111 दिन तक भूखे रहे, पानी भी छोड़ दिया... कौन थे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल? जिनका संघर्ष आज फिर चर्चा में
नई दिल्ली: लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के जंतर-मंतर पर चल रहे अनशन के बीच एक बार फिर देश में पर्यावरण संरक्षण और जन आंदोलनों को लेकर बहस तेज हो गई है। इसी क्रम में सोशल मीडिया पर पर्यावरणविद् प्रोफेसर जीडी अग्रवाल, जिन्हें संन्यास लेने के बाद स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के नाम से जाना गया, की चर्चा फिर शुरू हो गई है। गंगा संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले प्रोफेसर अग्रवाल ने कई बार आमरण अनशन किया और वर्ष 2018 में 111 दिनों तक चले अनशन के दौरान उनका निधन हो गया।
उनके समर्थक उन्हें एक ऐसे वैज्ञानिक के रूप में याद करते हैं, जिन्होंने प्रयोगशाला और विश्वविद्यालय की सीमाओं से निकलकर पर्यावरण संरक्षण को जन आंदोलन का स्वरूप दिया। वहीं, गंगा को अविरल और निर्मल बनाए रखने के लिए किए गए उनके संघर्ष को आज भी देश के सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय आंदोलनों में गिना जाता है।
सोनम वांगचुक के अनशन के बीच फिर क्यों हो रही है चर्चा?
हाल के दिनों में लद्दाख से जुड़े मुद्दों और पर्यावरण संरक्षण को लेकर सोनम वांगचुक के अनशन ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने प्रोफेसर जीडी अग्रवाल के संघर्ष को याद करना शुरू कर दिया।
लोगों का कहना है कि जिस तरह वांगचुक पर्यावरण और स्थानीय समुदायों से जुड़े मुद्दों को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं, उसी तरह प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने भी गंगा संरक्षण के लिए अहिंसक और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाई थी।
हालांकि, दोनों आंदोलनों के उद्देश्य और परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन पर्यावरण संरक्षण को लेकर उनके समर्पण की तुलना की जा रही है।
इंजीनियरिंग से शुरू हुआ सफर
प्रोफेसर जीडी अग्रवाल का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुआ था।
उन्होंने तत्कालीन यूनिवर्सिटी ऑफ रुड़की (अब आईआईटी रुड़की) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।
अपने करियर की शुरुआत उन्होंने उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग में डिजाइन इंजीनियर के रूप में की।
बाद में पर्यावरण के प्रति गहरी रुचि के कारण वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले से पर्यावरण इंजीनियरिंग में पीएचडी प्राप्त की।
विदेश से लौटने के बाद उन्होंने आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर के रूप में कार्य किया और पर्यावरण इंजीनियरिंग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
देश के पहले प्रदूषण नियंत्रण तंत्र से जुड़े
पर्यावरण विज्ञान में उनकी विशेषज्ञता को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) का पहला सदस्य सचिव नियुक्त किया।
इस दौरान उन्होंने भारत में प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित नीतियों और पर्यावरणीय नियमन को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विशेषज्ञों के अनुसार, उस समय देश में पर्यावरण संरक्षण की संस्थागत व्यवस्था विकसित हो रही थी और प्रोफेसर अग्रवाल इस प्रक्रिया के प्रमुख विशेषज्ञों में शामिल थे।
IIT छोड़कर समाज सेवा का रास्ता चुना
करीब 17 वर्षों तक आईआईटी कानपुर में अध्यापन करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी।
उन्होंने अपने कुछ छात्रों के साथ मिलकर पर्यावरणीय तकनीकी समाधान उपलब्ध कराने के उद्देश्य से एक संस्था भी बनाई।
लेकिन धीरे-धीरे उनका पूरा ध्यान समाज सेवा और पर्यावरण संरक्षण की ओर केंद्रित हो गया।
उनका मानना था कि वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग केवल शोध पत्रों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका लाभ समाज को भी मिलना चाहिए।
संन्यास लेकर बने स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद
11 जून 2011 को गंगा दशहरा के अवसर पर उन्होंने संन्यास ग्रहण किया।
संन्यास के बाद उनका नया नाम स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद रखा गया।
इसके बाद उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन गंगा नदी के संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता के लिए समर्पित कर दिया।
उनके आंदोलन का केंद्र केवल धार्मिक आस्था नहीं था, बल्कि वैज्ञानिक आधार पर नदी संरक्षण की आवश्यकता भी थी।
गंगा बचाने के लिए कई बार किया अनशन
प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने वर्ष 2008 में पहली बार गंगा संरक्षण को लेकर अनशन शुरू किया।
