Breaking News

3 साल की सर्जरी वेटिंग से परेशान ब्रिटिश शख्स भारत आया, 14 हजार पाउंड में बदलवा लिए दोनों घुटने… फिर जो हुआ चौंका देगा

 


नई दिल्ली: घुटनों का दर्द किसी व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी को किस तरह बदल सकता है, इसकी एक दिलचस्प कहानी ब्रिटेन से सामने आई है। ब्रिटेन के रहने वाले जीन पॉल लंबे समय से घुटनों की गंभीर समस्या से परेशान थे। दर्द इतना बढ़ गया था कि उनके लिए कुत्ते को टहलाने या पत्नी के साथ शाम की सैर पर जाना भी मुश्किल हो गया था। जब उन्होंने इलाज के लिए ब्रिटेन की सरकारी स्वास्थ्य सेवा NHS का रुख किया, तो उन्हें घुटने की सर्जरी के लिए करीब तीन साल तक इंतजार करने की जानकारी दी गई।

जीन के लिए यह इंतजार आसान नहीं था। समस्या केवल लंबी वेटिंग लिस्ट नहीं थी, बल्कि उनके दोनों घुटनों की स्थिति ऐसी थी कि एक साथ दोनों घुटनों की सर्जरी कराने का विकल्प भी उपलब्ध नहीं था। आखिरकार उन्होंने भारत का रुख करने का फैसला किया। यहां दिल्ली में उनका दोनों घुटनों का एक साथ रिप्लेसमेंट किया गया और सर्जरी के बाद उन्होंने रिहैबिलिटेशन के जरिए दोबारा चलने-फिरने की क्षमता हासिल की।

इस पूरे मामले की खास बात सिर्फ यह नहीं है कि एक विदेशी मरीज ने भारत में इलाज कराया, बल्कि इलाज की लागत और प्रतीक्षा अवधि में आया बड़ा अंतर भी है।

तीन साल का इंतजार बना सबसे बड़ी परेशानी

जीन पॉल के लिए घुटनों का दर्द धीरे-धीरे उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया था। जो काम कभी बेहद सामान्य लगते थे, वही उनके लिए मुश्किल होते चले गए। कुत्ते को बाहर घुमाने जाना, पत्नी के साथ शाम को पैदल घूमना या सामान्य तरीके से चलना उनके लिए परेशानी भरा हो गया।

इलाज की उम्मीद में उन्होंने NHS से संपर्क किया। वहां उन्हें घुटने की सर्जरी के लिए लंबी प्रतीक्षा अवधि के बारे में बताया गया। जानकारी के मुताबिक, उन्हें करीब तीन साल तक इंतजार करना पड़ सकता था।

घुटने की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति के लिए तीन साल का इंतजार काफी लंबा माना जा सकता है। खासतौर पर तब, जब दर्द लगातार रोजमर्रा के कामों को प्रभावित कर रहा हो। जीन ने इस स्थिति को स्वीकार करने के बजाय वैकल्पिक विकल्प तलाशना शुरू किया।

यही तलाश उन्हें भारत तक ले आई।

भारत आने से पहले घटाया 19 किलो वजन

भारत में सर्जरी कराने का फैसला करने के बाद जीन ने खुद को ऑपरेशन के लिए तैयार करना शुरू किया। बताया गया है कि सर्जरी के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट होने के उद्देश्य से उन्होंने कई महीनों तक अपने स्वास्थ्य और फिटनेस पर काम किया।

इस दौरान उन्होंने करीब 19 किलोग्राम वजन कम किया। वजन कम करना उनके लिए सिर्फ सर्जरी की तैयारी नहीं था, बल्कि बेहतर रिकवरी की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम था।

जब वह चिकित्सकीय रूप से सर्जरी के लिए तैयार हुए तो उन्होंने मेडिकल ट्रैवल कंपनी के माध्यम से भारत की यात्रा की। इसके बाद वह दिल्ली पहुंचे, जहां साकेत स्थित मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में उनके इलाज की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

