पोलियो की सिर्फ 2 बूंदें क्यों हैं इतनी जरूरी? एक छोटी सी लापरवाही बच्चे की जिंदगी बदल सकती है… जानिए पूरा सच!
पोलियो का नाम सुनते ही आज के दौर में शायद ही किसी को लगे कि यह बीमारी फिर से बड़ी चिंता बन सकती है। भारत को पोलियो-मुक्त घोषित हुए कई साल हो चुके हैं और देश में पोलियो उन्मूलन अभियान की सफलता दुनिया के बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों में गिनी जाती है। लेकिन विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि जब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में पोलियो वायरस मौजूद है, तब तक बच्चों को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए टीकाकरण और निगरानी बेहद जरूरी है।
पोलियो एक अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी है। यह मुख्य रूप से छोटे बच्चों को प्रभावित करती है और कुछ मामलों में शरीर के तंत्रिका तंत्र पर हमला करके स्थायी पैरालाइसिस यानी लकवा पैदा कर सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, लगभग हर 200 संक्रमणों में से एक में अपरिवर्तनीय पैरालाइसिस हो सकता है। जिन लोगों में पैरालाइसिस होता है, उनमें से करीब 5 से 10 प्रतिशत की मौत सांस लेने वाली मांसपेशियों के प्रभावित होने के कारण हो सकती है।
यही वजह है कि बच्चों को पोलियो से बचाने के लिए वैक्सीन की हर निर्धारित खुराक को गंभीरता से लेना जरूरी माना जाता है।
आखिर पोलियो इतना खतरनाक क्यों है?
पोलियो वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद मुख्य रूप से आंतों में अपनी संख्या बढ़ाता है। यह वायरस संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक मुख्य रूप से मल-मुख मार्ग से फैलता है। दूषित पानी या भोजन भी संक्रमण का माध्यम बन सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, संक्रमण के बाद ज्यादातर लोगों में कोई लक्षण नहीं दिखाई देते या केवल हल्के लक्षण होते हैं। लेकिन कुछ मामलों में वायरस केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुंच जाता है। इसके बाद मांसपेशियों में कमजोरी और पैरालाइसिस जैसी गंभीर समस्या पैदा हो सकती है।
पोलियो से होने वाला पैरालाइसिस कुछ मामलों में स्थायी हो सकता है। सबसे गंभीर स्थिति तब बनती है जब सांस लेने वाली मांसपेशियां प्रभावित हो जाएं।
यानी एक ऐसा वायरस, जिसका संक्रमण कई बार बिना स्पष्ट लक्षण के भी हो सकता है, गंभीर स्थिति में बच्चे की पूरी जिंदगी बदल सकता है।
पांच साल से कम उम्र के बच्चों पर इतना जोर क्यों?
पोलियो मुख्य रूप से पांच साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करता है। इसी कारण दुनिया भर के पोलियो उन्मूलन अभियानों में इस आयु वर्ग को विशेष प्राथमिकता दी जाती है।
भारत के पल्स पोलियो कार्यक्रम के तहत भी 0 से 5 वर्ष की आयु के बच्चों को पोलियो की ओरल वैक्सीन की खुराक दी जाती है। स्वास्थ्य मंत्रालय के दस्तावेज के अनुसार, नियमित टीकाकरण व्यवस्था में ओरल पोलियो वैक्सीन और इनएक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन दोनों का उपयोग किया जाता है।
इसका उद्देश्य केवल किसी एक बच्चे को बीमारी से बचाना नहीं है, बल्कि पूरी आबादी में वायरस के फैलने की संभावना को कम करना भी है।
पोलियो की दो बूंदें शरीर में क्या करती हैं?
पोलियो की ओरल वैक्सीन यानी OPV को मुंह के जरिए दिया जाता है। इसमें कमजोर किया गया पोलियो वायरस होता है, जो बीमारी पैदा करने की क्षमता से काफी कमजोर होता है लेकिन शरीर में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पैदा करने में मदद करता है।
भारत सरकार के पोलियो सर्विलांस दिशानिर्देशों के अनुसार, OPV आंतों में अच्छी म्यूकोसल इम्युनिटी पैदा करती है। यही विशेषता इसे पोलियो के प्रसार को रोकने में बेहद उपयोगी बनाती है।
जब बच्चे को ओरल पोलियो वैक्सीन दी जाती है तो आंतों में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया मजबूत होती है। इसका फायदा यह है कि यदि वायरस शरीर में प्रवेश करता है तो उसके बढ़ने और आगे फैलने की संभावना कम हो जाती है।
यानी पोलियो की दो बूंदें केवल बच्चे की व्यक्तिगत सुरक्षा से जुड़ी नहीं हैं, बल्कि समुदाय में वायरस के संक्रमण को रोकने की रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
जब पहले ही पोलियो की खुराक मिल चुकी है तो दोबारा क्यों?
कई माता-पिता के मन में यह सवाल रहता है कि अगर बच्चे को पहले ही पोलियो की बूंदें पिलाई जा चुकी हैं तो अभियान के दौरान दोबारा खुराक देने की जरूरत क्यों पड़ती है?
