दिल्ली-NCR भी बेबस! देश में लाखों मरीज अंग के इंतज़ार में, रिपोर्ट ने खोली डराने वाली हकीकत
भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, जहां 145 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं। बदलती जीवनशैली, अनियमित खानपान, बढ़ते प्रदूषण, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य गंभीर बीमारियों के कारण देश में लिवर, किडनी, हार्ट और फेफड़ों (लंग्स) से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इन परिस्थितियों ने अंग प्रत्यारोपण (ऑर्गन ट्रांसप्लांट) की आवश्यकता को पहले से कहीं अधिक बढ़ा दिया है।
हालांकि भारत दुनिया में सबसे अधिक अंग प्रत्यारोपण करने वाले देशों में तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है, लेकिन यह उपलब्धि भी मरीजों की जरूरतों के सामने बेहद छोटी साबित हो रही है। लाखों मरीज ऐसे हैं जो समय पर अंग नहीं मिलने के कारण अपनी जान गंवा देते हैं या वर्षों तक प्रतीक्षा सूची में रहने को मजबूर हैं।
हर साल करीब 4 लाख ट्रांसप्लांट की जरूरत
इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल द लैंसेट रीजनल हेल्थ साउथ ईस्ट एशिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने भारत में अंग प्रत्यारोपण की वास्तविक स्थिति को सामने रखा है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 में देश में किडनी, लिवर, हार्ट और फेफड़ों के लगभग 3.9 लाख प्रत्यारोपण की आवश्यकता थी।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां इसी तरह बढ़ती रहीं तो वर्ष 2040 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 4.63 लाख तक पहुंच सकती है। यानी आने वाले वर्षों में अंग प्रत्यारोपण की मांग और अधिक बढ़ने वाली है।
जरूरत के मुकाबले बेहद कम हो रहे ट्रांसप्लांट
रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि जरूरत के मुकाबले भारत में बहुत कम मरीजों को प्रत्यारोपण की सुविधा मिल पा रही है।
वर्ष 2021 के आंकड़ों के अनुसार—
किडनी ट्रांसप्लांट की कुल जरूरत का केवल 7.2 प्रतिशत ही पूरा हो सका।
लिवर ट्रांसप्लांट की मांग का केवल 1.5 प्रतिशत पूरा हुआ।
फेफड़ों के प्रत्यारोपण का आंकड़ा सिर्फ 1.2 प्रतिशत रहा।
हार्ट ट्रांसप्लांट की स्थिति सबसे खराब रही, जहां जरूरत का मात्र 0.2 प्रतिशत ही प्रत्यारोपण संभव हो पाया।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि लाखों मरीज ऐसे हैं जिन्हें समय पर नया अंग नहीं मिल पाता और उनकी जान खतरे में पड़ जाती है।
भारत तीसरे स्थान पर, फिर भी लंबी प्रतीक्षा सूची
इंडियन सोसाइटी ऑफ ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन के सचिव तथा रिपोर्ट के मुख्य लेखक डॉ. मनीष बलवानी के अनुसार भारत दुनिया में अंग प्रत्यारोपण करने वाले देशों में तीसरे स्थान पर जरूर है, लेकिन मरीजों की संख्या इतनी अधिक है कि उपलब्ध ट्रांसप्लांट पर्याप्त नहीं हैं।
उनका कहना है कि देश में प्रतिदिन ऐसे कई मरीज अस्पतालों में भर्ती होते हैं जिन्हें तुरंत किडनी, लिवर या हार्ट ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है, लेकिन अंग उपलब्ध न होने के कारण उनका इलाज अधूरा रह जाता है।
किडनी से ज्यादा बढ़ रही लिवर ट्रांसप्लांट की मांग
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि भारत में किडनी की तुलना में लिवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता तेजी से बढ़ रही है।
वर्ष 2021 में—
लगभग 1.26 लाख मरीजों को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत थी।
वहीं 1.85 लाख मरीजों को लिवर ट्रांसप्लांट की आवश्यकता थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि शराब का बढ़ता सेवन, फैटी लिवर, हेपेटाइटिस, मोटापा और अनियमित जीवनशैली के कारण लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यही वजह है कि लिवर प्रत्यारोपण की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है।
कुछ राज्यों में ही केंद्रित हैं ट्रांसप्लांट की सुविधाएं
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि देश में अंग प्रत्यारोपण की सुविधाएं समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
दिल्ली-एनसीआर, महाराष्ट्र, केरल, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों में देश के लगभग 80 से 96 प्रतिशत ट्रांसप्लांट किए जाते हैं, जबकि इन क्षेत्रों में देश की कुल आबादी का हिस्सा केवल 29 प्रतिशत है।
