बेटा 3 महीने तक बिस्तर पर पड़ा रहा... मां ने जो किया, उसने IIT दिल्ली का रास्ता खोल दिया!
कोटा। सफलता की हर कहानी के पीछे संघर्ष, त्याग और अटूट विश्वास छिपा होता है। लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो केवल परीक्षा में सफलता की नहीं बल्कि परिवार के समर्पण और हिम्मत की मिसाल बन जाती हैं। राजस्थान के कोटा से ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जहां एक मां ने अपने बेटे के सपनों को टूटने नहीं दिया। जब बेटा गंभीर बीमारी के कारण महीनों तक बिस्तर पर पड़ा रहा और कोचिंग की क्लासें नहीं जा सका, तब मां ने खुद छात्र बनकर ऑनलाइन क्लासें देखीं, नोट्स तैयार किए और बेटे की पढ़ाई की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। आखिरकार उसी मेहनत ने बेटे को देश के प्रतिष्ठित IIT दिल्ली तक पहुंचा दिया।
यह कहानी बिहार के सीतामढ़ी निवासी गुंजन कुमार और उनकी मां गुंजा की है, जो आज हजारों विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।
सपनों की राह में आई सबसे बड़ी चुनौती
गुंजन कुमार का सपना बचपन से ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) में पढ़ने का था। कमजोर आर्थिक या शारीरिक परिस्थितियों को उन्होंने कभी अपने सपनों के बीच नहीं आने दिया। इसी उद्देश्य से वर्ष 2023 में वे कोटा पहुंचे और यहां रहकर जेईई परीक्षा की तैयारी शुरू की।
सब कुछ योजना के अनुसार चल रहा था। नियमित पढ़ाई, टेस्ट और कड़ी मेहनत के बीच गुंजन अपने लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहे थे। लेकिन परीक्षा से कुछ महीने पहले किस्मत ने ऐसी परीक्षा ली, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
5 अक्टूबर 2025 को कोचिंग में नियमित टेस्ट देने के अगले ही दिन उन्हें सीने में तेज दर्द महसूस हुआ। जांच कराने पर पता चला कि उन्हें न्यूमोथोरेक्स नामक गंभीर बीमारी हो गई है, जिसमें फेफड़ा सिकुड़ जाता है या कोलेप्स हो जाता है। डॉक्टरों ने तत्काल आराम की सलाह दी और गुंजन लगभग तीन महीने तक बिस्तर से उठ भी नहीं सके।
मां ने संभाल ली पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी
बीमारी के कारण गुंजन को कोचिंग की नियमित कक्षाओं से दूर रहना पड़ा। ऐसे समय में उनकी मां गुंजा ने वह जिम्मेदारी उठाई, जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
गृहिणी होने के बावजूद उन्होंने वर्षों बाद फिर से पढ़ाई शुरू की। ऑनलाइन क्लासों में बैठीं, हर विषय को ध्यान से सुना और अपने बेटे के लिए विस्तार से नोट्स तैयार किए।
गुंजन बिस्तर पर रहते हुए उन्हीं वीडियो लेक्चर और मां द्वारा तैयार किए गए नोट्स के माध्यम से अपनी पढ़ाई जारी रखते रहे। जब भी उन्हें किसी विषय में कठिनाई होती, मां उनके साथ बैठकर दोबारा वीडियो देखतीं और महत्वपूर्ण बिंदुओं को समझाकर लिखतीं।
यही नोट्स बाद में परीक्षा की तैयारी का सबसे बड़ा सहारा बने।
आंखों की कमजोरी भी नहीं रोक सकी हौसले की उड़ान
गुंजन के सामने केवल बीमारी ही चुनौती नहीं थी। उनकी आंखों की रोशनी भी सामान्य विद्यार्थियों की तुलना में काफी कमजोर है।
करीब 70 प्रतिशत से अधिक दृष्टि कमजोर होने के कारण उन्हें लगभग 9.5 नंबर का चश्मा लगाना पड़ता है। लंबे समय तक पढ़ाई करना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
धीरे-धीरे स्वास्थ्य में सुधार होने के बाद उन्होंने दोबारा पूरी मेहनत से तैयारी शुरू की और अपनी सीमाओं को पीछे छोड़ दिया।
शानदार प्रदर्शन से हासिल किया IIT का सपना
कड़ी मेहनत और परिवार के सहयोग का परिणाम आखिरकार परीक्षा परिणाम में दिखाई दिया।
गुंजन ने JEE Main में 91.8 पर्सेंटाइल प्राप्त किए। इसके बाद JEE Advanced में उन्होंने PWD OBC कैटेगरी में ऑल इंडिया रैंक 50 तथा कॉमन PWD रैंक 120 हासिल की।
