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800 मीटर की दूरी... वैज्ञानिकों ने कहा था 'मत जाओ', लेकिन जापान ने उठाया सबसे बड़ा जोखिम, अब सामने आईं हैरान कर देने वाली तस्वीरें

 


अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में जापान ने एक बार फिर ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। जापान की अंतरिक्ष एजेंसी JAXA (Japan Aerospace Exploration Agency) के हायाबुसा2 (Hayabusa2) स्पेसक्राफ्ट ने पृथ्वी के निकट स्थित 'टोरिफ्यून' (Torifune) नामक एस्टेरॉयड के बेहद करीब से सफलतापूर्वक उड़ान भरकर महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी जुटाई है।

इस मिशन की सबसे खास बात यह रही कि कई वैज्ञानिकों ने इसे अत्यधिक जोखिम भरा बताया था। इसके बावजूद JAXA की टीम ने महीनों तक चली तकनीकी चर्चा और विस्तृत योजना के बाद मिशन को मंजूरी दी। अब इस उड़ान से प्राप्त तस्वीरों और वैज्ञानिक आंकड़ों ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल दी हैं।

5 जुलाई को हुई ऐतिहासिक फ्लाईबाई

जानकारी के अनुसार, 5 जुलाई को हायाबुसा2 ने टोरिफ्यून एस्टेरॉयड के बेहद करीब से उड़ान भरी। अगले दिन यानी 6 जुलाई को जब स्पेसक्राफ्ट से भेजी गई तस्वीरें वैज्ञानिकों तक पहुंचीं, तो उन्हें कई अप्रत्याशित जानकारियां मिलीं।

हायाबुसा2 मिशन के पूर्व प्रबंधक मकोटो योशिकावा और उनकी टीम ने बताया कि उन्हें सबसे बड़ा आश्चर्य इस बात का हुआ कि टोरिफ्यून एक साधारण एस्टेरॉयड नहीं बल्कि 'कॉन्टैक्ट बाइनरी' (Contact Binary) है।

क्या होता है कॉन्टैक्ट बाइनरी एस्टेरॉयड?

कॉन्टैक्ट बाइनरी ऐसे एस्टेरॉयड को कहा जाता है, जिसमें दो अलग-अलग चट्टानी पिंड गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से आपस में जुड़ जाते हैं और एक संयुक्त संरचना का निर्माण करते हैं।

टोरिफ्यून की तस्वीरों में यह दोहरा आकार स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। वैज्ञानिकों के अनुसार, उन्होंने पहले ऐसी संरचना की उम्मीद नहीं की थी।

योशिकावा ने पोलैंड में आयोजित 'Asteroids, Comets and Meteors' सम्मेलन में कहा कि टीम को न केवल एस्टेरॉयड की संरचना ने चौंकाया, बल्कि प्राप्त तस्वीरों की गुणवत्ता और आकार भी उनकी अपेक्षा से कहीं बेहतर था।

महीनों तक चली बहस के बाद लिया गया फैसला

इस मिशन की सफलता के पीछे कई महीनों तक वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के बीच गहन चर्चा हुई।

हायाबुसा2 स्पेसक्राफ्ट को मूल रूप से किसी एस्टेरॉयड के पास जाकर वहां उतरने और नमूने एकत्र करने के लिए तैयार किया गया था। लेकिन इस बार उसे लगभग 5.3 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से उड़ते हुए एस्टेरॉयड के बेहद करीब से गुजरना था।

इंजीनियरों को चिंता थी कि इतनी तेज गति और कम दूरी मिशन के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

100 किलोमीटर नहीं, सिर्फ 800 मीटर की दूरी

सामान्यतः किसी एस्टेरॉयड के पास से गुजरते समय अंतरिक्ष यान लगभग 100 किलोमीटर या उससे अधिक की दूरी बनाए रखते हैं।

शुरुआत में इस मिशन के लिए भी लगभग 10 किलोमीटर की दूरी प्रस्तावित की गई थी।

बाद में वैज्ञानिकों ने बेहतर तस्वीरें प्राप्त करने के लिए दूरी कम करने का सुझाव दिया।

पहले इसे 1 किलोमीटर तक लाया गया और अंततः उड़ान से लगभग एक महीने पहले इसे घटाकर केवल 800 मीटर कर दिया गया।

यही फैसला सबसे अधिक विवादित रहा।

क्यों था इतना जोखिम?

वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि टोरिफ्यून का वास्तविक आकार पूरी तरह ज्ञात नहीं था।

धरती से किए गए अवलोकनों के आधार पर अनुमान लगाया गया था कि इसकी लंबाई लगभग 1400 मीटर तक हो सकती है, जबकि चौड़ाई करीब 400 मीटर हो सकती थी।

यदि वास्तविक आकार अनुमान से अलग होता, तो स्पेसक्राफ्ट के लिए टकराव का खतरा भी पैदा हो सकता था।

इसी कारण कुछ वैज्ञानिकों ने अंतिम समय तक 800 मीटर की दूरी का विरोध किया।

ऑटोमैटिक मोड में पूरा हुआ मिशन

रिपोर्ट के अनुसार, 19 जून को हायाबुसा2 ने टोरिफ्यून को सफलतापूर्वक खोज लिया था।

फ्लाईबाई से लगभग तीन घंटे पहले तक मिशन कंट्रोल सेंटर से स्पेसक्राफ्ट को नियंत्रित किया गया।

इसके बाद उसे पूरी तरह ऑटोमैटिक मोड में भेज दिया गया ताकि तय समय पर सभी वैज्ञानिक उपकरण स्वतः कार्य कर सकें।

इस मिशन के लिए विशेष सॉफ्टवेयर भी विकसित किया गया था।

कैमरों ने भेजीं अद्भुत तस्वीरें

हायाबुसा2 के ऑप्टिकल नेविगेशन कैमरा टेलीस्कोप द्वारा ली गई तस्वीरों में टोरिफ्यून का दोहरा आकार स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।

इसके अलावा मिशन में लगे अन्य वैज्ञानिक उपकरणों ने भी महत्वपूर्ण आंकड़े जुटाए।

इनमें शामिल हैं—

  • थर्मल इन्फ्रारेड इमेजर – जिसने एस्टेरॉयड की सतह के तापमान का अध्ययन किया।

  • इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर – जिसने सतह की संरचना का विश्लेषण किया।

  • लेजर अल्टीमीटर – जिसने एस्टेरॉयड से दूरी मापने का कार्य किया।

योशिकावा के अनुसार, संभवतः यह पहली बार है जब किसी एस्टेरॉयड फ्लाईबाई के दौरान लेजर तकनीक से इतनी सफल दूरी मापी गई।

हायाबुसा2 का शानदार रिकॉर्ड

हायाबुसा2 को दिसंबर 2014 में लॉन्च किया गया था।

चार वर्षों की यात्रा के बाद यह रियूगू (Ryugu) नामक एस्टेरॉयड तक पहुंचा।

वहां से इसने चट्टानों और धूल के नमूने एकत्र किए और वर्ष 2020 में उन्हें सुरक्षित पृथ्वी तक पहुंचाया।

यह मिशन अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में सबसे सफल एस्टेरॉयड सैंपल रिटर्न मिशनों में गिना जाता है।

अब अगला लक्ष्य 1998 KY26

रियूगू मिशन पूरा करने के बाद भी हायाबुसा2 की यात्रा समाप्त नहीं हुई।

अब इसका अगला लक्ष्य 1998 KY26 नामक एक अत्यंत छोटा एस्टेरॉयड है।

इस एस्टेरॉयड का आकार केवल लगभग 11 मीटर है और यह बहुत तेज गति से घूमता है।

JAXA की योजना के अनुसार हायाबुसा2 वर्ष 2031 तक वहां पहुंचेगा।

धरती की सुरक्षा में भी मिलेगी मदद

JAXA के वैज्ञानिकों का कहना है कि टोरिफ्यून फ्लाईबाई केवल तस्वीरें लेने का प्रयोग नहीं था।

इस मिशन के जरिए एजेंसी ने छोटे खगोलीय पिंडों के अत्यंत करीब जाकर सुरक्षित संचालन की तकनीक विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यदि कोई खतरनाक एस्टेरॉयड पृथ्वी की ओर बढ़ता है, तो ऐसी तकनीक Planetary Defense मिशनों में उपयोगी साबित हो सकती है।

इसकी तुलना नासा के DART (Double Asteroid Redirection Test) मिशन से भी की जा रही है, जिसने एस्टेरॉयड की दिशा बदलने की तकनीक का सफल परीक्षण किया था।

अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए बड़ी उपलब्धि

वैज्ञानिकों का मानना है कि टोरिफ्यून से प्राप्त नई तस्वीरें और आंकड़े एस्टेरॉयड के निर्माण, विकास और उनकी आंतरिक संरचना को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

साथ ही यह मिशन भविष्य के उन अभियानों की नींव भी मजबूत करेगा, जिनका उद्देश्य पृथ्वी को संभावित अंतरिक्षीय खतरों से सुरक्षित रखना है।

JAXA का हायाबुसा2 मिशन एक बार फिर साबित करता है कि अंतरिक्ष अनुसंधान केवल नई खोजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य में मानवता की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। टोरिफ्यून एस्टेरॉयड के केवल 800 मीटर की दूरी से सफल फ्लाईबाई कर जापान ने अंतरिक्ष विज्ञान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इस मिशन से मिले वैज्ञानिक आंकड़े न केवल एस्टेरॉयड के रहस्यों को समझने में मदद करेंगे, बल्कि भविष्य के प्लैनेटरी डिफेंस मिशनों के लिए भी नई दिशा प्रदान कर सकते हैं।

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