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कभी थे ईरान के सबसे बड़े राष्ट्रवादी, अब मोसाद से रिश्तों का दावा! महमूद अहमदीनेजाद पर रिपोर्ट से मचा भूचाल

 


ईरान की राजनीति में एक समय ऐसा था जब महमूद अहमदीनेजाद का नाम राष्ट्रवाद, परमाणु कार्यक्रम और पश्चिमी देशों के खिलाफ आक्रामक तेवरों का पर्याय माना जाता था। अमेरिका और इजरायल के खिलाफ उनके तीखे बयानों ने उन्हें दुनिया भर में चर्चा का विषय बना दिया था। लेकिन अब एक नई रिपोर्ट ने ऐसी सनसनी फैला दी है, जिसने ईरान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

एक अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद कथित तौर पर इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के संपर्क में थे और ईरान में सत्ता परिवर्तन की योजना का हिस्सा बन गए थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि यह योजना सफल हो जाती तो ईरान की राजनीति पूरी तरह बदल सकती थी।

हालांकि, इन दावों की किसी स्वतंत्र या आधिकारिक एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है। न तो ईरानी सरकार, न इजरायल और न ही महमूद अहमदीनेजाद की ओर से इन आरोपों को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि सामने आई है। इसलिए इन दावों को फिलहाल केवल रिपोर्ट में किए गए दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

कौन हैं महमूद अहमदीनेजाद?

महमूद अहमदीनेजाद वर्ष 2005 से 2013 तक लगातार दो कार्यकाल के लिए ईरान के राष्ट्रपति रहे। उनके शासनकाल में ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने तेजी से प्रगति की। उन्होंने यूरेनियम संवर्धन (यूरेनियम एनरिचमेंट) को आगे बढ़ाया और पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद अपने रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई।

उनके भाषण अक्सर अमेरिका, इजरायल और पश्चिमी देशों की आलोचना से भरे होते थे। यही कारण था कि ईरान के कट्टरपंथी वर्ग में उनकी लोकप्रियता काफी अधिक थी।

खामेनेई के सबसे करीबी नेताओं में थी गिनती

जब अहमदीनेजाद ने 2005 में पहली बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा, तब ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई का उन्हें खुला समर्थन मिला था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस समर्थन ने उनकी जीत में बड़ी भूमिका निभाई।

राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों नेताओं के बीच लंबे समय तक अच्छे संबंध बने रहे। लेकिन समय के साथ दोनों के बीच मतभेद सामने आने लगे।

कब शुरू हुई दोनों नेताओं की दूरी?

रिपोर्टों के अनुसार, राष्ट्रपति पद के दूसरे कार्यकाल के दौरान अहमदीनेजाद और खामेनेई के बीच कई नीतिगत मुद्दों पर असहमति बढ़ने लगी।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 2016 में खामेनेई ने सार्वजनिक रूप से अहमदीनेजाद को 2017 का राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ने की सलाह दी। उनका कहना था कि उनकी उम्मीदवारी देश में राजनीतिक विभाजन पैदा कर सकती है।

लेकिन अहमदीनेजाद ने इस सलाह को नहीं माना और चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाखिल कर दिया। हालांकि, ईरान की गार्जियन काउंसिल ने उनका नामांकन खारिज कर दिया।

इसके बाद भी 2021 और फिर बाद के चुनावों में उनकी उम्मीदवारी स्वीकार नहीं की गई। लगातार चुनावी प्रक्रिया से बाहर किए जाने के बाद उनका राजनीतिक भविष्य लगभग समाप्त माना जाने लगा।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में क्या दावा?

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनावी राजनीति से लगातार बाहर किए जाने के बाद अहमदीनेजाद कथित रूप से विदेशी ताकतों के संपर्क में आए।

दावे के अनुसार, उन्होंने इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के साथ गुप्त संपर्क स्थापित किए और ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावित योजना पर बातचीत हुई।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन संपर्कों के लिए कथित तौर पर "ट्रैक-टू डिप्लोमेसी" का इस्तेमाल किया गया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की आड़ में मुलाकातें आयोजित की गईं।

हालांकि, इन दावों के समर्थन में कोई सार्वजनिक दस्तावेज, आधिकारिक जांच रिपोर्ट या स्वतंत्र प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है।

कथित गुप्त मुलाकातों का दावा

रिपोर्ट के मुताबिक, पहली कथित मुलाकात वर्ष 2023 में ग्वाटेमाला में एक पर्यावरण सम्मेलन के दौरान हुई।

