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दिल्ली में NHM डॉक्टरों की हड़ताल: वेतन, सातवें वेतन आयोग और सेवा सुरक्षा की मांग को लेकर डॉक्टरों का प्रदर्शन, स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल

 


नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत कार्यरत डॉक्टरों ने अपनी लंबित मांगों को लेकर एक दिन की सांकेतिक हड़ताल कर सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। डॉक्टरों का कहना है कि वर्षों से वे समान कार्य करने के बावजूद नियमित सरकारी डॉक्टरों जैसी सुविधाओं से वंचित हैं। उनकी प्रमुख मांगों में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करना, वेतन में संशोधन, सेवा सुरक्षा, कर्मचारी कल्याण योजनाओं का विस्तार और कार्य परिस्थितियों में सुधार शामिल हैं।

इस सांकेतिक हड़ताल ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत कार्यरत हजारों डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यस्थितियों को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। हालांकि आवश्यक और आपातकालीन सेवाओं को प्रभावित न करने का प्रयास किया गया, लेकिन डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि यदि उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो भविष्य में आंदोलन और व्यापक हो सकता है। 

क्यों हड़ताल पर उतरे NHM डॉक्टर?

प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि वे वर्षों से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत अनुबंध (Contract) पर कार्य कर रहे हैं।

कोविड-19 महामारी के दौरान भी इन डॉक्टरों ने अग्रिम पंक्ति में रहकर सेवाएं दीं। महामारी के कठिन दौर में अस्पतालों, कोविड केंद्रों और टीकाकरण अभियानों में NHM डॉक्टरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

इसके बावजूद उनका कहना है कि आज भी उन्हें वेतन, भत्तों, नौकरी की सुरक्षा और अन्य सुविधाओं के मामले में नियमित सरकारी कर्मचारियों के बराबर अधिकार नहीं मिले हैं।

सातवें वेतन आयोग को लागू करने की मांग

हड़ताल का सबसे बड़ा मुद्दा सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करना है।

डॉक्टरों का कहना है कि केंद्र और विभिन्न राज्यों में कई सरकारी कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग का लाभ मिल चुका है, लेकिन राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत कार्यरत डॉक्टर अब भी पुराने वेतनमान पर काम करने को मजबूर हैं।

उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई, कार्यभार और जिम्मेदारियों के बीच वर्तमान वेतन पर्याप्त नहीं है।

डॉक्टरों का तर्क है कि यदि समान कार्य किया जा रहा है तो समान वेतन और सुविधाएं भी मिलनी चाहिए।

वेतन संशोधन और कर्मचारी कल्याण की मांग

सिर्फ वेतन आयोग ही नहीं, डॉक्टरों ने कर्मचारी कल्याण से जुड़े कई अन्य मुद्दे भी उठाए हैं।

इनमें प्रमुख हैं—

  • वेतन में नियमित संशोधन।

  • समय पर वेतन भुगतान।

  • चिकित्सा बीमा सुविधाएं।

  • सेवा सुरक्षा।

  • भविष्य निधि एवं अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाएं।

  • अनुबंध कर्मचारियों के लिए स्पष्ट सेवा नीति।

डॉक्टरों का कहना है कि इन मांगों को लंबे समय से संबंधित विभागों के समक्ष रखा जा रहा है, लेकिन अभी तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है।

मरीजों पर कितना पड़ा असर?

डॉक्टरों ने हड़ताल को केवल सांकेतिक रखने का निर्णय लिया ताकि आम मरीजों को न्यूनतम असुविधा हो।

आपातकालीन सेवाएं और आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं जारी रखने का प्रयास किया गया।

हालांकि कुछ स्थानों पर ओपीडी सेवाओं और सामान्य परामर्श में आंशिक असर देखने को मिला।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में आंदोलन लंबा चलता है तो इसका असर स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक व्यापक हो सकता है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन क्या है?

