क्या गले लगाना इंसानों ने नहीं सीखा? नई रिसर्च में खुला 70 लाख साल पुराना ऐसा राज, जिसे जानकर रह जाएंगे हैरान
क्या आपने कभी तनाव में किसी अपने को गले लगाकर सुकून महसूस किया है? या किसी मुश्किल समय में दोस्त के कंधे पर हाथ रखकर उसे हिम्मत दी है? वैज्ञानिकों का कहना है कि यह केवल इंसानों की आदत नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें लाखों साल पुरानी हो सकती हैं। एक नई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च में दावा किया गया है कि इंसानों के सबसे करीबी पूर्वज माने जाने वाले ग्रेट एप्स (Great Apes) भी तनाव और संभावित झगड़े की स्थिति में एक-दूसरे को गले लगाते, छूते और अपनापन जताते हैं।
ब्रिटेन की डरहम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा की गई इस रिसर्च में चिंपैंजी और बोनोबो प्रजाति के वनमानुषों के व्यवहार का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि कठिन परिस्थितियों में एक-दूसरे को छूकर भरोसा दिलाने और गले लगाकर तनाव कम करने की यह आदत इंसानों और उनके पूर्वजों की साझा विकास यात्रा (इवोल्यूशन) का हिस्सा हो सकती है।
तनाव कम करने का अनोखा तरीका
रिसर्च के अनुसार, जब चिंपैंजी और बोनोबो के सामने भोजन रखा गया, तो कई बार उन्होंने खाने की शुरुआत करने से पहले एक-दूसरे के पास जाकर स्पर्श किया, गले लगाया या अपनापन जताया। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह व्यवहार किसी संभावित विवाद या प्रतिस्पर्धा से पहले आपसी विश्वास मजबूत करने का संकेत हो सकता है।
वनमानुषों के बीच इस तरह का व्यवहार यह दर्शाता है कि सामाजिक संबंध बनाए रखने और समूह में शांति कायम रखने के लिए केवल ताकत ही नहीं बल्कि भावनात्मक जुड़ाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कांगो और जाम्बिया में हुई रिसर्च
यह अध्ययन अफ्रीका के कांगो और जाम्बिया में रहने वाले चिंपैंजी और बोनोबो समूहों पर किया गया।
शोधकर्ताओं ने इन वनमानुषों को मूंगफली उपलब्ध कराई और फिर उनके व्यवहार का बारीकी से अवलोकन किया। उद्देश्य यह समझना था कि भोजन जैसी सीमित संसाधन वाली स्थिति में वे किस प्रकार का सामाजिक व्यवहार अपनाते हैं।
रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि भोजन के लिए प्रतिस्पर्धा शुरू होने से पहले कई वनमानुष अपने साथियों के पास जाकर उन्हें छूते या गले लगाते थे।
गले मिलने के बाद कम हुआ तनाव
शोधकर्ताओं के अनुसार, जिन वनमानुषों ने भोजन से पहले एक-दूसरे के साथ सकारात्मक शारीरिक संपर्क किया, उनके बीच बाद में झगड़े या आक्रामक व्यवहार की संभावना अपेक्षाकृत कम देखी गई।
कई मामलों में वे बिना किसी संघर्ष के आराम से एक साथ बैठकर भोजन करते दिखाई दिए।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह व्यवहार समूह के सदस्यों के बीच विश्वास बढ़ाने और संभावित तनाव को कम करने का प्राकृतिक तरीका हो सकता है।
फुटबॉल टीम जैसी एकजुटता
रिसर्च टीम की प्रमुख वैज्ञानिक प्रोफेसर ज़न्ना क्ले ने इस व्यवहार की तुलना फुटबॉल खिलाड़ियों से की है।
उन्होंने बताया कि जैसे किसी बड़े मैच से पहले खिलाड़ी एक घेरा बनाकर एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाते हैं, उसी तरह चिंपैंजी और बोनोबो भी तनावपूर्ण स्थिति से पहले अपने साथियों के करीब आते हैं।
इस दौरान वे गले लगते हैं, स्पर्श करते हैं और मानो एक-दूसरे को भरोसा दिलाते हैं कि पूरा समूह साथ है।
वैज्ञानिकों ने दिया नया नाम
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिकों ने इस विशेष व्यवहार को "रीएश्योरेंस ट्रेन्स" (Reassurance Trains) नाम दिया है।
