AIIMS की चौंकाने वाली स्टडी: कैंसर से लड़ते-लड़ते बिखर रहे परिवार, नौकरी गई, गहने बिके, बच्चों की पढ़ाई भी छूटी
नई दिल्ली: कैंसर केवल एक गंभीर बीमारी नहीं है, बल्कि यह हजारों परिवारों के लिए आर्थिक, सामाजिक और मानसिक संकट का कारण भी बन रही है। खासकर जब किसी छोटे बच्चे को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो जाए, तो पूरा परिवार उसकी जिंदगी बचाने की लड़ाई में अपनी जमा-पूंजी, रोजगार और सामाजिक स्थिरता तक दांव पर लगा देता है। दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की एक नई स्टडी ने इसी दर्दनाक सच्चाई को सामने रखा है।
एम्स के इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर हॉस्पिटल द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि कैंसर पीड़ित बच्चों के इलाज के दौरान बड़ी संख्या में परिवारों को नौकरी छोड़नी पड़ी, अपनी बचत खत्म करनी पड़ी और कई मामलों में जमीन और गहने तक बेचने पड़े। इतना ही नहीं, इलाज के दौरान बच्चों की पढ़ाई भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
यह शोध प्रतिष्ठित JCO Global Oncology Journal में प्रकाशित हुआ है और इसमें 1,048 कैंसर पीड़ित बच्चों एवं उनके परिवारों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।
हर चौथे परिवार की नौकरी पर पड़ा असर
अध्ययन के सबसे चिंताजनक निष्कर्षों में से एक यह है कि 26.6 प्रतिशत अभिभावकों की नौकरी बच्चे के इलाज के दौरान छूट गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर का इलाज महीनों या कई बार वर्षों तक चलता है। ऐसे में माता-पिता को बार-बार अस्पताल जाना पड़ता है, जिससे नियमित नौकरी करना मुश्किल हो जाता है। कई निजी कंपनियों में इतनी लंबी छुट्टी की सुविधा नहीं होती, जिसके कारण अभिभावकों को नौकरी छोड़नी पड़ती है या उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ता है।
इसका सीधा असर पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है।
इलाज के लिए दूसरे शहरों का रुख
स्टडी के अनुसार 77.1 प्रतिशत परिवारों को अपने शहर या कस्बे में इलाज की सुविधा नहीं मिली, जिसके कारण उन्हें दूसरे शहरों में जाना पड़ा।
भारत में बाल कैंसर के इलाज की आधुनिक सुविधाएं अभी भी कुछ बड़े शहरों तक सीमित हैं। ऐसे में दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले परिवारों को—
किराए पर रहना,
यात्रा का खर्च उठाना,
भोजन और अन्य आवश्यक खर्च करना,
लंबे समय तक अस्पताल के आसपास रहना
जैसी अतिरिक्त आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
यह खर्च इलाज की लागत से अलग होता है और परिवारों पर अतिरिक्त बोझ डालता है।
जमीन और गहने बेचने तक की नौबत
एम्स की स्टडी में सामने आया कि 26.8 प्रतिशत परिवारों को इलाज का खर्च उठाने के लिए अपनी संपत्ति बेचनी पड़ी।
इनमें—
12 प्रतिशत परिवारों ने अपनी जमीन बेची।
9.4 प्रतिशत परिवारों ने गहने बेच दिए।
भारतीय परिवारों के लिए जमीन और आभूषण केवल संपत्ति नहीं बल्कि भविष्य की सुरक्षा माने जाते हैं। ऐसे में उनका बिक जाना इस बात का संकेत है कि परिवार कितनी गंभीर आर्थिक मजबूरी से गुजर रहे हैं।
पूरी जिंदगी की बचत हो गई खत्म
रिपोर्ट में बताया गया कि 47.4 प्रतिशत परिवारों की पूरी बचत इलाज में खर्च हो गई।
इसके अलावा—
27 प्रतिशत अभिभावकों को रिश्तेदारों और परिचितों से उधार लेना पड़ा।
यानी बीमारी केवल मरीज को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक नींव को हिला देती है।
लाखों रुपये तक पहुंच जाता है इलाज का खर्च
अध्ययन में शामिल 50.9 प्रतिशत बच्चों के इलाज पर औसतन लगभग तीन लाख रुपये खर्च हुए।
हालांकि कई प्रकार के कैंसर में इलाज की अवधि और लागत इससे कहीं अधिक भी हो सकती है।
इलाज में शामिल होते हैं—
कीमोथेरेपी,
सर्जरी,
रेडियोथेरेपी,
जांच,
दवाइयां,
अस्पताल में भर्ती,
नियमित फॉलो-अप।
इन सभी खर्चों को मिलाकर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जाता है।
किन परिवारों पर हुई स्टडी?
