए कपड़े चिली पहुंचते हैं। इनमें ऐसे कपड़े भी शामिल होते हैं जिन्हें उनके मूल बाजारों में बेच पाना मुश्किल होता है। कुछ कपड़े दोबारा इस्तेमाल के लिए स्थानीय या क्षेत्रीय बाजारों में पहुंचते हैं, लेकिन हर कपड़ा दोबारा बिक जाए, ऐसा नहीं होता।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, 2022 में चिली में 1.24 लाख टन सेकंड-हैंड टेक्सटाइल दाखिल हुए थे, जिनमें से बड़ी मात्रा अंततः फेंक दी गई। यह आंकड़ा बताता है कि कपड़ों के आयात और उनके कचरे के बीच कितना बड़ा अंतर पैदा हो सकता है।
पहले कपड़े बिकते हैं, फिर बचा हुआ बनता है कचरा
अटाकामा क्षेत्र में आने वाले सभी कपड़े सीधे कूड़े में नहीं फेंके जाते। बड़ी संख्या में कपड़ों की छंटाई की जाती है। अच्छे और दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले कपड़ों को अलग किया जाता है और उन्हें स्थानीय या लैटिन अमेरिकी बाजारों में बेचने की कोशिश की जाती है।
यह व्यापार स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। सेकंड-हैंड कपड़े कम कीमत पर उपलब्ध होते हैं और कई लोगों को कारोबार तथा रोजगार का अवसर मिलता है।
लेकिन समस्या उन कपड़ों से शुरू होती है जो बिक नहीं पाते।
कई कपड़े खराब स्थिति में होते हैं, कुछ पुराने फैशन के होते हैं, कुछ इतने कम गुणवत्ता वाले होते हैं कि खरीदार उन्हें लेना नहीं चाहते। ऐसे कपड़ों को दोबारा दूसरे बाजार में भेजना, रीसाइकल करना या उचित तरीके से नष्ट करना महंगा पड़ सकता है।
यहीं से समस्या पर्यावरणीय संकट का रूप लेने लगती है।
कपड़ों का यह पहाड़ इतना बड़ा क्यों हो रहा है?
फास्ट फैशन ने कपड़ों की पूरी अर्थव्यवस्था को बदल दिया है। पहले लोग कम कपड़े खरीदते थे और उन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल करते थे। लेकिन अब फैशन तेजी से बदलता है। कंपनियां लगातार नए डिजाइन और नए कलेक्शन बाजार में उतारती हैं।
नतीजा यह है कि लोगों के पास कपड़ों की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन प्रत्येक कपड़े का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम समय के लिए किया जाता है।
UNEP के अनुसार, दुनिया में हर साल लगभग 9.2 करोड़ टन टेक्सटाइल कचरा पैदा होता है। संगठन ने यह भी बताया है कि हर सेकंड लगभग एक कचरा ट्रक के बराबर कपड़े जलाए या लैंडफिल में भेजे जाते हैं।
यानी अटाकामा में दिखाई देने वाला कपड़ों का पहाड़ किसी एक देश या एक कंपनी की समस्या नहीं है। यह वैश्विक उपभोग की बदलती आदतों का परिणाम है।
सिंथेटिक कपड़े बने सबसे बड़ी चुनौती
अगर पुराने कपड़े केवल प्राकृतिक रेशों से बने होते, तो उनके कचरे को संभालना अपेक्षाकृत आसान हो सकता था। लेकिन आधुनिक कपड़ों में सिंथेटिक फाइबर का इस्तेमाल बहुत ज्यादा होता है।
पॉलिएस्टर, नायलॉन और एक्रिलिक जैसे कई सिंथेटिक फाइबर पेट्रोलियम आधारित होते हैं। ऐसे कपड़े सामान्य जैविक कचरे की तरह आसानी से मिट्टी में नहीं मिलते।
इसका मतलब है कि अगर सिंथेटिक कपड़े खुले में पड़े रहें तो वे लंबे समय तक पर्यावरण में बने रह सकते हैं। समय के साथ इनसे छोटे प्लास्टिक फाइबर और अन्य प्रदूषक पर्यावरण में पहुंच सकते हैं।
