मौत से ठीक पहले शरीर देने लगता है ये 3 संकेत! 16 साल से मरीजों की सेवा कर रही नर्स ने खोला जिंदगी का सबसे बड़ा राज
मौत जीवन का ऐसा सच है, जिससे कोई भी इंसान बच नहीं सकता। लेकिन किसी व्यक्ति की मृत्यु कब और किस परिस्थिति में होगी, इसका अंदाजा लगाना हमेशा आसान नहीं होता। कुछ लोगों की जान गंभीर बीमारी के कारण चली जाती है, तो कुछ सड़क दुर्घटना या अचानक हुई स्वास्थ्य संबंधी समस्या का शिकार हो जाते हैं। वहीं, कई बार ऐसा भी होता है कि कोई व्यक्ति नींद में ही दुनिया को अलविदा कह देता है। मौत को लेकर लोगों के मन में कई तरह के सवाल और डर होते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि क्या मृत्यु से कुछ समय पहले शरीर कोई संकेत देने लगता है?
अमेरिका की एक अनुभवी हॉस्पिस नर्स ने अपने लंबे अनुभव के आधार पर इस विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उनका कहना है कि गंभीर और लाइलाज बीमारी से जूझ रहे ऐसे मरीज, जो जीवन के अंतिम चरण में पहुंच चुके होते हैं, उनमें कुछ शारीरिक और मानसिक बदलाव अक्सर देखने को मिलते हैं। इन बदलावों को समझने से मरीज के परिवार को स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार होने और बेहतर देखभाल करने में मदद मिल सकती है।
अमेरिका की हॉस्पिस नर्स जूली मैकफैडेन पिछले 16 वर्षों से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की देखभाल कर रही हैं। सोशल मीडिया पर वह 'नर्स जूली' के नाम से मशहूर हैं। वह लोगों को मृत्यु, जीवन के अंतिम दिनों और मरीजों की देखभाल से जुड़ी जानकारी देती हैं। उनकी बताई तीन बातें विशेष रूप से चर्चा में रहती हैं। आइए जानते हैं कि मृत्यु के करीब पहुंचने वाले कुछ मरीजों में कौन से बदलाव दिखाई दे सकते हैं।
कौन हैं नर्स जूली मैकफैडेन, जिनकी बातें हो रही हैं चर्चा में?
जूली मैकफैडेन अमेरिका की एक अनुभवी हॉस्पिस नर्स हैं। उनका काम उन मरीजों की देखभाल से जुड़ा है, जो गंभीर या लाइलाज बीमारियों से पीड़ित होते हैं और जिनके जीवन का अंतिम चरण चल रहा होता है। ऐसे मरीजों को केवल दवाओं और उपचार की ही नहीं, बल्कि दर्द से राहत, आराम और भावनात्मक सहयोग की भी जरूरत होती है।
अपने 16 साल के अनुभव के दौरान जूली ने ऐसे अनेक मरीजों को देखा है, जिनकी बीमारी अंतिम अवस्था में पहुंच चुकी थी। उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर बताया है कि जीवन के अंतिम दिनों में शरीर में कुछ बदलाव हो सकते हैं। उनका उद्देश्य लोगों को डराना नहीं, बल्कि मृत्यु की प्रक्रिया से जुड़ी गलतफहमियों को दूर करना और परिवारों को सही जानकारी देना है।
जूली ने 'Nothing to Fear: Demystifying Death to Live More Fully' नाम से एक किताब भी लिखी है। इस किताब में उन्होंने मृत्यु से जुड़े डर, जीवन के अंतिम समय में होने वाले बदलावों और इस विषय पर खुलकर बातचीत करने के महत्व को समझाने की कोशिश की है।
मौत के करीब दिख सकते हैं ये 3 आम बदलाव
नर्स जूली के अनुभव के अनुसार, जीवन के अंतिम चरण में पहुंच चुके कई मरीजों में कुछ सामान्य शारीरिक बदलाव देखने को मिलते हैं। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि हर मरीज में ये सभी संकेत दिखाई दें या इनका एक ही क्रम हो। मरीज की बीमारी, उम्र और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार अनुभव अलग-अलग हो सकते हैं।
1. खाने-पीने की इच्छा धीरे-धीरे हो सकती है कम
जीवन के अंतिम चरण में कुछ मरीजों की भूख और प्यास कम होने लगती है। जो व्यक्ति पहले नियमित रूप से खाना खाता था, वह धीरे-धीरे भोजन में कम रुचि दिखा सकता है। कई बार मरीज कुछ निवाले खाने के बाद ही मना कर देते हैं। कुछ लोगों को पानी पीने की इच्छा भी पहले की तुलना में कम महसूस होती है।