इसके बाद 2024 में हंगरी की लूडोवीका यूनिवर्सिटी में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के दौरान दूसरी कथित बैठक हुई।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस दौरान अहमदीनेजाद की मुलाकात मोसाद प्रमुख डेविड बर्निया से कराई गई।

इसके अलावा यह भी आरोप लगाया गया कि उनकी विदेश यात्राओं का खर्च भी कथित रूप से मोसाद ने उठाया।

लेकिन इन सभी दावों की किसी आधिकारिक संस्था ने पुष्टि नहीं की है और न ही इनके समर्थन में सार्वजनिक सबूत उपलब्ध कराए गए हैं।

क्या बदली अहमदीनेजाद की राजनीतिक भाषा?

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि 2021 के बाद अहमदीनेजाद की सार्वजनिक छवि में बड़ा बदलाव देखने को मिला।

जहां पहले वे लगातार इजरायल के खिलाफ बेहद आक्रामक बयान देते थे, वहीं बाद के वर्षों में उन्होंने इस विषय पर बोलना काफी कम कर दिया।

बताया गया कि उनका मुख्य राजनीतिक निशाना गार्जियन काउंसिल और ईरान की चुनावी व्यवस्था बन गई।

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी नेता के सार्वजनिक बयानों में बदलाव अपने आप में किसी विदेशी एजेंसी से संबंधों का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

कथित तख्तापलट की योजना

रिपोर्ट में दावा किया गया कि यदि ईरान में सत्ता परिवर्तन सफल हो जाता तो अहमदीनेजाद दोबारा सत्ता में लौट सकते थे।

दावे के अनुसार, नई सरकार बनने के बाद ईरान और इजरायल के रिश्तों में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिलता।

रिपोर्ट में यहां तक कहा गया कि ईरान इजरायल को औपचारिक मान्यता दे सकता था और अब्राहम अकॉर्ड जैसे समझौतों का हिस्सा भी बन सकता था।

लेकिन यह पूरा परिदृश्य केवल रिपोर्ट में किए गए दावों पर आधारित है। इसकी किसी स्वतंत्र स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है।

योजना विफल होने की वजह क्या बताई गई?

रिपोर्ट में दावा किया गया कि कथित योजना दो प्रमुख कारणों से सफल नहीं हो सकी।

पहला कारण यह बताया गया कि ईरानी जनता ने अपेक्षा के विपरीत सरकार के खिलाफ विद्रोह नहीं किया। बल्कि बाहरी दबाव के समय बड़ी संख्या में लोग सरकार के समर्थन में खड़े हो गए।

दूसरा कारण पश्चिमी ईरान में कथित समन्वित कार्रवाई के विफल रहने को बताया गया, जिससे पूरी रणनीति कमजोर पड़ गई।

इन दावों की भी किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी या आधिकारिक दस्तावेज से पुष्टि नहीं हुई है।

नजरबंदी का भी दावा

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कथित घटनाओं के बाद ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने अहमदीनेजाद को नजरबंद कर दिया।

हालांकि, इस संबंध में भी ईरानी अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

रिपोर्ट पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि खुफिया एजेंसियों से जुड़े दावे अक्सर अत्यधिक संवेदनशील होते हैं और इनके बारे में बिना ठोस सबूत के निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जाता।

यदि किसी मीडिया रिपोर्ट में ऐसे गंभीर आरोप लगाए जाते हैं तो उनकी पुष्टि स्वतंत्र जांच, आधिकारिक दस्तावेजों या संबंधित पक्षों के बयान से होना आवश्यक होता है।

फिलहाल इस मामले में ऐसी कोई पुष्टि सामने नहीं आई है।

महमूद अहमदीनेजाद कभी ईरान के सबसे प्रभावशाली और राष्ट्रवादी नेताओं में गिने जाते थे। उनके नाम पर आज भी ईरान की राजनीति में बहस होती है। अब उनके बारे में सामने आए इन सनसनीखेज दावों ने नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि मोसाद से कथित संबंध, सत्ता परिवर्तन की योजना, गुप्त बैठकों और नजरबंदी जैसे सभी आरोप फिलहाल केवल मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों की ओर से भी इन आरोपों को प्रमाणित करने वाला कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

ऐसे में इन दावों को स्थापित तथ्य के बजाय अप्रमाणित मीडिया दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए, जब तक कि इनके समर्थन में विश्वसनीय और आधिकारिक साक्ष्य उपलब्ध न हो जाएं।

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