आसमान से बरस रही है मरे हुए तारों की राख! अंटार्कटिका की बर्फ में मिला 80,000 साल पुराना रहस्य, क्या इंसानों के लिए है खतरा?
क्या आपने कभी कल्पना की है कि खुले आसमान के नीचे खड़े होने पर अंतरिक्ष से आने वाले ऐसे कण लगातार आपके ऊपर गिर रहे होते हैं, जो करोड़ों साल पहले फटे हुए तारों के अवशेष हैं? सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों की ताजा खोज ने इस आश्चर्यजनक तथ्य को वास्तविकता साबित कर दिया है। अंटार्कटिका की हजारों साल पुरानी बर्फ की परतों में वैज्ञानिकों को एक ऐसा रेडियोएक्टिव तत्व मिला है, जिसने ब्रह्मांड के अतीत से जुड़े कई रहस्यों को उजागर करने की उम्मीद जगा दी है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह पदार्थ मरे हुए तारों की राख का हिस्सा है, जो आज भी पृथ्वी तक पहुंच रही है।
अंटार्कटिका की बर्फ में मिला अंतरिक्ष का अनोखा संदेश
वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका की करीब 80,000 साल पुरानी बर्फ की परतों का गहन अध्ययन किया। इस दौरान उन्हें एक दुर्लभ रेडियोएक्टिव आइसोटोप ‘आयरन-60’ (Iron-60) मिला। यह तत्व सामान्य परिस्थितियों में पृथ्वी पर नहीं बनता, बल्कि तब उत्पन्न होता है जब अंतरिक्ष में कोई विशाल तारा अपने जीवन के अंतिम चरण में सुपरनोवा विस्फोट के साथ समाप्त होता है। ऐसे विस्फोट ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली घटनाओं में गिने जाते हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह पदार्थ हजारों साल पहले हुए किसी सुपरनोवा विस्फोट से निकला होगा और धीरे-धीरे अंतरिक्ष में यात्रा करते हुए पृथ्वी तक पहुंचा। अंटार्कटिका की बर्फ ने इन सूक्ष्म कणों को हजारों वर्षों तक सुरक्षित रखा, जिसकी वजह से वैज्ञानिक अब उनका अध्ययन कर पा रहे हैं।
क्या यह रेडियोएक्टिव धूल इंसानों के लिए खतरनाक है?
इस खोज के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि क्या अंतरिक्ष से आने वाली यह रेडियोएक्टिव धूल मानव जीवन के लिए खतरा पैदा कर सकती है। वैज्ञानिकों का स्पष्ट जवाब है कि इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है। शोधकर्ताओं के अनुसार, आयरन-60 की मात्रा पृथ्वी पर बेहद कम स्तर पर पहुंचती है और यह इतनी सूक्ष्म होती है कि इसका इंसानों, जानवरों, पौधों या पर्यावरण पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।
हालांकि यह तत्व रेडियोएक्टिव है, लेकिन इसकी सांद्रता इतनी कम है कि यह स्वास्थ्य के लिए किसी प्रकार का जोखिम पैदा नहीं करता। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज डर पैदा करने के बजाय ब्रह्मांड के इतिहास को समझने का अवसर प्रदान करती है।
50,000 फुटबॉल स्टेडियम में सुई ढूंढने जितना कठिन था काम
इस अंतरिक्षीय धूल को ढूंढना वैज्ञानिकों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। शोधकर्ता एनाबेल रोलोफ्स के अनुसार, यह काम ऐसा था जैसे भूसे से भरे 50,000 फुटबॉल स्टेडियम में से एक छोटी सी सुई को खोज निकालना। वैज्ञानिकों ने लगभग 300 किलोग्राम अंटार्कटिक बर्फ को पिघलाया और अत्याधुनिक तकनीक की मदद से उसमें मौजूद सूक्ष्म कणों को अलग किया।
इतनी बड़ी मात्रा में बर्फ का विश्लेषण करने के बाद ही आयरन-60 के कुछ बेहद छोटे अंश प्राप्त हुए। यही वजह है कि इस खोज को आधुनिक खगोल विज्ञान और भू-विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
मरे हुए तारों का फिंगरप्रिंट है आयरन-60
विशेषज्ञों के मुताबिक, आयरन-60 का आधा जीवन लगभग 26 लाख वर्ष का होता है। इसका मतलब यह है कि यह तत्व पृथ्वी के निर्माण के समय से मौजूद नहीं हो सकता, क्योंकि यदि ऐसा होता तो अब तक यह पूरी तरह समाप्त हो चुका होता। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह पदार्थ अपेक्षाकृत हाल के खगोलीय घटनाक्रमों से संबंधित है।
वैज्ञानिक आयरन-60 को सुपरनोवा विस्फोटों का ‘फिंगरप्रिंट’ मानते हैं। इसकी सहायता से यह पता लगाया जा सकता है कि अतीत में हमारे सौर मंडल के आसपास कौन-कौन से विशाल तारे फटे थे और उन घटनाओं का प्रभाव किस प्रकार अंतरिक्ष में फैला।
एक विशाल अंतरिक्षीय बादल से गुजर रहा है हमारा सौर मंडल
इस शोध से यह भी संकेत मिलता है कि हमारा पूरा सौर मंडल इस समय गैस और धूल के एक विशाल क्षेत्र से गुजर रहा है, जिसे ‘लोकल इंटरस्टेलर क्लाउड’ (Local Interstellar Cloud) कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बादल में प्राचीन सुपरनोवा विस्फोटों से निकले कण मौजूद हैं, जो धीरे-धीरे पृथ्वी तक पहुंच रहे हैं।
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के एडवांस्ड कंपोजीशन एक्सप्लोरर (ACE) सैटेलाइट ने भी अंतरिक्ष में ऐसे कई कणों की मौजूदगी दर्ज की है। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल रही है कि ब्रह्मांड में होने वाली घटनाएं किस प्रकार लाखों वर्षों बाद भी हमारे ग्रह को प्रभावित करती हैं।
ब्रह्मांड के इतिहास को समझने का नया अवसर
वैज्ञानिक मार्टिन इजराइल का कहना है कि विभिन्न शोधों से प्राप्त परिणाम एक ही दिशा में इशारा करते हैं। उनके अनुसार, अतीत में फटे हुए तारों का मलबा आज भी पृथ्वी तक पहुंच रहा है और यह हमें ब्रह्मांड के विकास की कहानी को समझने का अवसर देता है। यह खोज न केवल खगोल विज्ञान बल्कि भू-विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी और खोजें ब्रह्मांड के उन रहस्यों को उजागर कर सकती हैं, जिनके बारे में आज तक केवल अनुमान लगाए जाते रहे हैं। अंटार्कटिका की बर्फ में छिपे इस 80,000 साल पुराने रहस्य ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हमारा ग्रह और ब्रह्मांड एक-दूसरे से कहीं अधिक गहराई से जुड़े हुए हैं, जितना हम अब तक समझ पाए हैं।

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