इसमें देखा गया कि कई वनमानुष लगातार एक के बाद एक अपने कई साथियों के पास जाकर उन्हें गले लगाते थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं बल्कि पूरे समूह में सामाजिक एकजुटता बनाए रखने का तरीका हो सकता है।
बोलने से भी पुरानी हो सकती है स्पर्श की भाषा
रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. जेक ब्रूकर का कहना है कि स्पर्श के माध्यम से भावनाएं व्यक्त करना इंसानों की भाषा विकसित होने से भी पहले का व्यवहार हो सकता है।
उनके अनुसार, इंसानों के बोलना सीखने से पहले भी स्पर्श, आलिंगन और शारीरिक संकेत सामाजिक संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम रहे होंगे।
यही कारण है कि आज भी लोग दुख, खुशी, डर या तनाव के समय किसी का हाथ पकड़ना, कंधे पर हाथ रखना या गले लगाना सहज रूप से अपनाते हैं।
70 लाख साल पुरानी हो सकती है यह आदत
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इंसानों और ग्रेट एप्स के साझा पूर्वजों में यह सामाजिक व्यवहार लगभग 70 लाख वर्ष पहले भी मौजूद रहा होगा।
हालांकि इस समयावधि का अनुमान विकासवादी अध्ययन (इवोल्यूशनरी रिसर्च) के आधार पर लगाया गया है और इसे प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
फिर भी वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के व्यवहार से यह समझने में मदद मिलती है कि सामाजिक संबंधों का विकास किस प्रकार हुआ।
चिंपैंजी और बोनोबो क्यों हैं खास?
चिंपैंजी और बोनोबो को इंसानों के सबसे करीबी जीवित रिश्तेदारों में गिना जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इंसानों और इन दोनों प्रजातियों का डीएनए लगभग 98 से 99 प्रतिशत तक समान है।
इसी कारण इनके व्यवहार, भावनात्मक प्रतिक्रिया और सामाजिक संबंधों का अध्ययन मानव विकास को समझने में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
भावनात्मक जुड़ाव की वैज्ञानिक अहमियत
मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस के विशेषज्ञ पहले भी यह बताते रहे हैं कि गले लगने या सकारात्मक स्पर्श से शरीर में ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है।
ऑक्सीटोसिन को अक्सर "बॉन्डिंग हार्मोन" या "लव हार्मोन" कहा जाता है क्योंकि यह सामाजिक जुड़ाव और भरोसे की भावना को मजबूत करने में भूमिका निभाता है।
हालांकि यह नया अध्ययन मुख्य रूप से वनमानुषों के व्यवहार पर आधारित है, लेकिन इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि सामाजिक स्पर्श का महत्व विकासवादी दृष्टि से कितना पुराना है।
रॉयल सोसाइटी की प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध
यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Proceedings of the Royal Society B में प्रकाशित हुआ है।
वैज्ञानिक समुदाय का मानना है कि इस तरह के अध्ययन केवल वन्यजीवों के व्यवहार को समझने के लिए ही नहीं बल्कि मानव समाज के विकास, भावनात्मक संबंधों और सामाजिक सहयोग की जड़ों को जानने के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
इंसानों के लिए क्या है सीख?
यह अध्ययन हमें यह याद दिलाता है कि सहयोग, भरोसा और भावनात्मक जुड़ाव केवल आधुनिक समाज की देन नहीं हैं। संभव है कि लाखों वर्षों की विकास यात्रा के दौरान यह व्यवहार हमारे पूर्वजों से हमें विरासत में मिला हो।
आज जब तनाव, अकेलापन और मानसिक दबाव दुनिया भर में बढ़ रहा है, ऐसे में किसी अपने का साथ, एक भरोसेमंद स्पर्श या स्नेह भरा आलिंगन केवल भावनात्मक सहारा ही नहीं बल्कि सामाजिक जुड़ाव की उस पुरानी परंपरा का हिस्सा भी हो सकता है, जिसकी शुरुआत इंसानों के अस्तित्व से भी बहुत पहले हुई थी।

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