मोबाइल की दुनिया में आने वाला है बड़ा बदलाव! ₹62,500 करोड़ का दांव, भारत में अब सिर्फ फोन नहीं बनेंगे… राज भी खुलेगा
नई दिल्ली: भारत को दुनिया का बड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने 21 अगस्त 2026 को ₹62,500 करोड़ की Mobile Phone Manufacturing Scheme (MPMS) की घोषणा की है। पांच साल की इस इंसेंटिव योजना का उद्देश्य देश में मोबाइल फोन का उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ फोन बनाने में इस्तेमाल होने वाले कंपोनेंट्स और सब-असेंबली की घरेलू खरीद को बढ़ावा देना है।
सरकार का फोकस अब सिर्फ भारत में मोबाइल फोन असेंबल करने तक सीमित नहीं है। नई योजना के जरिए मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग की पूरी सप्लाई चेन को देश के भीतर मजबूत करने की कोशिश की जा रही है। यानी आने वाले वर्षों में मोबाइल फोन के ज्यादा से ज्यादा हिस्से भारत में ही तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया जाएगा।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय यानी MeitY के सचिव एस. कृष्णन के मुताबिक, यह योजना मौजूदा वित्त वर्ष से लागू होगी और 1 अप्रैल 2026 से शुरू होकर वित्त वर्ष 2030-31 तक चलेगी।
सरकार को उम्मीद है कि इस योजना से आने वाले पांच वर्षों में लगभग ₹39 लाख करोड़ के मोबाइल फोन उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और करीब 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
5 साल तक चलेगी ₹62,500 करोड़ की योजना
नई MPMS को मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के अगले चरण के रूप में देखा जा रहा है। सरकार ने इस योजना के लिए कुल ₹62,500 करोड़ का बजटीय प्रावधान किया है।
इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इंसेंटिव सिस्टम है। योजना के तहत भारत में बने मोबाइल फोन की पात्र बिक्री पर कंपनियों को 2.25 प्रतिशत से लेकर 5 प्रतिशत तक इंसेंटिव मिल सकता है।
इसके अलावा जो कंपनियां मोबाइल फोन में इस्तेमाल होने वाले निर्धारित कंपोनेंट्स और सब-असेंबली को भारत में ही खरीदेंगी, उन्हें अतिरिक्त 1.5 प्रतिशत तक इंसेंटिव मिलने की व्यवस्था की गई है।
इसका सीधा उद्देश्य कंपनियों को यह संदेश देना है कि केवल फोन असेंबल करने के बजाय भारत से ज्यादा से ज्यादा कंपोनेंट्स खरीदने और स्थानीय सप्लायर तैयार करने पर ज्यादा फायदा मिलेगा।
भारतीय ब्रांडों को मिलेगा अतिरिक्त फायदा
नई योजना में भारतीय मोबाइल ब्रांडों के लिए भी विशेष प्रोत्साहन का प्रावधान किया गया है। सरकार घरेलू कंपनियों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए मजबूत करना चाहती है।
योग्य भारतीय ब्रांडों को अधिकतम 5 प्रतिशत इंसेंटिव के लिए पात्र माना जाएगा। इसके अलावा प्रोडक्ट डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट यानी R&D से जुड़े काम के लिए योग्य बिक्री पर 3 प्रतिशत अतिरिक्त इंसेंटिव का प्रावधान भी किया गया है।
इसका मकसद भारत में केवल विदेशी कंपनियों के लिए उत्पादन करना नहीं, बल्कि ऐसे भारतीय ब्रांड तैयार करना भी है जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने उत्पाद बेच सकें।
सरकार चाहती है कि भारत सिर्फ दुनिया के लिए मोबाइल बनाने वाला देश न रहे, बल्कि यहां से विकसित और डिजाइन किए गए मोबाइल ब्रांड भी दुनिया के अलग-अलग बाजारों में अपनी जगह बनाएं।
15 जुलाई को कैबिनेट ने दी थी मंजूरी
₹62,500 करोड़ की इस नई योजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 15 जुलाई 2026 को मंजूरी दी थी। इसके बाद 21 अगस्त को सरकार की ओर से योजना के बारे में विस्तृत जानकारी सामने आई।
सरकार के अनुमान के अनुसार पांच साल के दौरान इस योजना के तहत मोबाइल फोन उत्पादन में भारी वृद्धि हो सकती है। कुल मिलाकर लगभग ₹39 लाख करोड़ के मोबाइल फोन उत्पादन का अनुमान लगाया गया है।
इसके साथ ही करीब 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की उम्मीद है। हालांकि, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े सप्लायर, लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग, वेयरहाउसिंग और अन्य क्षेत्रों में अप्रत्यक्ष रोजगार का आंकड़ा इससे काफी ज्यादा हो सकता है।
पुरानी PLI योजना ने बनाया रास्ता
नई MPMS को समझने के लिए पुरानी Production Linked Incentive (PLI) योजना के नतीजों को देखना जरूरी है।
बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए शुरू की गई PLI-LSEM योजना की अवधि 31 मार्च 2026 को समाप्त हो गई। इस योजना का उद्देश्य भारत में बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल फोन का उत्पादन बढ़ाना था।
सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, PLI 1.0 के तहत मोबाइल फोन का उत्पादन निर्धारित ₹8.12 लाख करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले करीब ₹11.61 लाख करोड़ तक पहुंच गया।
यानी उत्पादन के मामले में योजना अपने निर्धारित लक्ष्य से काफी आगे निकल गई।
निवेश का लक्ष्य भी हुआ पार
PLI 1.0 के तहत सरकार ने करीब ₹7,000 करोड़ के निवेश का लक्ष्य रखा था। लेकिन योजना के दौरान निवेश ₹20,500 करोड़ से अधिक पहुंच गया।
इससे संकेत मिलता है कि भारत में मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को लेकर वैश्विक कंपनियों की रुचि तेजी से बढ़ी।
PLI योजना के बाद दुनिया की कई बड़ी हैंडसेट कंपनियों और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स ने भारत में उत्पादन बढ़ाया। इनमें सैमसंग और भारत में Apple के डिवाइस बनाने वाली कंपनियां भी शामिल हैं।
सरकार के अनुसार PLI 1.0 के लॉन्च के बाद से भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम में लगभग 14 अरब डॉलर का निवेश हुआ है।
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग से 12 लाख लोगों को रोजगार
भारत में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के बढ़ते विस्तार का असर रोजगार पर भी दिखाई दिया है। सरकार के अनुसार मोबाइल फोन निर्माण से जुड़े क्षेत्र में अब लगभग 12 लाख लोगों को रोजगार मिल रहा है।
यह आंकड़ा केवल मोबाइल फोन बनाने वाली फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं है। मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के साथ सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग और दूसरे सहायक क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।
नई योजना के जरिए सरकार इस इकोसिस्टम को और मजबूत करना चाहती है।
अब सबसे बड़ा फोकस होगा Localization
नई MPMS और पुरानी PLI योजना में सबसे महत्वपूर्ण अंतर सरकार के फोकस में दिखाई देता है।
पहले लक्ष्य बड़े पैमाने पर मोबाइल फोन उत्पादन को भारत में लाना था। अब अगला लक्ष्य Localization यानी स्थानीयकरण है।
सरकार चाहती है कि मोबाइल फोन बनाने में इस्तेमाल होने वाले ज्यादा से ज्यादा कंपोनेंट्स भारत में ही तैयार हों।
MeitY सचिव एस. कृष्णन के अनुसार भारत में मोबाइल फोन निर्माण में घरेलू वैल्यू एडिशन करीब 15 प्रतिशत से बढ़कर 23 प्रतिशत हो चुका है।
नई योजना के तहत सरकार इस हिस्सेदारी को और बढ़ाना चाहती है।
मोबाइल के कंपोनेंट्स भारत में बनेंगे तो क्या होगा?
अगर मोबाइल फोन के कंपोनेंट्स भारत में ज्यादा मात्रा में बनने लगते हैं तो इसका सीधा फायदा देश के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को होगा।
इससे कंपनियों को विदेशों से कंपोनेंट मंगाने पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही भारत में छोटे और मध्यम आकार के सप्लायर्स के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग बढ़ने से तकनीकी कौशल, इंजीनियरिंग, रिसर्च और उत्पादन क्षमता भी विकसित हो सकती है।
यही कारण है कि सरकार ने नई योजना में घरेलू सोर्सिंग के लिए अतिरिक्त इंसेंटिव का प्रावधान किया है।
भारत बना दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता
सरकार के अनुसार भारत अब मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश बन चुका है।
देश में इस्तेमाल किए जाने वाले करीब 99.2 प्रतिशत मोबाइल फोन भारत में ही बनाए जाते हैं।
यह आंकड़ा पिछले एक दशक में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में भारत में आए बड़े बदलाव को दिखाता है।
एक समय भारत मोबाइल फोन की घरेलू जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर था। अब देश में बड़ी संख्या में मोबाइल फोन का उत्पादन होने के साथ-साथ इनका निर्यात भी तेजी से बढ़ा है।
2014 से 2025 के बीच 166 गुना बढ़ा मोबाइल एक्सपोर्ट
सरकार के अनुसार 2014 से 2025 के बीच भारत से मोबाइल फोन के एक्सपोर्ट में 166 गुना वृद्धि हुई है।
इस अवधि में मोबाइल फोन एक्सपोर्ट की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट यानी CAGR करीब 59 प्रतिशत रही।
