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पुतिन का ऑफर ठुकराने के पीछे क्या है बड़ी रणनीति? मोदी सरकार के फैसले ने बढ़ाया सस्पेंस!



नई दिल्ली, 29 अक्टूबर 2026: भारत की रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए सरकार ने इस साल रक्षा क्षेत्र के बजट में बड़ा इजाफा किया है। वित्त वर्ष 2026-27 में रक्षा मंत्रालय को करीब ₹7.85 लाख करोड़ का रिकॉर्ड आवंटन किया गया है, जो पिछले वित्त वर्ष के बजट अनुमान से 15.19 फीसदी अधिक है। इसी बीच रक्षा खरीद की प्रक्रिया भी तेजी से आगे बढ़ रही है। 26 अक्टूबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी Defence Acquisition Council (DAC) की बैठक में करीब ₹2.12 लाख करोड़ की विभिन्न पूंजीगत रक्षा खरीद के प्रस्तावों को सैद्धांतिक मंजूरी दी गई।

इस बढ़ते रक्षा खर्च के बीच भारतीय वायुसेना की फाइटर स्क्वाड्रन क्षमता सबसे अहम मुद्दों में से एक बनी हुई है। भारत को आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में नए लड़ाकू विमानों की जरूरत है। इसी पृष्ठभूमि में एक तरफ फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ रूस ने भारत के सामने अपने पांचवीं पीढ़ी के Su-57 लड़ाकू विमान को लेकर सहयोग और संयुक्त उत्पादन का विकल्प रखा है।

114 राफेल की डील पर आगे बढ़ा भारत

भारत पहले ही फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदकर भारतीय वायुसेना में शामिल कर चुका है। अब वायुसेना के लिए अतिरिक्त 114 राफेल खरीदने की प्रक्रिया चल रही है।

फरवरी 2026 में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट की खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। सरकार के अनुसार इस खरीद का बड़ा हिस्सा भारत में निर्मित किए जाने की योजना है।

इसके बाद मई 2026 में भारत ने फ्रांस को 114 राफेल विमानों के लिए Letter of Request (LoR) भेजा। रिपोर्टों के मुताबिक प्रस्तावित विमानों में बड़ी संख्या में जेट भारत में बनाए जाने हैं। फ्रांसीसी कंपनी Dassault Aviation और भारतीय साझेदार के माध्यम से स्थानीय उत्पादन की योजना पर बातचीत चल रही है।

अगस्त 2026 में फ्रांस की तरफ से भारत को इस प्रस्ताव का विस्तृत तकनीकी और वाणिज्यिक जवाब भी भेजे जाने की खबर सामने आई। अब भारतीय पक्ष फ्रांस के प्रस्ताव का तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन कर रहा है।

इस प्रस्तावित सौदे को भारतीय वायुसेना की फाइटर स्क्वाड्रन क्षमता में कमी को दूर करने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारतीय वायुसेना के सामने फाइटर स्क्वाड्रन की चुनौती

भारतीय वायुसेना लंबे समय से स्वीकृत 42 फाइटर स्क्वाड्रन के मुकाबले कम संख्या में स्क्वाड्रन के साथ काम कर रही है। मई 2026 की रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना के पास करीब 29 स्क्वाड्रन होने की जानकारी दी गई थी। यही कारण है कि नए फाइटर जेट की खरीद को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत एक तरफ राफेल और तेजस जैसे विमानों के माध्यम से तत्काल और मध्यम अवधि की जरूरत पूरी करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ स्वदेशी Advanced Medium Combat Aircraft यानी AMCA पर भी काम जारी है। हालांकि AMCA के भारतीय वायुसेना में शामिल होने में अभी कई साल लग सकते हैं।

