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क्या BRICS सम्मेलन में होगा सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका? दुनिया की निगाहें अब सिर्फ भारत पर

 


नई दिल्ली इस साल सितंबर में एक ऐसे ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय आयोजन की मेजबानी करने जा रही है, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। भारत में आयोजित होने वाला BRICS शिखर सम्मेलन 2026 केवल एक नियमित बहुपक्षीय बैठक नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे वैश्विक राजनीति, आर्थिक सहयोग और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भविष्य की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मंच माना जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान सहित कई प्रमुख देशों के शीर्ष नेता शामिल हो सकते हैं। यदि यह कार्यक्रम तय कार्यक्रम के अनुसार होता है तो दुनिया के कई प्रभावशाली नेताओं का एक मंच पर आना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक माना जाएगा।

प्रधानमंत्री मोदी की अहम द्विपक्षीय बैठकों पर सबकी नजर

इस सम्मेलन की सबसे बड़ी खासियत केवल बहुपक्षीय चर्चा नहीं होगी, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच होने वाली संभावित द्विपक्षीय बैठकों को भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन बैठकों में सीमा विवाद, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और वैश्विक सुरक्षा जैसे कई अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हो सकती है।

भारत के लिए यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मौजूदा समय में दुनिया कई बड़े भू-राजनीतिक संकटों से गुजर रही है और ऐसे समय में नई दिल्ली वैश्विक संवाद का केंद्र बनने जा रही है।

पांच साल बाद भारत की मेजबानी

करीब पांच वर्षों के अंतराल के बाद भारत फिर से BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। इस बार सम्मेलन की थीम रखी गई है—

"लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण" (Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability)।

यह विषय केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है बल्कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में सदस्य देशों के बीच दीर्घकालिक सहयोग और स्थिरता को मजबूत करने पर भी केंद्रित है।

क्या भारत आएंगे शी जिनपिंग?

यदि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस सम्मेलन में भाग लेते हैं तो यह अक्टूबर 2019 के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी।

अक्टूबर 2019 में तमिलनाडु के महाबलीपुरम (मामल्लापुरम) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच दूसरा अनौपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ था।

लेकिन उसके कुछ ही महीनों बाद पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दोनों देशों के बीच गंभीर सैन्य तनाव उत्पन्न हो गया था, जिसने भारत-चीन संबंधों को लंबे समय तक प्रभावित किया।

इसके बाद कई दौर की सैन्य और राजनयिक वार्ताओं के माध्यम से स्थिति को सामान्य बनाने की कोशिशें जारी रहीं।

अक्टूबर 2024 में रूस के कजान शहर में आयोजित बैठक के दौरान दोनों देशों ने सैन्य गतिरोध समाप्त करने की दिशा में सहमति बनाई थी। इसके बाद हाल ही में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन के दौरान भी दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई थी।

ऐसे में नई दिल्ली में संभावित मुलाकात को दोनों देशों के संबंधों में एक और महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

पश्चिम एशिया संकट सम्मेलन पर डाल सकता है असर

इस बार का BRICS सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हो रहा है जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बना हुआ है।

विशेष रूप से ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच कई मुद्दों को लेकर मतभेद चर्चा का विषय बने हुए हैं।

जानकारों का कहना है कि इन मतभेदों का असर BRICS सम्मेलन की चर्चाओं पर भी दिखाई दे सकता है।

हालांकि भारत हमेशा से संवाद, शांति और कूटनीतिक समाधान का समर्थक रहा है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि नई दिल्ली सभी सदस्य देशों के बीच संतुलित भूमिका निभाने की कोशिश करेगी।

फिलिस्तीन मुद्दा भी रह सकता है चर्चा का केंद्र

सूत्रों के अनुसार BRICS के अधिकांश सदस्य देश आधिकारिक दस्तावेजों में फिलिस्तीन मुद्दे और दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन बनाए रखने के पक्षधर हैं।

हालांकि इस विषय पर सदस्य देशों के अलग-अलग दृष्टिकोण होने के कारण पिछले कुछ महीनों में BRICS की कई बैठकों में सर्वसम्मति वाला संयुक्त दस्तावेज जारी नहीं हो सका।

ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन के दौरान सदस्य देश किसी साझा सहमति तक पहुंच पाते हैं या नहीं।

ईरान के लिए भी अहम अवसर

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान की संभावित भागीदारी को भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह यात्रा भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने का अवसर बन सकती है।

साल 2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने ईरानी तेल का आयात बंद कर दिया था, जिससे दोनों देशों के आर्थिक संबंधों पर प्रभाव पड़ा था।

इसके अलावा चाबहार बंदरगाह परियोजना की गति भी प्रभावित हुई थी।

अब BRICS सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, बंदरगाह विकास और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषयों पर नई चर्चा होने की संभावना जताई जा रही है।

भारत निभा सकता है संतुलन बनाने की भूमिका

भारत के दोनों देशों—ईरान और यूएई—के साथ अच्छे संबंध हैं।

इसी वजह से कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत दोनों देशों के बीच संवाद को बढ़ावा देने और तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।

हालांकि भारत ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से चाहता है।

BRICS का बढ़ता प्रभाव

BRICS अब केवल पांच देशों का समूह नहीं रह गया है।

जनवरी 2024 में इसके विस्तार के बाद कई नए सदस्य इसमें शामिल हुए, जिससे संगठन का वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया।

आज BRICS वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।

व्यापार, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन और विकासशील देशों के हित जैसे मुद्दे अब BRICS एजेंडे के प्रमुख विषय बन चुके हैं।

विशेष अतिथियों को भी भारत का निमंत्रण

भारत ने केवल BRICS सदस्य देशों तक ही अपने निमंत्रण सीमित नहीं रखे हैं।

जानकारी के अनुसार कई अन्य देशों के शीर्ष नेताओं को भी विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है।

इसी क्रम में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को BIMSTEC के वर्तमान अध्यक्ष देश के प्रमुख के रूप में आमंत्रित किए जाने की जानकारी सामने आई है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत इस सम्मेलन को व्यापक क्षेत्रीय सहयोग के मंच के रूप में भी प्रस्तुत करना चाहता है।

वैश्विक राजनीति के लिए क्यों अहम है यह सम्मेलन?

विश्लेषकों का मानना है कि यह सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहेगा।

भारत-चीन संबंध, रूस के साथ रणनीतिक सहयोग, पश्चिम एशिया संकट, वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन और विकासशील देशों की आवाज जैसे अनेक बड़े मुद्दों पर इस सम्मेलन का प्रभाव देखने को मिल सकता है।

नई दिल्ली में होने वाली संभावित द्विपक्षीय बैठकों से कई ऐसे संकेत भी मिल सकते हैं जो आने वाले वर्षों की वैश्विक कूटनीति को प्रभावित करेंगे।

सितंबर 2026 में नई दिल्ली में आयोजित होने वाला BRICS शिखर सम्मेलन केवल एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था के बीच भारत की बढ़ती भूमिका का महत्वपूर्ण प्रदर्शन भी माना जा रहा है। चीन, रूस और ईरान सहित कई प्रभावशाली देशों के नेताओं की संभावित मौजूदगी इस आयोजन को और भी खास बना रही है। पश्चिम एशिया संकट, भारत-चीन संबंध, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और बहुपक्षीय सहयोग जैसे विषयों पर होने वाली चर्चाएं पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण होंगी। ऐसे में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि नई दिल्ली से निकलने वाले संदेश आने वाले समय की वैश्विक राजनीति और कूटनीति को किस दिशा में ले जाते हैं।

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