दिल्ली में एक साथ बदले गए दोनों घुटने

भारत पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने जीन की मेडिकल जांच की और उनकी स्थिति का आकलन किया। इसके बाद उनके दोनों घुटनों का रिप्लेसमेंट एक ही सर्जिकल प्रक्रिया में किया गया।

दोनों घुटनों की सर्जरी के बाद तुरंत सामान्य जिंदगी में लौटना संभव नहीं होता। शरीर को नई स्थिति के अनुकूल होने में समय लगता है और मरीज को नियमित फिजियोथेरेपी तथा रिहैबिलिटेशन की जरूरत होती है।

जीन के मामले में भी सर्जरी के बाद रिकवरी पर विशेष ध्यान दिया गया। वह करीब दो सप्ताह तक एक विशेष रिहैब सेंटर में रहे। इस दौरान उन्होंने नियमित फिजियोथेरेपी की। धीरे-धीरे उनके पैरों की ताकत और चलने की क्षमता में सुधार हुआ।

रोजाना की फिजियोथेरेपी ने लौटाई चाल

घुटना बदलने के बाद मरीज के लिए फिजियोथेरेपी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सर्जरी के बाद मांसपेशियों को मजबूत करना, घुटने की मूवमेंट बढ़ाना और शरीर को दोबारा चलने के लिए तैयार करना रिकवरी का अहम हिस्सा होता है।

जीन ने भी रिहैबिलिटेशन के दौरान नियमित व्यायाम और फिजियोथेरेपी की। धीरे-धीरे उनकी चाल में सुधार आया और वह पहले की तुलना में अधिक सहज तरीके से चलने लगे।

जिस व्यक्ति के लिए कुछ समय पहले अपने कुत्ते को टहलाना भी मुश्किल था, उसके लिए दोबारा सामान्य गतिविधियां कर पाना बड़ी उपलब्धि थी।

भारत में इलाज पर खर्च हुआ ब्रिटेन से काफी कम

जीन पॉल की कहानी का दूसरा सबसे बड़ा पहलू इलाज की लागत है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, ब्रिटेन में उनके इलाज का अनुमानित खर्च करीब 40 हजार पाउंड यानी लगभग 51.56 लाख रुपये बताया गया था।

इसके मुकाबले भारत में उनका पूरा इलाज करीब 14 हजार पाउंड, यानी लगभग 18.05 लाख रुपये में हो गया।

यहां खास बात यह बताई गई है कि भारत में खर्च केवल सर्जरी की फीस तक सीमित नहीं था। इसमें ब्रिटेन से भारत आने-जाने की फ्लाइट, रहने और खाने का खर्च, मेडिकल इंश्योरेंस तथा इलाज के दौरान देखभाल से जुड़े खर्च भी शामिल थे।

इस तरह उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भारत में उनका कुल खर्च ब्रिटेन के अनुमान से करीब 65 प्रतिशत कम रहा।

हालांकि, किसी भी मरीज के इलाज का वास्तविक खर्च उसकी मेडिकल स्थिति, अस्पताल, सर्जरी के प्रकार, इम्प्लांट और इलाज की अवधि के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। इसलिए किसी एक मरीज के अनुभव को हर विदेशी मरीज के लिए समान लागत मानना उचित नहीं होगा।

भारत क्यों बन रहा है मेडिकल टूरिज्म का बड़ा केंद्र?

जीन पॉल का मामला भारत में मेडिकल टूरिज्म की बढ़ती चर्चा के बीच सामने आया है। पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में विदेशी मरीज भारत में इलाज कराने के लिए आते रहे हैं।

भारत में मेडिकल टूरिज्म की लोकप्रियता के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। इनमें अपेक्षाकृत कम लागत, विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता, आधुनिक अस्पताल, उन्नत चिकित्सा तकनीक और कई जटिल प्रक्रियाओं के लिए प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ शामिल हैं।