अब उनका चयन IIT दिल्ली में कंप्यूटर साइंस (CS) शाखा के लिए हो चुका है, जहां वे अपने वर्षों पुराने सपने को साकार करने जा रहे हैं।
पिता इंजीनियर, छोटा भाई भी कर रहा तैयारी
गुंजन के पिता राजनारायण प्रसाद सीमा सड़क संगठन (BRO) में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं।
पूरे परिवार ने गुंजन के सपनों को पूरा करने में हर संभव सहयोग दिया। आज जब गुंजन IIT दिल्ली में प्रवेश लेने जा रहे हैं, तब उनका छोटा भाई भी कोटा में रहकर JEE की तैयारी कर रहा है।
परिवार को उम्मीद है कि वह भी बड़े भाई की तरह सफलता प्राप्त करेगा।
बेटे का सपना ही मां का सपना बन गया
गुंजन की मां गुंजा बताती हैं कि जब बेटे की बीमारी का पता चला तो वे काफी चिंतित हो गई थीं।
लेकिन उन्होंने हार मानने की बजाय परिस्थिति से लड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि बेटे का सपना ही उनका सपना था, इसलिए उन्होंने ऑनलाइन क्लासों के माध्यम से स्वयं पढ़ाई की और बेटे के लिए विस्तृत नोट्स तैयार किए।
उनके अनुसार जब परीक्षा के दौरान वही नोट्स सबसे ज्यादा काम आए तो उन्हें ऐसा लगा जैसे उनकी मेहनत भी सफल हो गई हो।
गुंजा मानती हैं कि कोटा केवल विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी नहीं कराता, बल्कि चुनौतियों का सामना करना और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना भी सिखाता है।
बीमारी के बावजूद नहीं टूटा आत्मविश्वास
गुंजन का कहना है कि जीवन में परिस्थितियां हमेशा अनुकूल नहीं होतीं।
उन्होंने बताया कि परीक्षा केवल किताबों की नहीं बल्कि मानसिक मजबूती और धैर्य की भी होती है। बीमारी के दौरान उन्हें कई बार लगा कि शायद उनका सपना अधूरा रह जाएगा, लेकिन मां और शिक्षकों ने लगातार उनका मनोबल बढ़ाया।
उन्होंने कहा कि यदि उस समय परिवार और शिक्षकों का सहयोग नहीं मिलता तो शायद वे इतनी बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाते।
उनका मानना है कि हर विद्यार्थी को कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोच बनाए रखनी चाहिए और कभी भी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं करना चाहिए।
टॉपर की कहानी से मिली प्रेरणा
गुंजन ने बताया कि कोटा आने का फैसला भी उन्होंने एक प्रेरणादायक कहानी से प्रभावित होकर लिया था।
उन्होंने इंटरनेट पर JEE की तैयारी के लिए सर्वश्रेष्ठ कोचिंग संस्थानों की जानकारी खोजी। इसी दौरान उन्होंने वर्ष 2021 के JEE Main और Advanced के ऑल इंडिया टॉपर मृदुल अग्रवाल का वीडियो देखा।
उस सफलता की कहानी ने उन्हें इतना प्रेरित किया कि उन्होंने भी कोटा जाकर तैयारी करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने माता-पिता से कोटा भेजने की जिद की और परिवार ने भी उनकी लगन देखकर पूरा सहयोग दिया।
विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए बड़ी सीख
गुंजन कुमार की सफलता केवल एक छात्र की उपलब्धि नहीं बल्कि यह संदेश भी देती है कि किसी भी लक्ष्य तक पहुंचने के लिए परिवार का सहयोग कितना महत्वपूर्ण होता है।
आज जब प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव लगातार बढ़ रहा है, तब यह कहानी बताती है कि केवल कोचिंग या किताबें ही सफलता नहीं दिलातीं, बल्कि परिवार का विश्वास, माता-पिता का त्याग और कठिन समय में मिला मानसिक संबल भी उतना ही जरूरी होता है।
मां द्वारा बनाए गए नोट्स, बेटे की अटूट मेहनत और शिक्षकों के मार्गदर्शन ने मिलकर यह साबित कर दिया कि यदि इरादे मजबूत हों तो बीमारी, शारीरिक कमजोरी और कठिन परिस्थितियां भी सफलता का रास्ता नहीं रोक सकतीं।
गुंजन कुमार की यह प्रेरणादायक यात्रा आज लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए एक संदेश है कि संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि परिवार साथ खड़ा हो और लक्ष्य स्पष्ट हो, तो सफलता निश्चित रूप से एक दिन कदम चूमती है।

कोई टिप्पणी नहीं