पल्स पोलियो अभियान का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा बच्चों में मजबूत सामुदायिक सुरक्षा बनाना है। बार-बार निर्धारित खुराक देने से अधिक से अधिक बच्चों तक सुरक्षा पहुंचाने में मदद मिलती है।
WHO के अनुसार, पोलियो से बचाव के लिए टीकाकरण बेहद प्रभावी है और वैश्विक स्तर पर वैक्सीनेशन के प्रयासों ने बीमारी के मामलों में 1988 के बाद से 99 प्रतिशत से अधिक कमी लाने में मदद की है।
इसलिए किसी बच्चे को पहले खुराक मिल चुकी हो, तब भी राष्ट्रीय या स्थानीय पोलियो अभियान के दौरान स्वास्थ्य अधिकारियों की सलाह के अनुसार उसे खुराक दिलाना महत्वपूर्ण है।
OPV और IPV में क्या अंतर है?
पोलियो से बचाव के लिए दो प्रमुख प्रकार की वैक्सीन इस्तेमाल होती हैं—ओरल पोलियो वैक्सीन यानी OPV और इनएक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन यानी IPV।
OPV मुंह से दी जाती है। इसका बड़ा फायदा यह है कि यह आंतों में मजबूत प्रतिरक्षा विकसित करने में मदद करती है और वायरस के व्यक्ति से व्यक्ति तक फैलने की संभावना को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
दूसरी ओर IPV इंजेक्शन के रूप में दी जाती है। यह निष्क्रिय यानी inactivated पोलियो वायरस पर आधारित वैक्सीन है और शरीर में मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया विकसित करने में मदद करती है।
भारत में पोलियो उन्मूलन अभियान के दौरान OPV का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया है, जबकि नियमित टीकाकरण व्यवस्था में IPV को भी शामिल किया गया है। WHO के अनुसार, भारत ने पोलियो-मुक्त स्थिति को बनाए रखने के लिए नियमित टीकाकरण और निगरानी व्यवस्था को जारी रखा है।
भारत पोलियो मुक्त है, फिर भी खतरा क्यों?
भारत में आखिरी जंगली पोलियो वायरस से होने वाला मामला 2011 में सामने आया था। WHO के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को 2014 में पोलियो-मुक्त प्रमाणित किया गया था।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पोलियो का खतरा पूरी दुनिया से खत्म हो गया है।
WHO के अनुसार, जंगली पोलियो वायरस अभी भी कुछ देशों में मौजूद है और जब तक दुनिया में कहीं भी वायरस का प्रसार जारी है, तब तक अंतरराष्ट्रीय यात्रा और संक्रमण के दूसरे रास्तों के कारण अन्य देशों के बच्चों के लिए भी जोखिम बना रह सकता है।
इसी कारण भारत में पोलियो निगरानी और टीकाकरण कार्यक्रम जारी रखना महत्वपूर्ण है।
वैक्सीन के बाद भी निगरानी क्यों जरूरी?
पोलियो उन्मूलन केवल वैक्सीन देने तक सीमित नहीं है। इसके लिए संदिग्ध मामलों की निगरानी, प्रयोगशाला जांच और वायरस की गतिविधियों पर लगातार नजर रखना भी जरूरी है।
भारत सरकार के 2024 के पोलियो सर्विलांस दिशानिर्देशों में OPV और IPV दोनों की भूमिका को विस्तार से बताया गया है। दिशानिर्देशों के अनुसार OPV आंतों की प्रतिरक्षा मजबूत करने और वायरस के प्रसार को रोकने में विशेष रूप से उपयोगी है, जबकि IPV क्लिनिकल बीमारी और पैरालाइसिस से सुरक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यही संयुक्त रणनीति पोलियो उन्मूलन के प्रयासों को मजबूत बनाती है।
माता-पिता के लिए क्या है जरूरी?
माता-पिता को अपने बच्चे के टीकाकरण रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना चाहिए और डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी द्वारा बताई गई सभी नियमित वैक्सीन समय पर लगवानी चाहिए।
अगर क्षेत्र में पल्स पोलियो अभियान चल रहा है और आपका बच्चा निर्धारित आयु वर्ग में आता है, तो स्वास्थ्य विभाग की सलाह के अनुसार उसे पोलियो की खुराक जरूर दिलाएं।
यह भी याद रखना जरूरी है कि पोलियो का कोई विशिष्ट इलाज उपलब्ध नहीं है; बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका टीकाकरण है। WHO के अनुसार, पोलियो को रोका जा सकता है, लेकिन एक बार गंभीर पैरालाइसिस होने के बाद उसके प्रभाव स्थायी हो सकते हैं।
दो बूंदों के पीछे छिपी है बड़ी सुरक्षा
पोलियो की दो बूंदें देखने में भले ही बहुत छोटी लगती हैं, लेकिन इनके पीछे दशकों की वैज्ञानिक मेहनत और दुनिया भर के उन्मूलन अभियानों का अनुभव है। टीकाकरण ने पोलियो के मामलों में भारी गिरावट लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और लाखों बच्चों को पैरालाइसिस से बचाया है।
भारत की पोलियो-मुक्त उपलब्धि निश्चित रूप से बड़ी सफलता है, लेकिन इसे बनाए रखने के लिए सतर्कता जरूरी है। माता-पिता, स्वास्थ्यकर्मी और समुदाय—सभी की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण है।
इसलिए अगर आपके घर में पांच साल से कम उम्र का बच्चा है, तो उसके नियमित टीकाकरण और पोलियो अभियान की खुराक को लेकर लापरवाही न करें। किसी भी वैक्सीन या बच्चे के टीकाकरण कार्यक्रम को लेकर व्यक्तिगत सलाह के लिए अपने बाल रोग विशेषज्ञ या स्थानीय स्वास्थ्यकर्मी से संपर्क करना सबसे उचित रहेगा।

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