यही वह जगह है जहां रूस का Su-57 प्रस्ताव चर्चा में आता है।

पुतिन ने भारत को फिर दिया Su-57 का ऑफर

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 2026 में भारत के साथ Su-57 कार्यक्रम में सहयोग की इच्छा दोहराई। जून 2026 में पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान पुतिन ने कहा कि रूस ने पहले भी भारत को पांचवीं पीढ़ी के विमान के विकास में साथ काम करने का प्रस्ताव दिया था और अब भी वह भारत के साथ इस क्षेत्र में सहयोग के लिए तैयार है।

यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और रूस पहले ही पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के संयुक्त विकास की कोशिश कर चुके हैं।

भारत और रूस ने 2007 में Fifth Generation Fighter Aircraft (FGFA) कार्यक्रम के तहत मिलकर पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया था। शुरुआती डिजाइन और विकास से जुड़े काम आगे बढ़े, लेकिन बाद में लागत, तकनीकी प्रदर्शन, काम के बंटवारे और तकनीक तक पहुंच को लेकर मतभेद सामने आए।

आखिरकार भारत 2018 में इस कार्यक्रम से बाहर हो गया। DRDO से जुड़े प्रकाशित दस्तावेजों में उस समय प्रदर्शन संबंधी कमियों के साथ-साथ work share, समय और लागत बढ़ने जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया था।

भारत ने 2018 में क्यों छोड़ा था प्रोजेक्ट?

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में से एक थी कि परियोजना की लागत काफी ज्यादा हो सकती थी। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान को विकसित करना केवल एक एयरफ्रेम तैयार करने तक सीमित नहीं होता। इसमें इंजन, रडार, एवियोनिक्स, सॉफ्टवेयर, सेंसर, हथियारों का एकीकरण, स्टील्थ तकनीक, फ्लाइट टेस्टिंग और लगातार अपग्रेड जैसी कई महंगी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।

इसके अलावा भारत तकनीक के हस्तांतरण और परियोजना में अपने हिस्से को लेकर भी ज्यादा स्पष्टता चाहता था।

DRDO के दस्तावेजों में FGFA से भारत के बाहर निकलने के संदर्भ में तकनीकी और ऑपरेशनल कारणों के साथ असमान लागत और work-sharing का उल्लेख किया गया है। कुछ आकलनों में Su-57 के शुरुआती संस्करण की स्टील्थ क्षमता और दूसरे प्रदर्शन मानकों को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि भारत ने केवल कीमत की वजह से परियोजना छोड़ी थी। मामला कई तकनीकी और रणनीतिक मुद्दों से जुड़ा हुआ था।

2025 में फिर आया Su-57 का प्रस्ताव

भारत के FGFA से बाहर निकलने के बाद रूस ने Su-57 को अपने स्तर पर विकसित किया। लेकिन 2025 में Aero India के दौरान रूस ने भारत के सामने Su-57 की स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग का प्रस्ताव रखा।

रूस की United Aircraft Corporation और Rosoboronexport ने भारत में Su-57 के उत्पादन की संभावना की बात कही। प्रस्ताव में तकनीक हस्तांतरण के जरिए भारत की एयरोस्पेस क्षमता को मजबूत करने की बात भी सामने आई थी।

रूसी पक्ष ने इंजन, AESA रडार, ऑप्टिक्स, AI, सॉफ्टवेयर, संचार और हथियार विकास जैसी तकनीकों में सहयोग की संभावना बताई थी। हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर भारत की तरफ से अंतिम खरीद फैसला नहीं किया गया है।

Su-57 और Rafale में क्या अंतर है?