यह बदलाव भारत के मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
FY26 में भारत के कुल इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में मोबाइल फोन की हिस्सेदारी लगभग 61 प्रतिशत रही। इसका मतलब है कि मोबाइल फोन अब भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
स्मार्टफोन बना भारत का बड़ा एक्सपोर्ट प्रोडक्ट
MeitY के अनुसार वर्ष 2025 में स्मार्टफोन भारत से सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट किए जाने वाले प्रोडक्ट कैटेगरी में शामिल हो गया। इसी बदलाव को देखते हुए सरकार ने मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के अगले चरण के लिए नई योजना तैयार की है।
भारत की रणनीति अब साफ दिखाई देती है—पहले मोबाइल फोन का उत्पादन बढ़ाना, फिर घरेलू वैल्यू एडिशन बढ़ाना और इसके बाद वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भूमिका को मजबूत करना।
Apple और Samsung जैसी कंपनियों के लिए भी महत्वपूर्ण
भारत में पहले से ही दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों के लिए मोबाइल फोन बनाए जा रहे हैं। PLI योजना के दौरान सैमसंग और Apple के डिवाइस बनाने वाली कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों ने भारत में अपनी मौजूदगी मजबूत की।
नई योजना के जरिए सरकार ऐसे निवेश को आगे बढ़ाने के साथ-साथ भारतीय कंपनियों को भी वैश्विक बाजार में उतारने की कोशिश कर रही है।
अगर भारतीय ब्रांड अपने उत्पादों का डिजाइन और R&D भारत में विकसित करते हैं और फिर उन्हें विदेशी बाजारों में बेचते हैं, तो इससे देश की टेक्नोलॉजी क्षमता और ब्रांड वैल्यू दोनों बढ़ सकती हैं।
क्या आम लोगों को भी होगा फायदा?
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में निवेश बढ़ने का असर लंबे समय में आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।
अगर भारत में ज्यादा कंपोनेंट्स और सब-असेंबली बनने लगती हैं तो कंपनियों की सप्लाई चेन मजबूत हो सकती है। इससे उत्पादन की लागत, लॉजिस्टिक्स और आयात पर निर्भरता को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि नई योजना लागू होते ही मोबाइल फोन सस्ते हो जाएंगे। मोबाइल की कीमतें वैश्विक कंपोनेंट कीमतों, मुद्रा विनिमय दर, टैक्स, ब्रांड रणनीति और अन्य कई कारकों पर निर्भर करती हैं।
भारत के लिए क्यों बड़ा है यह फैसला?
भारत में स्मार्टफोन का बाजार बहुत बड़ा है, लेकिन अब सरकार की नजर केवल घरेलू बिक्री पर नहीं है। लक्ष्य भारत को ग्लोबल मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब बनाना है।
₹62,500 करोड़ की MPMS इसी रणनीति का अगला चरण है। PLI 1.0 ने जहां उत्पादन और निवेश को बढ़ाने में मदद की, वहीं नई योजना घरेलू कंपोनेंट निर्माण, R&D और भारतीय ब्रांडों को बढ़ावा देने पर ज्यादा जोर दे रही है।
अगर योजना के लक्ष्य हासिल होते हैं तो अगले पांच वर्षों में भारत के मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का आकार काफी बड़ा हो सकता है।
अब आगे की चुनौती क्या होगी?
नई योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इंसेंटिव का लाभ केवल असेंबली बढ़ाने तक सीमित न रहे। सरकार जिस घरेलू वैल्यू एडिशन को बढ़ाना चाहती है, उसके लिए कंपोनेंट इंडस्ट्री, सेमीकंडक्टर, डिस्प्ले, बैटरी, कैमरा मॉड्यूल और अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों की घरेलू क्षमता विकसित करनी होगी।
इसके साथ ही कुशल श्रमिक, तकनीकी प्रशिक्षण, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और वैश्विक गुणवत्ता मानकों को बनाए रखना भी जरूरी होगा।
₹62,500 करोड़ की नई मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स रणनीति में एक बड़ा अगला कदम है। सरकार अब सिर्फ यह नहीं चाहती कि मोबाइल फोन भारत में बनें, बल्कि वह चाहती है कि मोबाइल फोन की सप्लाई चेन, तकनीक, डिजाइन, कंपोनेंट और भारतीय ब्रांड भी देश में मजबूत हों।
PLI 1.0 के उत्पादन और निवेश लक्ष्य पार करने के बाद अब MPMS के सामने उससे भी बड़ा लक्ष्य है। आने वाले पांच साल बताएंगे कि यह योजना भारत को दुनिया के लिए मोबाइल बनाने वाले देश से आगे बढ़ाकर मोबाइल टेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रॉनिक्स का वैश्विक केंद्र बनाने में कितनी सफल होती है।

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