उनका कहना था कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और पारिस्थितिक धरोहर है।
वे चाहते थे कि—
गंगा की प्राकृतिक धारा बनी रहे।
प्रदूषण रोका जाए।
अनियंत्रित निर्माण और खनन पर रोक लगे।
नदी के पर्यावरणीय प्रवाह (Environmental Flow) को सुरक्षित रखा जाए।
इन मांगों को लेकर उन्होंने कई बार सरकारों से संवाद भी किया।
जब सरकार ने रोकी जल विद्युत परियोजना
उनके आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता वर्ष 2010 में मानी जाती है।
भागीरथी नदी पर प्रस्तावित लोहारी नागपाला जल विद्युत परियोजना के विरोध में उन्होंने 38 दिनों तक अनशन किया।
इस आंदोलन के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस परियोजना को रोकने का निर्णय लिया।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार, यह भारत के सबसे प्रभावशाली पर्यावरणीय आंदोलनों में से एक था।
2018 का ऐतिहासिक 111 दिन का अनशन
22 जून 2018 को उन्होंने एक बार फिर आमरण अनशन शुरू किया।
इस बार उनकी चार प्रमुख मांगें थीं—
गंगा सुरक्षा अधिनियम लागू किया जाए।
गंगा पर निर्माणाधीन और प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगे।
गंगा में बालू खनन पूरी तरह बंद किया जाए।
गंगा संरक्षण के लिए स्वतंत्र और प्रभावी परिषद का गठन किया जाए।
उन्होंने इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई जिम्मेदार पदाधिकारियों को पत्र भी लिखे।
उनका कहना था कि यदि उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वे अपना अनशन जारी रखेंगे।
पानी भी छोड़ दिया
अनशन के दौरान उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया।
अक्टूबर 2018 में उन्होंने पानी पीना भी बंद कर दिया।
इसके बाद हरिद्वार प्रशासन ने उन्हें एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया।
डॉक्टरों के प्रयासों के बावजूद 11 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो गया।
उनकी मृत्यु के बाद देशभर में गंगा संरक्षण और पर्यावरण नीति को लेकर व्यापक चर्चा हुई।
गंगा संरक्षण पर क्या थी उनकी सोच?
प्रोफेसर जीडी अग्रवाल का मानना था कि किसी भी नदी का संरक्षण केवल सफाई अभियान तक सीमित नहीं होना चाहिए।
उनके अनुसार—
नदी का प्राकृतिक प्रवाह बना रहना चाहिए।
प्रदूषण के स्रोतों को नियंत्रित करना आवश्यक है।
अनियंत्रित बांध निर्माण और अत्यधिक खनन से बचना चाहिए।
वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर पर्यावरणीय निर्णय लिए जाने चाहिए।
उनका दृष्टिकोण धार्मिक आस्था और वैज्ञानिक सोच—दोनों का मिश्रण माना जाता है।
समर्थकों और आलोचकों की राय
समर्थकों का कहना है कि प्रोफेसर अग्रवाल ने पर्यावरण संरक्षण को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया।
वे मानते हैं कि उनकी वजह से गंगा संरक्षण का मुद्दा देशभर में गंभीरता से उठाया गया।
वहीं कुछ आलोचकों का कहना है कि उनकी सभी मांगों को व्यवहारिक रूप से लागू करना आसान नहीं था और विकास परियोजनाओं तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन भी आवश्यक है।
हालांकि इस बात पर व्यापक सहमति रही कि उन्होंने पर्यावरणीय मुद्दों पर सार्वजनिक चर्चा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज भी क्यों प्रासंगिक हैं जीडी अग्रवाल?
जलवायु परिवर्तन, नदियों के प्रदूषण, भूजल संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों के दौर में प्रोफेसर जीडी अग्रवाल का नाम आज भी बार-बार याद किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उन्होंने यह संदेश दिया कि विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, बशर्ते नीतियां वैज्ञानिक तथ्यों और दीर्घकालिक सोच पर आधारित हों।
सोनम वांगचुक के अनशन के बीच प्रोफेसर जीडी अग्रवाल का नाम एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बना है। पर्यावरण वैज्ञानिक, शिक्षक, नीति विशेषज्ञ और बाद में संन्यासी बने जीडी अग्रवाल ने गंगा संरक्षण के लिए लंबा संघर्ष किया और अपने जीवन के अंतिम दिनों तक उसी उद्देश्य के प्रति समर्पित रहे। उनकी मृत्यु ने पर्यावरण संरक्षण, नदी प्रबंधन और सतत विकास जैसे विषयों पर नई बहस को जन्म दिया।
आज भी उनके समर्थक उन्हें एक ऐसे वैज्ञानिक के रूप में याद करते हैं, जिन्होंने अपने ज्ञान और जीवन दोनों को प्रकृति संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया, जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि पर्यावरण से जुड़े जटिल मुद्दों का समाधान वैज्ञानिक शोध, सार्वजनिक संवाद और संतुलित नीतियों के माध्यम से ही संभव है।

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