भारत में बड़े निजी अस्पतालों ने अंतरराष्ट्रीय मरीजों के लिए अलग सेवाएं भी विकसित की हैं। इनमें एयरपोर्ट ट्रांसफर, भाषा संबंधी सहायता, रहने की व्यवस्था, मेडिकल कोऑर्डिनेशन और सर्जरी के बाद रिहैबिलिटेशन जैसी सुविधाएं शामिल हो सकती हैं।

इसी वजह से दूसरे देशों के मरीज इलाज के साथ-साथ भारत में लंबे समय तक रहकर रिकवरी की प्रक्रिया पूरी करने का विकल्प भी चुनते हैं।

मेडिकल वीजा से आसान हुई विदेशी मरीजों की यात्रा

भारत में विदेशी मरीजों के आने को आसान बनाने के लिए मेडिकल वीजा और ई-मेडिकल वीजा जैसी व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं। इससे दूसरे देशों से इलाज के लिए भारत आने वाले मरीजों के लिए प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान हो सकती है।

हालांकि, मेडिकल वीजा की पात्रता और नियम देश तथा समय के अनुसार बदल सकते हैं। इसलिए किसी भी विदेशी मरीज के लिए यात्रा से पहले आधिकारिक सरकारी दिशा-निर्देशों की जांच करना जरूरी है।

मेडिकल टूरिज्म केवल सस्ती सर्जरी तक सीमित नहीं है। मरीज आमतौर पर डॉक्टर की विशेषज्ञता, अस्पताल की गुणवत्ता, इलाज के बाद की देखभाल और सुरक्षा जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर देश और अस्पताल का चुनाव करते हैं।

जीन पॉल की कहानी में सबसे खास क्या?

जीन पॉल की कहानी इसलिए चर्चा में आई क्योंकि एक तरफ उन्हें अपने देश में लंबी वेटिंग का सामना करना पड़ रहा था, वहीं दूसरी तरफ भारत आकर उन्हें अपेक्षाकृत कम समय में दोनों घुटनों की सर्जरी और उसके बाद रिहैबिलिटेशन की सुविधा मिली।

सर्जरी से पहले उन्होंने खुद भी अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए मेहनत की और करीब 19 किलो वजन कम किया। इसके बाद उन्होंने भारत में इलाज कराया और रिहैबिलिटेशन पूरा किया।

अब वह वापस ब्रिटेन लौट चुके हैं और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को दोबारा बेहतर तरीके से जीने की कोशिश कर रहे हैं।

दर्द से सामान्य जिंदगी तक का सफर

जीन पॉल के लिए यह सफर सिर्फ एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं था। यह उस जिंदगी को वापस पाने की कोशिश थी, जिसमें वह अपने कुत्ते के साथ बाहर जा सकें और पत्नी के साथ शाम की सैर कर सकें।

घुटने का दर्द उनकी गतिविधियों पर लगातार रोक लगा रहा था। लंबी प्रतीक्षा ने समस्या को और कठिन बना दिया था। भारत आने और सर्जरी कराने के बाद उनकी रिकवरी ने उन्हें दोबारा सक्रिय जीवन की ओर लौटने का मौका दिया।

उनकी कहानी यह भी बताती है कि किसी गंभीर समस्या के इलाज का फैसला लेते समय मरीजों को केवल कीमत नहीं, बल्कि डॉक्टर की विशेषज्ञता, अस्पताल की विश्वसनीयता, सर्जरी के जोखिम, इम्प्लांट की गुणवत्ता और ऑपरेशन के बाद की देखभाल जैसे सभी पहलुओं की जांच करनी चाहिए।

भारत में इलाज कराने वाले विदेशी मरीजों की बढ़ती संख्या देश के मेडिकल टूरिज्म सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। जीन पॉल का अनुभव इसी व्यापक बदलाव की एक मिसाल के रूप में देखा जा सकता है—जहां एक मरीज लंबी प्रतीक्षा और महंगे इलाज के विकल्प के बीच दूसरा रास्ता तलाशता है और आखिरकार भारत में उपचार और रिहैबिलिटेशन के बाद अपनी सामान्य जिंदगी की ओर लौटने में सफल होता है।

कोई टिप्पणी नहीं