90 मिनट तक बरसीं मिसाइलें! ईरान के रणनीतिक द्वीप पर अमेरिका का भीषण हमला, खाड़ी में युद्ध ने पकड़ी खतरनाक रफ्तार
अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष अब लगातार अधिक गंभीर और खतरनाक होता जा रहा है। दोनों देशों के बीच चौथे दिन भी हमलों का सिलसिला जारी रहा और बुधवार को हालात तब और तनावपूर्ण हो गए, जब अमेरिकी सेना ने फारस की खाड़ी में स्थित ईरान के रणनीतिक ग्रेटर टुनब (Greater Tunb) द्वीप पर लगभग 90 मिनट तक लगातार मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार यह कार्रवाई ईरान की तटीय रक्षा प्रणाली, क्रूज़ मिसाइल भंडारण केंद्रों और लॉन्च साइटों को निशाना बनाकर की गई। अमेरिका का दावा है कि इस अभियान का उद्देश्य ईरान की उस सैन्य क्षमता को कमजोर करना था, जिसके जरिए वह होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा पैदा कर रहा था।
दूसरी ओर ईरान ने इन हमलों की कड़ी निंदा करते हुए जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। इससे पूरे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है तथा वैश्विक समुदाय की चिंता भी गहरा गई है।
90 मिनट तक चला सैन्य अभियान
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि वॉशिंगटन समयानुसार सुबह 7:30 बजे शुरू हुए इस अभियान के दौरान अमेरिकी सेना ने अत्याधुनिक सटीक हथियारों का इस्तेमाल किया।
CENTCOM के अनुसार, ग्रेटर टुनब द्वीप पर मौजूद तटीय रक्षा प्रतिष्ठानों, क्रूज़ मिसाइल स्टोरेज सुविधाओं और लॉन्चिंग पॉइंट्स पर लगातार हमले किए गए। अमेरिका का दावा है कि इस अभियान से ईरान की समुद्री हमले करने की क्षमता को बड़ा झटका लगा है।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना इस कार्रवाई का प्रमुख उद्देश्य था।
क्या है ग्रेटर टुनब और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
ग्रेटर टुनब फारस की खाड़ी में स्थित एक छोटा लेकिन अत्यंत रणनीतिक द्वीप है। इसका क्षेत्रफल लगभग 10.3 वर्ग किलोमीटर है।
यह द्वीप होर्मुज़ जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार के बेहद करीब स्थित है। यही कारण है कि इसे दुनिया के सबसे संवेदनशील सामरिक क्षेत्रों में गिना जाता है।
ग्रेटर टुनब के साथ लेसर टुनब और अबू मूसा द्वीप भी लंबे समय से क्षेत्रीय विवाद का हिस्सा रहे हैं। इन द्वीपों पर ईरान का प्रशासनिक नियंत्रण है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भी इन पर अपना दावा करता रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस द्वीप से पूरे होर्मुज़ समुद्री मार्ग पर नजर रखना आसान होता है। यही कारण है कि इसकी सामरिक अहमियत सामान्य द्वीपों की तुलना में कहीं अधिक मानी जाती है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य क्यों है दुनिया के लिए अहम?
होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है।
दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचती है। खाड़ी देशों से एशिया, यूरोप और अन्य क्षेत्रों में जाने वाले ऊर्जा संसाधनों का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है।
यदि इस क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही बाधित होती है तो वैश्विक तेल बाजार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
इसी कारण अमेरिका और उसके सहयोगी लंबे समय से इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता बताते रहे हैं।
अमेरिका ने क्यों किया हमला?
अमेरिकी सेंट्रल कमांड का कहना है कि हाल के दिनों में ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कई वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार इन घटनाओं में कई जहाज क्षतिग्रस्त हुए तथा चालक दल के सदस्य हताहत या लापता हुए।
CENTCOM प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर के मुताबिक पिछले सात दिनों में सात वाणिज्यिक जहाजों पर हमले हुए, जिनमें कई नागरिक प्रभावित हुए।
अमेरिका का दावा है कि ग्रेटर टुनब द्वीप से ईरान समुद्री गतिविधियों की निगरानी करता है और आवश्यकता पड़ने पर मिसाइल एवं ड्रोन हमलों का संचालन भी करता है। इसी क्षमता को कमजोर करने के लिए यह सैन्य कार्रवाई की गई।
ट्रंप ने बदली रणनीति
इस सैन्य कार्रवाई से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया।
उन्होंने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों पर 20 प्रतिशत रीइंबर्समेंट फीस लगाने के प्रस्ताव को वापस लेने की घोषणा की।
ट्रंप ने कहा कि खाड़ी देशों के नेताओं ने अमेरिका में अरबों डॉलर के निवेश का प्रस्ताव दिया, जिसके बाद उन्होंने यह योजना वापस लेने का निर्णय लिया।
हालांकि, अमेरिकी प्रशासन अब भी ईरानी बंदरगाहों पर दबाव बढ़ाने और समुद्री गतिविधियों को सीमित करने की रणनीति पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रेटर टुनब पर हमला इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
ईरान ने जवाब देने की दी चेतावनी
अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
ईरान के सरकारी टेलीविजन के अनुसार रातभर चले हमलों में 388वीं मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री ब्रिगेड के कम से कम सात सैनिकों की मौत हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक यह सैन्य इकाई दक्षिण-पूर्वी सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत के बामपुर क्षेत्र में तैनात थी।
सरकारी मीडिया का कहना है कि अमेरिकी सेना ने इस अभियान के दौरान कम से कम 13 मिसाइलें दागीं।
मृतकों में अनिवार्य सैन्य सेवा कर रहे जवानों के साथ स्थायी सैन्यकर्मी भी शामिल बताए गए हैं, जबकि कई अन्य सैनिक घायल हुए हैं।
ईरानी सेना ने बयान जारी कर कहा है कि वह इस हमले का "उचित और निर्णायक जवाब" देगी।
क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई इसी तरह जारी रहती है तो पूरा पश्चिम एशिया गंभीर अस्थिरता की ओर बढ़ सकता है।
फारस की खाड़ी में पहले से ही कई देशों की नौसेनाएं सक्रिय हैं। ऐसे में किसी भी बड़े सैन्य टकराव का प्रभाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि क्षेत्र के अन्य देशों पर भी पड़ सकता है।
संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, बहरीन और ओमान जैसे देशों की सुरक्षा तथा ऊर्जा निर्यात भी इस तनाव से प्रभावित हो सकते हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में अस्थिरता बढ़ती है तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ सकता है।
दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं। इसलिए इस समुद्री मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
इसके अलावा समुद्री बीमा, माल ढुलाई लागत और वैश्विक सप्लाई चेन पर भी दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
दुनिया की नजर अगले कदम पर
अमेरिका का कहना है कि उसकी कार्रवाई केवल समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने और ईरान की सैन्य क्षमताओं को सीमित करने के उद्देश्य से की गई है। वहीं ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताते हुए जवाबी कार्रवाई की तैयारी की बात कह रहा है।
इस बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब दोनों देशों के अगले कदम पर टिकी हुई है। यदि तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं हुए, तो यह संघर्ष पूरे क्षेत्र में व्यापक अस्थिरता पैदा कर सकता है।
फिलहाल ग्रेटर टुनब द्वीप पर हुए अमेरिकी हमले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका-ईरान के बीच चल रहा टकराव अब केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक सैन्य ठिकानों और समुद्री सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर भू-राजनीतिक संघर्ष बन चुका है। आने वाले दिनों में इस संघर्ष की दिशा पूरे पश्चिम एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

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