UNEP के अनुसार, टेक्सटाइल क्षेत्र वैश्विक प्रदूषण और कचरे की समस्या में महत्वपूर्ण योगदान देता है। संगठन ने यह भी बताया है कि 2023 में वैश्विक फाइबर बाजार का केवल लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा पुनर्चक्रित स्रोतों से आया था और कुल फाइबर बाजार में टेक्सटाइल-टू-टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग की हिस्सेदारी 1 प्रतिशत से भी कम थी।
खुले में कपड़े जलाने से बढ़ता खतरा
कपड़ों के विशाल ढेर की समस्या केवल जमीन घेरने तक सीमित नहीं है। जब इन ढेरों में आग लगती है, तो प्रदूषण का खतरा और बढ़ जाता है।
सिंथेटिक फाइबर वाले कपड़ों को खुले में जलाने से धुआं और कई तरह के प्रदूषक निकल सकते हैं। इसका असर आसपास की हवा और स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
UNEP ने उत्तरी चिली के इकीके और ऑल्टो हॉस्पिसियो के आसपास मौजूद टेक्सटाइल कचरे के माइक्रो-डंप का उल्लेख किया है और खुले में इनके जलने को स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिए नुकसानदायक बताया है।
यही वजह है कि कपड़ों के कचरे को केवल सौंदर्य या सफाई की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। यह हवा, मिट्टी, पानी और मानव स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा भी बन सकता है।
यह सिर्फ चिली की गलती नहीं
अटाकामा में कपड़ों का संकट देखकर सबसे पहले सवाल उठता है कि इतने कपड़े वहां पहुंचे कैसे। लेकिन इस समस्या को केवल चिली की जिम्मेदारी बताना पूरी तस्वीर नहीं होगी।
दुनिया के विकसित बाजारों में लोग बड़ी मात्रा में कपड़े खरीदते हैं। कपड़ों का इस्तेमाल कम समय तक किया जाता है और बड़ी संख्या में वस्त्र दान, सेकंड-हैंड बाजार या निर्यात की श्रृंखला में चले जाते हैं।
इनमें से कुछ कपड़े वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंचते हैं और दोबारा इस्तेमाल होते हैं। लेकिन जो कपड़े किसी बाजार में बिकने या इस्तेमाल होने की स्थिति में नहीं होते, वे अंततः कचरे में बदल जाते हैं।
इसलिए अटाकामा का संकट वैश्विक फैशन सप्लाई चेन की एक ऐसी कड़ी दिखाता है जो अक्सर उपभोक्ताओं की नजरों से दूर रहती है।
दुनिया में हर साल बढ़ रहा टेक्सटाइल कचरा
फैशन उद्योग की समस्या का पैमाना समझने के लिए वैश्विक आंकड़े काफी हैं। UNEP के अनुसार हर साल करीब 92 मिलियन टन टेक्सटाइल कचरा पैदा होता है। संगठन के मुताबिक फैशन और टेक्सटाइल क्षेत्र वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 2 से 8 प्रतिशत तक योगदान करता है।
इसका एक बड़ा कारण है—उत्पादन और खपत दोनों का लगातार बढ़ना।
जितने ज्यादा कपड़े बनाए जाएंगे और जितनी तेजी से उन्हें फेंका जाएगा, उतना ही ज्यादा कचरा पैदा होगा। केवल रीसाइक्लिंग बढ़ाने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। उत्पादन, डिजाइन, इस्तेमाल और दोबारा उपयोग की पूरी व्यवस्था में बदलाव की जरूरत होगी।
चिली में समाधान की कोशिश भी शुरू
