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साबरमती के आसमान में आधी रात भारत ने क्या किया? 5.56 KM दूर तक पहुंचा रहस्यमयी ‘लेजर’, चीन-अमेरिका की बढ़ी नजर!

 


गुजरात के गांधीनगर में सितंबर की एक रात कुछ ऐसा प्रयोग हुआ, जिसने भारत की क्वांटम कम्युनिकेशन क्षमता को नई दिशा दे दी। 27 और 28 सितंबर की रात खुले आसमान में करीब 5.56 किलोमीटर की दूरी तक क्वांटम कम्युनिकेशन लिंक का सफल परीक्षण किया गया। इस प्रयोग में हवा के रास्ते प्रकाश आधारित तकनीक के जरिए सुरक्षित क्वांटम कुंजियों का आदान-प्रदान किया गया।

पहली नजर में यह किसी सैन्य लेजर या आसमान में दागे गए हथियार जैसा लग सकता है, लेकिन असल कहानी इससे बिल्कुल अलग है। यह परीक्षण किसी मिसाइल या लेजर हथियार का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि भविष्य के ऐसे संचार नेटवर्क की दिशा में कदम था जिसमें संवेदनशील डेटा को क्वांटम तकनीक के जरिए ज्यादा सुरक्षित बनाया जा सके।

आधी रात को हुआ 5.56 किलोमीटर का प्रयोग

यह फील्ड ट्रायल QNu Labs, BISAG-N और IIT गांधीनगर के सहयोग से किया गया। प्रयोग के दौरान BISAG-N और IIT गांधीनगर के बीच 5.56 किलोमीटर की खुली दूरी पर फ्री-स्पेस Quantum Key Distribution यानी QKD लिंक स्थापित किया गया।

इसमें किसी फाइबर ऑप्टिक केबल के जरिए सिग्नल भेजने के बजाय खुले वातावरण में प्रकाश आधारित क्वांटम सिग्नल का इस्तेमाल किया गया। परीक्षण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह था कि वातावरण में मौजूद चुनौतियों के बावजूद दोनों सिरों के बीच संचार लिंक को स्थिर रखा गया।

आखिर QKD है क्या?

Quantum Key Distribution को आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसी तकनीक है जिसका इस्तेमाल सुरक्षित संचार के लिए एन्क्रिप्शन की चाबियां यानी सिक्योरिटी कीज तैयार और साझा करने में किया जाता है।

आज इंटरनेट बैंकिंग, सरकारी संचार, रक्षा व्यवस्था और बड़े डिजिटल नेटवर्क में डेटा को सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन भविष्य में शक्तिशाली क्वांटम कंप्यूटर कुछ मौजूदा क्रिप्टोग्राफिक तकनीकों के लिए चुनौती बन सकते हैं।

QKD इसी भविष्य की चुनौती को ध्यान में रखते हुए विकसित की जा रही तकनीकों में से एक है। इसमें क्वांटम अवस्था वाले प्रकाश कणों का इस्तेमाल किया जाता है। यदि कोई तीसरा व्यक्ति क्वांटम सिग्नल को पकड़ने या मापने की कोशिश करता है तो उसकी अवस्था में बदलाव हो सकता है, जिससे संभावित हस्तक्षेप का पता लगाया जा सकता है।

5.56 किलोमीटर की दूरी क्यों महत्वपूर्ण है?

क्वांटम कम्युनिकेशन में लंबी दूरी तक सुरक्षित सिग्नल बनाए रखना आसान नहीं है। फाइबर में सिग्नल लॉस जैसी समस्याएं आती हैं, जबकि खुले वातावरण में प्रकाश आधारित लिंक को वातावरण, कंपन और सटीक दिशा बनाए रखने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

गांधीनगर के इस परीक्षण में करीब 5.56 किलोमीटर की दूरी पर फ्री-स्पेस लिंक को सफलतापूर्वक संचालित किया गया। मंत्रालय के अनुसार परीक्षण के दौरान Quantum Bit Error Rate यानी QBER पांच प्रतिशत से कम रहा और 230 से 260 बिट प्रति सेकंड की दर से सुरक्षित कुंजियां तैयार हुईं।

यानी इस प्रयोग की असली उपलब्धि सिर्फ 5.56 किलोमीटर की दूरी नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि खुले वातावरण में क्वांटम सिक्योरिटी तकनीक को वास्तविक परिस्थितियों में आजमाया गया।

लेजर जैसा दिखने वाला सिस्टम क्या कर रहा था?

इस परीक्षण में QNu Labs की Pointing, Acquisition and Tracking यानी PAT तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इसका काम दोनों सिरों के बीच ऑप्टिकल लिंक को सटीक रूप से बनाए रखना था।

खुले वातावरण में कुछ किलोमीटर दूर स्थित रिसीवर पर बेहद संकीर्ण प्रकाशीय सिग्नल को लगातार सही दिशा में बनाए रखना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण होता है। PAT सिस्टम इसी तरह की सटीकता के लिए इस्तेमाल किया गया।

इसलिए सोशल मीडिया पर इसे देखकर इसे किसी हमलावर लेजर या सैन्य हथियार से जोड़ना सही नहीं होगा। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार इसका उद्देश्य सुरक्षित क्वांटम कम्युनिकेशन का परीक्षण था।

चीन और अमेरिका क्यों चर्चा में आ रहे हैं?