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) भारत सरकार की प्रमुख स्वास्थ्य योजनाओं में से एक है।

इसका उद्देश्य ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुधारना, टीकाकरण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करना है।

देशभर में लाखों स्वास्थ्यकर्मी और हजारों डॉक्टर इस मिशन के अंतर्गत कार्यरत हैं।

इनमें से बड़ी संख्या अनुबंध आधारित नियुक्तियों पर कार्य करती है।

कोविड काल में निभाई थी अहम भूमिका

कोविड-19 महामारी के दौरान NHM डॉक्टरों ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।

उन्होंने—

  • कोविड मरीजों का इलाज किया।

  • टीकाकरण अभियान में भाग लिया।

  • ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाईं।

  • जांच और निगरानी कार्य किए।

  • स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाए।

डॉक्टरों का कहना है कि महामारी के समय उनकी सेवाओं की सराहना तो हुई, लेकिन उसके बाद उनकी कार्य स्थितियों में अपेक्षित सुधार नहीं किया गया।

सेवा सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा

हड़ताल कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि अनुबंध आधारित नियुक्तियों के कारण उनमें भविष्य को लेकर असुरक्षा बनी रहती है।

उनका कहना है कि नियमित सेवा नीति न होने के कारण हर कुछ समय बाद अनुबंध नवीनीकरण की चिंता बनी रहती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्वास्थ्यकर्मियों को स्थिर कार्य वातावरण मिले तो वे अधिक प्रभावी ढंग से सेवाएं दे सकते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

स्वास्थ्य नीति से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में NHM डॉक्टरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

विशेष रूप से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, शहरी स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं में इनकी बड़ी जिम्मेदारी होती है।

यदि उनकी समस्याओं का समय पर समाधान किया जाए तो स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में भी सुधार हो सकता है।

सरकार और डॉक्टरों के बीच संवाद की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार के मामलों में संवाद सबसे प्रभावी समाधान होता है।

यदि सरकार और डॉक्टरों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर मांगों पर चर्चा करें तो किसी सकारात्मक समाधान तक पहुंचा जा सकता है।

स्वास्थ्य सेवाओं जैसी संवेदनशील व्यवस्था में लंबे समय तक गतिरोध किसी भी पक्ष के हित में नहीं माना जाता।

डॉक्टरों ने क्या चेतावनी दी?

प्रदर्शनकारी डॉक्टरों का कहना है कि यदि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो भविष्य में आंदोलन का स्वरूप व्यापक हो सकता है।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य मरीजों को परेशान करना नहीं बल्कि सरकार तक अपनी समस्याएं पहुंचाना है।

इसलिए फिलहाल केवल सांकेतिक हड़ताल की गई है।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर व्यापक असर की आशंका

यदि इस प्रकार के आंदोलन लंबे समय तक चलते हैं तो—

  • ओपीडी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

  • ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर दबाव बढ़ सकता है।

  • मरीजों की प्रतीक्षा अवधि बढ़ सकती है।

  • नियमित स्वास्थ्य कार्यक्रम प्रभावित हो सकते हैं।

इसी कारण स्वास्थ्य विशेषज्ञ समय रहते समाधान निकालने की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।

दिल्ली में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत कार्यरत डॉक्टरों द्वारा की गई एक दिन की सांकेतिक हड़ताल ने एक बार फिर अनुबंध आधारित स्वास्थ्यकर्मियों की समस्याओं को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने, वेतन संशोधन, कर्मचारी कल्याण और सेवा सुरक्षा जैसी मांगों को लेकर डॉक्टरों ने सरकार से शीघ्र समाधान की अपील की है। 

फिलहाल यह आंदोलन सांकेतिक रहा और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं को जारी रखने का प्रयास किया गया, लेकिन यदि लंबित मांगों पर समय रहते सकारात्मक पहल नहीं होती, तो आने वाले समय में आंदोलन और व्यापक हो सकता है। ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतरता बनाए रखने और डॉक्टरों की समस्याओं का समाधान निकालने के लिए सरकार और चिकित्सकों के बीच प्रभावी संवाद बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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