Su-57 और Rafale को सीधे एक जैसा विमान मानना सही नहीं होगा। दोनों अलग पीढ़ी और अलग डिजाइन दर्शन के विमान हैं।

Rafale एक 4.5-generation multirole fighter है, जबकि Su-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है। Su-57 को एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड सहित कई भूमिकाओं के लिए डिजाइन किया गया है।

Su-57 की सबसे बड़ी विशेषताओं में कम रडार दृश्यता, आधुनिक सेंसर, उच्च गतिशीलता और मल्टी-रोल क्षमता शामिल हैं। हालांकि इसकी स्टील्थ क्षमता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस भी होती रही है और इसे अमेरिकी F-22 या F-35 के साथ सीधे समान मानना उचित नहीं होगा।

दूसरी तरफ Rafale की सबसे बड़ी ताकत इसका परिपक्व और लंबे समय से ऑपरेशनल मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म होना है। भारत पहले से इसका संचालन कर रहा है, इसलिए प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स और रखरखाव का एक स्थापित ढांचा मौजूद है।

असली सवाल: भारत किस रास्ते पर जाएगा?

भारत के सामने फिलहाल एक जटिल विकल्प है। एक तरफ 114 Rafale की खरीद प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है और फ्रांस से तकनीकी एवं वाणिज्यिक प्रस्ताव पर काम चल रहा है। दूसरी तरफ रूस पांचवीं पीढ़ी के Su-57 के साथ सहयोग और संभावित संयुक्त उत्पादन का विकल्प पेश कर रहा है।

लेकिन भारत के लिए केवल विमान खरीदना ही पर्याप्त नहीं होगा। सवाल यह भी है कि किस सौदे में तकनीक का वास्तविक हस्तांतरण, भारत में उत्पादन, स्वदेशी हथियारों का एकीकरण, लागत, रखरखाव और भविष्य के अपग्रेड बेहतर तरीके से संभव होंगे।

भारत का अपना AMCA कार्यक्रम भी इसी समय महत्वपूर्ण है। इसलिए किसी विदेशी पांचवीं पीढ़ी के विमान का विकल्प चुनना केवल तत्काल फाइटर स्क्वाड्रन की कमी दूर करने का मामला नहीं होगा, बल्कि इसका असर भारत की लंबी अवधि की एयर-पावर रणनीति पर भी पड़ेगा।

रक्षा बजट ने बढ़ाई खरीद की क्षमता

इस पूरी तस्वीर के बीच 2026-27 का रक्षा बजट भी महत्वपूर्ण है। सरकार ने रक्षा मंत्रालय के लिए ₹7.85 लाख करोड़ का आवंटन किया है, जो पिछले बजट अनुमान से 15.19 फीसदी अधिक है। पूंजीगत मद के लिए करीब ₹2.19 लाख करोड़ रखे गए हैं।

वहीं 26 अक्टूबर 2026 को DAC ने करीब ₹2.12 लाख करोड़ की पूंजीगत रक्षा खरीद के प्रस्तावों को Acceptance of Necessity यानी सैद्धांतिक प्रशासनिक मंजूरी दी। इसमें सेना के साथ-साथ अन्य रक्षा जरूरतों से जुड़े कई सिस्टम शामिल हैं।

इससे साफ है कि भारत इस समय सैन्य आधुनिकीकरण पर बड़ा जोर दे रहा है।

अब नजर अगले फैसले पर

राफेल की 114 जेट डील और Su-57 के रूसी प्रस्ताव के बीच भारत के सामने केवल दो विमानों का चुनाव नहीं है। यह फैसला इस बात को भी प्रभावित कर सकता है कि आने वाले वर्षों में भारत अपनी फाइटर जेट जरूरत को किस तरह पूरा करता है और स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी की क्षमता तक पहुंचने के दौरान अंतरिम व्यवस्था कैसी होगी।

फिलहाल 114 Rafale की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है, जबकि Su-57 को लेकर भारत ने अंतिम खरीद फैसला नहीं किया है। इसलिए सोशल मीडिया पर चल रही उन चर्चाओं को सावधानी से देखना जरूरी है जिनमें Su-57 की खरीद को पहले से तय बताया जा रहा है। अभी उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि रूस ने भारत के सामने एक गंभीर प्रस्ताव रखा है और भारत के पास इस विकल्प का मूल्यांकन करने की गुंजाइश मौजूद है।

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