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। चिली सरकार टेक्सटाइल कचरे की समस्या से निपटने के लिए 2040 तक की सर्कुलर इकोनॉमी रणनीति पर काम कर रही है।
इसका उद्देश्य कपड़ों को इस्तेमाल के बाद सीधे कचरा बनाने के बजाय उनकी उम्र बढ़ाना, उन्हें दोबारा इस्तेमाल करना, मरम्मत करना, रिकवर करना और रीसाइकल करना है।
स्थानीय स्तर पर भी कुछ संगठन इस समस्या को कम करने के लिए काम कर रहे हैं। UNEP ने चिली की संस्था Desierto Vestido का उदाहरण दिया है, जो इकीके और ऑल्टो हॉस्पिसियो क्षेत्र में टेक्सटाइल कचरे के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए काम करती है।
पुराने कपड़ों से बन सकते हैं नए उत्पाद
टेक्सटाइल कचरे को पूरी तरह बेकार मानना भी सही नहीं है। कुछ कंपनियां और सामाजिक संगठन पुराने कपड़ों के फाइबर को अलग करके उन्हें नए उत्पादों में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।
पुराने कपड़ों से इंसुलेशन सामग्री, भराव सामग्री और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे नए कच्चे माल की जरूरत कम हो सकती है और लैंडफिल या खुले में डंपिंग का दबाव भी घट सकता है।
लेकिन विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि रीसाइक्लिंग की क्षमता अभी कपड़ों के वैश्विक उत्पादन की तुलना में बहुत छोटी है।
आपकी अलमारी से निकलने वाला कपड़ा आखिर जाता कहां है?
अटाकामा का ‘फैशन कब्रिस्तान’ एक असहज सवाल सामने रखता है—जब हम अपनी अलमारी से कोई कपड़ा निकालकर फेंक देते हैं, तो क्या वह वास्तव में हमारी जिंदगी से गायब हो जाता है?
जवाब है—नहीं।
कपड़ा कहीं न कहीं जाता है। वह लैंडफिल में पहुंच सकता है, किसी दूसरे देश के सेकंड-हैंड बाजार में जा सकता है, रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया में जा सकता है या खुले में फेंके गए कचरे का हिस्सा बन सकता है।
इसलिए कपड़े खरीदते समय केवल उनकी कीमत और फैशन को देखना पर्याप्त नहीं है। लंबे समय तक चलने वाले कपड़े खरीदना, पुराने कपड़ों को दोबारा इस्तेमाल करना, जरूरतमंदों को देना, मरम्मत करवाना और संभव होने पर सही टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग व्यवस्था का इस्तेमाल करना भी जरूरी है।
अटाकामा हमें क्या चेतावनी दे रहा है?
अटाकामा का विशाल कपड़ा कचरा किसी फिल्म की कहानी जैसा लगता है, लेकिन यह फास्ट फैशन की वास्तविक कीमत का उदाहरण है। दुनिया के एक हिस्से में लोग लगातार नए कपड़े खरीद रहे हैं और दूसरे हिस्से में उन कपड़ों का निपटान एक गंभीर पर्यावरणीय संकट बन रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अटाकामा में कपड़ों का पहाड़ कितना बड़ा है। असली सवाल यह है कि अगर दुनिया ने कपड़े बनाने और इस्तेमाल करने का तरीका नहीं बदला, तो आने वाले वर्षों में ऐसे कितने और ‘फैशन कब्रिस्तान’ बनेंगे।
आपकी अलमारी में रखा हर कपड़ा सिर्फ फैशन नहीं है। उसके पीछे पानी, ऊर्जा, कच्चा माल, श्रम और अंत में उसके कचरे का पूरा जीवनचक्र जुड़ा हुआ है। अटाकामा का रेगिस्तान इसी अदृश्य कहानी को दुनिया के सामने बेहद डरावने तरीके से दिखा रहा है।

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