इसका मतलब यह है कि देश के कई राज्यों में रहने वाले मरीजों को बेहतर इलाज और ट्रांसप्लांट की सुविधा तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई बार आर्थिक तंगी और समय की कमी के कारण मरीज इलाज भी नहीं करा पाते।
मरीज की जिंदगी इस बात पर निर्भर कि वह कहां रहता है
रिपोर्ट के सह-लेखक डॉ. विवेक कुटे का कहना है कि भारत में किसी मरीज की जान बच पाएगी या नहीं, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस राज्य या शहर में रहता है।
जहां बेहतर अस्पताल और ट्रांसप्लांट सेंटर मौजूद हैं, वहां मरीजों के बचने की संभावना अधिक होती है। वहीं दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले मरीजों के लिए समय पर इलाज मिलना काफी कठिन हो जाता है।
82 प्रतिशत प्रत्यारोपण परिवार के सदस्यों से
भारत में अंगदान की सबसे बड़ी चुनौती मृत व्यक्ति के अंगदान (कैडेवर डोनेशन) की कम दर है।
रिपोर्ट के अनुसार देश में लगभग 82 प्रतिशत अंग प्रत्यारोपण ऐसे मामलों में होते हैं, जहां परिवार का कोई सदस्य अपनी किडनी या लिवर का हिस्सा दान करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ब्रेन-डेड मरीजों के अंगदान को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़े तो हजारों मरीजों की जान बचाई जा सकती है।
महिलाओं के साथ असमानता भी आई सामने
रिपोर्ट में एक और गंभीर तथ्य सामने आया है। बीमारी और अंग प्रत्यारोपण की जरूरत महिलाओं और पुरुषों में लगभग बराबर है, लेकिन प्रत्यारोपण कराने वालों में महिलाओं की संख्या काफी कम है।
आंकड़ों के अनुसार—
कुल किडनी ट्रांसप्लांट में महिलाओं की हिस्सेदारी 36.8 प्रतिशत रही।
लिवर ट्रांसप्लांट में महिलाओं का प्रतिशत 30.4 रहा।
हार्ट ट्रांसप्लांट में महिलाओं की संख्या केवल 23.5 प्रतिशत रही।
दिलचस्प बात यह है कि अंगदान करने वालों में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक पाई गई। यानी महिलाएं दान तो अधिक कर रही हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्हें प्रत्यारोपण कम मिल पा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक कारणों के चलते कई बार महिलाओं का इलाज प्राथमिकता में नहीं रखा जाता, जिससे यह असमानता देखने को मिलती है।
क्यों बढ़ रही है अंग प्रत्यारोपण की जरूरत?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार कई कारण इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं—
मधुमेह और हाई ब्लड प्रेशर के बढ़ते मामले।
मोटापा और शारीरिक गतिविधियों में कमी।
शराब और तंबाकू का सेवन।
प्रदूषण और अस्वास्थ्यकर भोजन।
फैटी लिवर जैसी जीवनशैली संबंधी बीमारियां।
समय पर जांच और उपचार न कराना।
इन कारणों से किडनी, लिवर और हार्ट फेल होने के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है।
क्या है समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए कई स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है।
सबसे पहले लोगों में अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी ताकि ब्रेन-डेड मरीजों के अंग अधिक संख्या में दान किए जा सकें। इसके अलावा छोटे शहरों में ट्रांसप्लांट सेंटर विकसित करने, डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्टाफ की संख्या बढ़ाने, राष्ट्रीय स्तर पर अंग आवंटन प्रणाली को और मजबूत बनाने तथा गरीब मरीजों के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की जरूरत है।
भारत स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहा है और अंग प्रत्यारोपण के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो चुका है। इसके बावजूद लाखों मरीज हर वर्ष केवल इसलिए नया जीवन नहीं पा रहे क्योंकि जरूरत के अनुसार अंग उपलब्ध नहीं हो पाते।
द लैंसेट की यह रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में अंग प्रत्यारोपण की मांग और तेजी से बढ़ेगी। यदि समय रहते अंगदान को जनआंदोलन नहीं बनाया गया और ट्रांसप्लांट सुविधाओं का विस्तार नहीं हुआ, तो लाखों मरीजों के लिए जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी और भी कठिन हो सकती है। भारत के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती केवल चिकित्सा तकनीक विकसित करना नहीं, बल्कि हर जरूरतमंद मरीज तक समय पर अंग प्रत्यारोपण की सुविधा पहुंचाना है।

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