परिवार के सदस्यों के लिए यह स्थिति भावनात्मक रूप से काफी कठिन हो सकती है। वे चाहते हैं कि उनका अपना व्यक्ति ठीक से खाना खाए और पर्याप्त पानी पिए। इसी वजह से कई बार परिवार के लोग मरीज को बार-बार भोजन या पानी देने की कोशिश करते हैं।
लेकिन गंभीर बीमारी के अंतिम चरण में शरीर की जरूरतें और भोजन को पचाने की क्षमता बदल सकती है। ऐसे में मरीज को जबरदस्ती खाना या पानी पिलाना उचित नहीं होता। इससे परेशानी या दूसरी जटिलताएं हो सकती हैं।
इस स्थिति में डॉक्टर और पेलिएटिव केयर टीम की सलाह लेना जरूरी है। मरीज के मुंह और होंठों को नम रखना, उसकी सुविधा के अनुसार थोड़ी मात्रा में भोजन या तरल देना और उसकी इच्छा का सम्मान करना देखभाल का हिस्सा हो सकता है।
यह भी समझना जरूरी है कि भूख कम होना हमेशा मृत्यु का संकेत नहीं होता। कई दूसरी बीमारियों, दवाओं और स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी भूख कम हो सकती है। इसलिए केवल इस एक बदलाव के आधार पर किसी व्यक्ति की स्थिति का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
2. नींद बढ़ सकती है और बातचीत करने की क्षमता घट सकती है
नर्स जूली के अनुभव में जीवन के अंतिम दिनों में कुछ मरीज सामान्य से ज्यादा समय सोने लगते हैं। वे दिन का बड़ा हिस्सा बिस्तर पर बिताते हैं और परिवार के सदस्यों से बातचीत करने में पहले जैसी रुचि नहीं दिखाते।
कई बार मरीज को जगाना भी मुश्किल हो सकता है। वह कुछ देर के लिए आंखें खोलता है, आसपास मौजूद लोगों को देखता है और फिर दोबारा सो जाता है। कुछ मरीजों की प्रतिक्रिया धीमी हो सकती है। उन्हें किसी सवाल का जवाब देने में अधिक समय लग सकता है या वे बातचीत करने में असमर्थ महसूस कर सकते हैं।
ऐसी स्थिति देखकर परिवार के लोग घबरा सकते हैं। उन्हें लग सकता है कि मरीज उनकी बातें नहीं सुन रहा है या उन्हें पहचान नहीं पा रहा है। हालांकि, कुछ मरीज कम प्रतिक्रिया देने के बावजूद आसपास की आवाजें सुन सकते हैं। इसलिए उनके पास शांत वातावरण बनाए रखना और प्यार से बात करते रहना अच्छा हो सकता है।
परिवार के सदस्य मरीज को अपनी पसंदीदा बातें सुना सकते हैं, उसका हाथ पकड़ सकते हैं और उसे भरोसा दिला सकते हैं कि वे उसके साथ हैं। लेकिन मरीज को बार-बार जगाने या बातचीत के लिए मजबूर करने से बचना चाहिए।
ध्यान रहे कि अधिक नींद आना केवल जीवन के अंतिम चरण में ही नहीं होता। दवाओं के प्रभाव, संक्रमण, शरीर में पानी की कमी और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से भी ऐसा हो सकता है। अचानक बेहोशी या प्रतिक्रिया में कमी आने पर चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।
3. सांस लेने के तरीके में हो सकता है बदलाव
जीवन के अंतिम चरण में कुछ मरीजों के सांस लेने के पैटर्न में बदलाव दिखाई दे सकता है। कभी उनकी सांस सामान्य से तेज चलती है, तो कभी कुछ समय के लिए धीमी पड़ सकती है। कुछ मामलों में सांसों के बीच अंतराल भी बढ़ जाता है।
कई बार मरीज की सांस लेने की प्रक्रिया नियमित नहीं रहती। कुछ देर तक सांस तेज चलती है और फिर कुछ समय के लिए धीमी या लगभग रुकी हुई महसूस हो सकती है। इसे देखकर परिवार के सदस्यों को डर लग सकता है।
कुछ मरीजों के गले या छाती से घरघराहट जैसी आवाज भी सुनाई दे सकती है। यह आवाज सांस के साथ जमा हुए स्राव के हिलने के कारण हो सकती है। परिवार को यह आवाज सुनकर ऐसा लग सकता है कि मरीज को बहुत तकलीफ हो रही है, लेकिन हर मामले में इसका मतलब यह नहीं होता कि मरीज को सांस लेने में दर्द या घुटन महसूस हो रही है।
ऐसी स्थिति में मरीज को आरामदायक स्थिति में रखना और डॉक्टर या हॉस्पिस टीम से सलाह लेना जरूरी है। जरूरत के अनुसार मेडिकल टीम मरीज की सांस और दूसरी परेशानियों को कम करने के उपाय कर सकती है।
सांस लेने में अचानक परेशानी, होंठ या चेहरे का नीला पड़ना, सीने में दर्द या गंभीर घबराहट जैसी स्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।
क्या इन बदलावों का मतलब है कि मौत निश्चित रूप से करीब है?
यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। नर्स जूली द्वारा बताए गए बदलाव गंभीर रूप से बीमार और जीवन के अंतिम चरण में पहुंचे कुछ मरीजों में देखे जा सकते हैं। लेकिन इन लक्षणों को किसी भी व्यक्ति की मृत्यु का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता।
भूख कम होना, अधिक सोना और सांस में बदलाव जैसी स्थितियां कई अन्य बीमारियों में भी हो सकती हैं। किसी व्यक्ति की स्थिति कितनी गंभीर है, इसका आकलन डॉक्टर उसकी बीमारी, मेडिकल रिपोर्ट, शारीरिक स्थिति और दूसरे लक्षणों के आधार पर करते हैं।
इसलिए सोशल मीडिया पर बताई गई जानकारी को मेडिकल जांच का विकल्प नहीं समझना चाहिए। यदि किसी मरीज की हालत बिगड़ रही है या उसके व्यवहार और सांस लेने के तरीके में अचानक बदलाव आया है, तो डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है।
क्या मौत के डर को कम किया जा सकता है?
मौत का डर इंसान की स्वाभाविक भावनाओं में से एक है। किसी अपने को खोने का डर हो या अपनी मृत्यु के बारे में चिंता, दोनों ही स्थितियां मानसिक रूप से कठिन हो सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, मृत्यु और जीवन के अंतिम चरण के बारे में सही जानकारी मिलने से कई लोगों की चिंता कम हो सकती है। परिवार के सदस्यों के साथ खुलकर बातचीत करना, मरीज की इच्छाओं को समझना और जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग लेना मददगार हो सकता है।
पेलिएटिव केयर का उद्देश्य केवल बीमारी का इलाज करना नहीं, बल्कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति के दर्द, बेचैनी और दूसरी परेशानियों को कम करना भी है। इसमें मरीज के साथ-साथ उसके परिवार को भी भावनात्मक सहयोग दिया जाता है।
यदि किसी व्यक्ति को मृत्यु को लेकर लगातार डर, बेचैनी या नींद की समस्या हो रही है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना उपयोगी हो सकता है।
परिवार के लोगों को ऐसे समय में क्या करना चाहिए?
जब परिवार का कोई सदस्य गंभीर बीमारी के अंतिम चरण में हो, तो उसके आसपास मौजूद लोगों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। इस दौरान मरीज को आराम, सम्मान और भावनात्मक सहयोग देना चाहिए।
मरीज की इच्छा और सुविधा का सम्मान करें।
भोजन या पानी जबरदस्ती देने से बचें और डॉक्टर की सलाह मानें।
मरीज के आसपास शांत और आरामदायक वातावरण बनाए रखें।
दर्द, बेचैनी या सांस संबंधी परेशानी होने पर मेडिकल टीम से संपर्क करें।
परिवार के सदस्यों को भी भावनात्मक सहयोग और जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग लेनी चाहिए।
मरीज की देखभाल से जुड़े फैसले डॉक्टर और पेलिएटिव केयर टीम के साथ मिलकर लें।
मृत्यु जीवन की एक सच्चाई है, लेकिन इसके बारे में जानकारी की कमी कई बार डर और गलतफहमियां बढ़ा देती है। अमेरिका की हॉस्पिस नर्स जूली मैकफैडेन ने अपने 16 साल के अनुभव के आधार पर बताया है कि जीवन के अंतिम चरण में कुछ मरीजों की भूख कम हो सकती है, नींद बढ़ सकती है और सांस लेने के तरीके में बदलाव दिखाई दे सकता है।
इन संकेतों को समझना परिवार के लोगों को मरीज की बेहतर देखभाल करने और भावनात्मक रूप से तैयार रहने में मदद कर सकता है। हालांकि, हर मरीज का अनुभव अलग होता है और इन बदलावों को मृत्यु का निश्चित संकेत नहीं मानना चाहिए। सबसे जरूरी बात यह है कि गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को सही मेडिकल देखभाल, आराम, सम्मान और अपनों का साथ मिले।

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