एम्स के शोधकर्ताओं ने 1,048 बच्चों और उनके परिवारों का अध्ययन किया।
इनमें—
66.4 प्रतिशत बच्चे शहरी क्षेत्रों से थे।
33.6 प्रतिशत बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों से थे।
55.7 प्रतिशत बच्चे अस्पताल से 100 किलोमीटर से अधिक दूरी पर रहते थे।
इससे स्पष्ट होता है कि बड़ी संख्या में मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ा गंभीर असर
रिपोर्ट में एक और चिंताजनक तथ्य सामने आया।
इलाज के दौरान—
85 प्रतिशत बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई।
3.1 प्रतिशत बच्चे ठीक होने के बाद भी दोबारा स्कूल नहीं लौट सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर के इलाज के दौरान बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। लंबे समय तक अस्पताल में रहने और लगातार इलाज के कारण उनकी शिक्षा बाधित होती है।
इसका असर उनके मानसिक विकास और भविष्य के करियर पर भी पड़ सकता है।
राहत की बात भी सामने आई
हालांकि अध्ययन में कुछ सकारात्मक तथ्य भी सामने आए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार—
बच्चों में कैंसर के ठीक होने की दर 80 प्रतिशत से अधिक है।
चिकित्सकों का कहना है कि यदि समय पर पहचान हो जाए और उचित इलाज मिले तो अधिकांश बच्चों का सफल इलाज संभव है।
यानी समय पर उपचार मिलने से कैंसर अब पहले की तुलना में कहीं अधिक उपचार योग्य बीमारी बन चुका है।
सरकारी योजनाएं बन रही हैं सहारा
रिपोर्ट में बताया गया है कि कई सरकारी योजनाएं कैंसर मरीजों की आर्थिक मदद कर रही हैं।
इनमें प्रमुख हैं—
आयुष्मान भारत योजना
राष्ट्रीय आरोग्य निधि
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष
इसके अलावा—
18 प्रतिशत बच्चों को गैर-सरकारी संस्थाओं (NGO) से सहायता मिली।
4.8 प्रतिशत को सरकारी योजनाओं से मदद मिली।
1.5 प्रतिशत को बीमा से सहायता प्राप्त हुई।
हालांकि रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि दिल्ली सरकार की आरोग्य कोष योजना से एम्स को फंड जारी नहीं किया जाता, जिसके कारण कई मरीजों को सहायता मिलने में कठिनाई आती है।
विदेशों में भी स्थिति आसान नहीं
अध्ययन में यह भी बताया गया कि यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है।
अमेरिका में कैंसर पीड़ित बच्चों के माता-पिता को केवल 12 सप्ताह का बिना वेतन अवकाश मिलता है।
वहीं जापान में लगभग दो-तिहाई माताओं को अपने बच्चे की देखभाल के लिए नौकरी छोड़नी पड़ती है या लंबी छुट्टी लेनी पड़ती है।
इससे स्पष्ट होता है कि बाल कैंसर का आर्थिक प्रभाव एक वैश्विक चुनौती है।
विशेषज्ञों की राय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल इलाज उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ परिवारों को आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सहायता भी मिलनी चाहिए।
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि—
जिला स्तर पर बाल कैंसर उपचार केंद्रों का विस्तार किया जाए।
मरीजों के परिवारों के लिए आवास और भोजन की व्यवस्था मजबूत हो।
आर्थिक सहायता योजनाओं को सरल बनाया जाए।
बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए विशेष शिक्षा कार्यक्रम शुरू किए जाएं।
अभिभावकों को रोजगार सुरक्षा और विशेष अवकाश जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
एम्स की यह स्टडी केवल चिकित्सा आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की वास्तविक कहानी है जो अपने बच्चों की जिंदगी बचाने के लिए हर संभव संघर्ष कर रहे हैं। नौकरी छूटना, बचत खत्म होना, जमीन और गहने बेचना तथा बच्चों की पढ़ाई बाधित होना इस बात का संकेत है कि कैंसर केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है।
हालांकि राहत की बात यह है कि आधुनिक चिकित्सा की मदद से बच्चों में कैंसर के ठीक होने की संभावना 80 प्रतिशत से अधिक है। ऐसे में समय पर जांच, बेहतर इलाज, मजबूत सरकारी सहायता और समाज के सहयोग से न केवल बच्चों की जान बचाई जा सकती है, बल्कि उनके परिवारों को आर्थिक और मानसिक संकट से भी काफी हद तक राहत दिलाई जा सकती है।

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