इस तरह की तकनीक का रणनीतिक महत्व जरूर है, क्योंकि भविष्य में क्वांटम कम्युनिकेशन का इस्तेमाल संवेदनशील सरकारी, रक्षा और अंतरिक्ष आधारित संचार नेटवर्क में हो सकता है। लेकिन उपलब्ध आधिकारिक जानकारी में ऐसा कोई दावा नहीं है कि इस परीक्षण से चीन या अमेरिका की कोई व्यवस्था “कांप उठी” या किसी देश को तत्काल सैन्य खतरा पैदा हुआ।

असल महत्व इससे कहीं ज्यादा तकनीकी और दीर्घकालिक है। भारत ऐसी संचार व्यवस्था विकसित करना चाहता है जो भविष्य में क्वांटम कंप्यूटिंग के दौर में भी संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा मजबूत कर सके।

‘वैदिक कवच’ से जोड़ी गई तकनीक

इस परीक्षण में क्वांटम कुंजियों को BISAG-N के पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी सक्षम ‘वैदिक कवच’ प्लेटफॉर्म के साथ भी जोड़ा गया। इसके जरिए परीक्षण संदेशों का एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन और डिक्रिप्शन किया गया।

इसका मतलब यह है कि प्रयोग केवल प्रकाश के जरिए क्वांटम कुंजी भेजने तक सीमित नहीं रहा। तैयार की गई कुंजियों को एक सुरक्षा प्लेटफॉर्म के साथ जोड़कर संचार सुरक्षा की पूरी प्रक्रिया का प्रदर्शन किया गया।

अब नजर अंतरिक्ष पर

5.56 किलोमीटर का यह प्रयोग आगे चलकर और भी बड़े लक्ष्य के लिए आधार तैयार कर सकता है। फ्री-स्पेस क्वांटम कम्युनिकेशन की तकनीक को भविष्य में जमीन से उपग्रह और उपग्रह से उपग्रह संचार तक ले जाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

India Today के अनुसार, इस तरह के ग्राउंड टेस्ट अंतरिक्ष आधारित क्वांटम कम्युनिकेशन के लिए जरूरी तकनीकों को समझने में मदद करते हैं। वातावरण के जरिए प्रकाशीय सिग्नल भेजने में आने वाली चुनौतियों का परीक्षण जमीन पर किया जा सकता है और इसी अनुभव को आगे अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों में उपयोग किया जा सकता है।

ISRO के लिए भी क्यों अहम है यह तकनीक?

भविष्य में क्वांटम संचार का इस्तेमाल उपग्रहों और ग्राउंड स्टेशनों के बीच सुरक्षित संपर्क के लिए किया जा सकता है। ISRO भी क्वांटम और ऑप्टिकल तकनीकों से जुड़े कार्यक्रमों पर काम कर रहा है।

इसका उद्देश्य ऐसी संचार क्षमता विकसित करना है जिसमें बेहद संवेदनशील जानकारी को अधिक सुरक्षित तरीके से भेजा जा सके। अंतरिक्ष आधारित नेटवर्क में यह तकनीक सरकारी, रक्षा और रणनीतिक संचार के लिए उपयोगी हो सकती है।

भारत के लिए क्यों बड़ी उपलब्धि?

भारत के लिए इस परीक्षण का महत्व इसलिए भी है क्योंकि क्वांटम तकनीक आने वाले वर्षों में साइबर सुरक्षा की दुनिया को बदल सकती है। जिस तरह इंटरनेट और मोबाइल संचार ने दुनिया को बदला, उसी तरह क्वांटम कंप्यूटिंग और क्वांटम कम्युनिकेशन अगली तकनीकी दौड़ का हिस्सा बन रहे हैं।

5.56 किलोमीटर का यह फ्री-स्पेस QKD परीक्षण दिखाता है कि भारत खुले वातावरण में क्वांटम सिक्योरिटी लिंक स्थापित करने की दिशा में व्यावहारिक परीक्षण कर रहा है। मंत्रालय ने इसे भारत के पहले फ्री-स्पेस QKD लिंक के रूप में प्रस्तुत किया है।

अभी शुरुआत है, मंजिल काफी दूर

हालांकि इस उपलब्धि को लेकर उत्साह है, लेकिन इसे किसी तैयार राष्ट्रीय क्वांटम नेटवर्क के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक महत्वपूर्ण फील्ड डेमोंस्ट्रेशन है। बड़े पैमाने पर उपयोग के लिए लंबी दूरी, मौसम, विश्वसनीयता, लागत, नेटवर्क विस्तार और अंतरिक्ष आधारित संचार जैसी कई तकनीकी चुनौतियों को हल करना होगा।

यानी गांधीनगर की रात में हुआ यह 5.56 किलोमीटर का प्रयोग किसी दुश्मन देश पर छोड़ा गया लेजर नहीं था। यह भविष्य की उस तकनीक की झलक थी, जिसमें क्वांटम सिद्धांत, प्रकाशीय संचार और आधुनिक एन्क्रिप्शन मिलकर संवेदनशील डेटा की सुरक्षा को नई ऊंचाई दे सकते हैं।

और यही वजह है कि साबरमती क्षेत्र के आसमान से जुड़ी इस खबर में असली रोमांच किसी हथियार का नहीं, बल्कि भविष्य के सुरक्षित संचार की उस तकनीक का है जो आने वाले समय में भारत की डिजिटल और रणनीतिक सुरक्षा में अहम भूमिका निभा सकती है।

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