टूटीं 9 पसलियां, फेफड़ों में गंभीर चोट, फिर भी नहीं टूटा हौसला; अस्पताल के कपड़ों में NEET परीक्षा देने पहुंची सृष्टि
देशभर में शनिवार को आयोजित हो रहे नीट री-एग्जाम के बीच पश्चिम बंगाल के कोलकाता से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने लाखों छात्रों के लिए संघर्ष और हौसले की नई मिसाल पेश की है। एक तरफ जहां 22 लाख से अधिक छात्र मेडिकल प्रवेश परीक्षा में शामिल हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गंभीर सड़क हादसे में घायल हुई एक छात्रा ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हार मानने से इनकार कर दिया। नौ पसलियां टूटने और फेफड़ों में गंभीर चोट लगने के बावजूद छात्रा सृष्टि दुबे ने परीक्षा देने का फैसला किया और प्रशासन तथा केंद्र सरकार की मदद से आखिरकार वह परीक्षा केंद्र तक पहुंचने में सफल रही।
सृष्टि दुबे की कहानी अब सोशल मीडिया से लेकर शिक्षा जगत तक चर्चा का विषय बनी हुई है। हर कोई उसकी इच्छाशक्ति और साहस की सराहना कर रहा है। गंभीर हादसे के बाद भी डॉक्टरों की निगरानी में परीक्षा देने का उसका निर्णय हजारों छात्रों के लिए प्रेरणा बन गया है।
सड़क हादसे ने बदल दी जिंदगी, लेकिन नहीं टूटा हौसला
जानकारी के अनुसार सृष्टि दुबे पश्चिम बंगाल के कोलकाता में नीट परीक्षा की तैयारी कर रही थीं। 14 जून को वह एक गंभीर सड़क दुर्घटना का शिकार हो गईं। इस हादसे में उनकी नौ पसलियां टूट गईं और फेफड़ों में भी गहरी चोट आई। हालत इतनी गंभीर थी कि उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए सर्जरी करनी पड़ी।
परिजनों के अनुसार कई दिनों तक सृष्टि वेंटिलेटर सपोर्ट पर रहीं। डॉक्टर लगातार उनकी स्थिति पर नजर बनाए हुए थे। धीरे-धीरे उनकी हालत में सुधार आने लगा और वेंटिलेटर हटाया गया। इसी दौरान जब परीक्षा की तारीख करीब आई तो सृष्टि ने अपने परिवार के सामने इच्छा जाहिर की कि वह हर हाल में नीट की परीक्षा देना चाहती हैं।
बेटी की इच्छा पूरी करने के लिए पिता ने लगाई गुहार
सृष्टि के पिता शीशराम दुबे ने बताया कि बेटी की यह जिद देखकर उन्होंने उसे रोकने की बजाय उसका साथ देने का फैसला किया। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पत्र लिखकर विशेष सहायता की मांग की। अपने पत्र में उन्होंने बताया कि उनकी बेटी गंभीर रूप से घायल है और अभी अस्पताल के इलाज के बीच है, लेकिन वह नीट परीक्षा देना चाहती है।
उन्होंने अनुरोध किया कि परीक्षा केंद्र पर ग्राउंड फ्लोर में अलग कमरे की व्यवस्था की जाए और उसे अस्पताल के कपड़ों तथा आवश्यक मेडिकल उपकरणों के साथ परीक्षा देने की अनुमति दी जाए। उन्होंने यह भी बताया कि आईएलएस अस्पताल डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं के साथ छात्रा को सहयोग देने के लिए तैयार है।
शिक्षा मंत्री ने लिया मानवीय आधार पर फैसला
छात्रा के पिता की अपील पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने तुरंत संज्ञान लिया। मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने संबंधित अधिकारियों को आवश्यक व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। इसके बाद कोलकाता के ढाकुरिया स्थित बिनोदिनी गर्ल्स हाई स्कूल परीक्षा केंद्र पर सृष्टि के लिए अलग कमरे की व्यवस्था की गई।
इतना ही नहीं, परीक्षा केंद्र के बाहर एंबुलेंस और मेडिकल सपोर्ट टीम को भी तैनात किया गया, ताकि परीक्षा के दौरान यदि किसी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्या उत्पन्न होती है तो तत्काल सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
अस्पताल के कपड़ों में पहुंची परीक्षा केंद्र
परिजनों के अनुसार डॉक्टरों की सलाह और निगरानी में सृष्टि दुबे को अस्पताल के कपड़ों में ही परीक्षा केंद्र ले जाया गया। उसके साथ मेडिकल टीम भी मौजूद रही। परीक्षा केंद्र पर विशेष व्यवस्था के तहत उसे आरामदायक वातावरण उपलब्ध कराया गया, ताकि वह बिना किसी अतिरिक्त परेशानी के परीक्षा दे सके।
परीक्षा शुरू होने से पहले छात्रा के माता-पिता भावुक नजर आए। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी का सपना डॉक्टर बनने का है और उसने दर्द और तकलीफ के बावजूद अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री और प्रशासन का धन्यवाद भी किया।
सोशल मीडिया पर लोग कर रहे सलाम
सृष्टि दुबे की कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग उसकी बहादुरी और जज्बे की जमकर सराहना कर रहे हैं। कई लोगों ने लिखा कि यह कहानी उन छात्रों के लिए प्रेरणा है, जो छोटी-छोटी मुश्किलों से निराश हो जाते हैं। लोगों का कहना है कि सृष्टि ने यह साबित कर दिया कि यदि लक्ष्य के प्रति दृढ़ संकल्प हो तो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियां भी इंसान को रोक नहीं सकतीं।
शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटनाएं यह दिखाती हैं कि छात्रों के सपने कितने बड़े होते हैं और उन्हें सही समय पर सहयोग मिले तो वे असंभव लगने वाली परिस्थितियों में भी आगे बढ़ सकते हैं।
प्रशासन और मानवीय संवेदनशीलता की मिसाल
इस पूरे मामले में प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की संवेदनशीलता की भी काफी सराहना हो रही है। अधिकारियों ने न केवल छात्रा की स्थिति को समझा, बल्कि यह सुनिश्चित किया कि उसकी शारीरिक स्थिति परीक्षा देने में बाधा न बने। परीक्षा केंद्र पर अलग कमरे, मेडिकल सपोर्ट और एंबुलेंस की व्यवस्था यह दर्शाती है कि जरूरत पड़ने पर व्यवस्था मानवीय आधार पर लचीला रुख भी अपना सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के मामलों में संवेदनशीलता और सहयोग छात्रों का मनोबल बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
संघर्ष और उम्मीद की नई मिसाल बनी सृष्टि
आज जब लाखों छात्र नीट री-एग्जाम में अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उसी बीच सृष्टि दुबे की कहानी ने यह साबित कर दिया है कि असली जीत केवल परीक्षा पास करने में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत न हारने में होती है। गंभीर चोट, सर्जरी और अस्पताल के बिस्तर से उठकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचने वाली यह छात्रा अब लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन चुकी है।
उसकी कहानी यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर हौसला मजबूत हो तो सपनों की राह कभी बंद नहीं होती। आज पूरे देश की नजर उस छात्रा पर है, जिसने दर्द से लड़ते हुए अपने सपनों को जिंदा रखा और साबित कर दिया कि सच्ची मेहनत और जज्बे के सामने मुश्किलें भी छोटी पड़ जाती हैं।

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