चीनी के दाम पर सरकार का बड़ा खेल! एथनॉल खरीद पर लिया ऐसा फैसला, अब जेब पर क्या पड़ेगा असर?
देश में चीनी की कीमतों में तेजी और घरेलू बाजार में इसकी उपलब्धता को लेकर सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। चीनी की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण रखने और घरेलू जरूरत के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार ने एथनॉल खरीद की नीति में बदलाव किया है। नई व्यवस्था के तहत सरकारी तेल विपणन कंपनियां अब गन्ने के रस, चीनी सिरप और बी-हेवी शीरे से बनाए गए एथनॉल की खरीद नहीं करेंगी।
सरकार के इस फैसले का सीधा संबंध चीनी उत्पादन के लिए पर्याप्त गन्ना उपलब्ध कराने से है। पिछले वर्षों में एथनॉल उत्पादन के लिए गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल बढ़ा है। इससे एक तरफ देश के एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम को बढ़ावा मिला, वहीं दूसरी तरफ चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध कच्चे माल पर भी असर पड़ा।
अब सरकार एथनॉल कार्यक्रम को रोकने के बजाय उसके लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल में बदलाव करना चाहती है। इसके तहत मक्का, टूटे अनाज, भारतीय खाद्य निगम यानी FCI से मिलने वाले अतिरिक्त चावल और सी-हेवी शीरे से तैयार एथनॉल की खरीद का रास्ता खुला रखा गया है।
चीनी की कीमतों में तेजी के बीच सरकार का बड़ा कदम
चीनी घरेलू बाजार की रोजमर्रा की जरूरत की महत्वपूर्ण वस्तु है। चाय, मिठाई, बेकरी उत्पाद और कई खाद्य पदार्थों में इसका इस्तेमाल होता है। इसलिए चीनी की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी का असर सीधे आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है।
बताया जा रहा है कि पिछले एक महीने के दौरान चीनी की कीमतों में तेज वृद्धि देखने को मिली है। ऐसे में सरकार के सामने घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराने और कीमतों को नियंत्रण में रखने की चुनौती बढ़ गई है।
इसी परिस्थिति में एथनॉल खरीद नीति में बदलाव को एक एहतियाती कदम के तौर पर देखा जा रहा है। सरकार चाहती है कि गन्ने का अधिक हिस्सा चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध रहे, ताकि घरेलू बाजार में आपूर्ति कम न हो और कीमतों पर अतिरिक्त दबाव न बने।
एथनॉल के लिए अब नहीं खरीदा जाएगा गन्ने का रस
तेल विपणन कंपनियों की ओर से जारी एथनॉल खरीद प्रक्रिया में बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा गन्ने से जुड़े कच्चे माल को लेकर है।
नई खरीद व्यवस्था में गन्ने के रस, चीनी सिरप और बी-हेवी शीरे से बने एथनॉल को खरीद के लिए शामिल नहीं किया गया है। इसके बजाय दूसरे स्रोतों से बनने वाले एथनॉल को प्राथमिकता देने की व्यवस्था की गई है।
इस बदलाव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गन्ने से मिलने वाला कच्चा माल सीधे चीनी उत्पादन में ज्यादा इस्तेमाल हो सके।
पिछले वर्ष करीब 29 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा का इस्तेमाल एथनॉल उत्पादन में किए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में अगर गन्ने से बनने वाले एथनॉल के लिए कच्चे माल का इस्तेमाल कम किया जाता है, तो चीनी उत्पादन के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं।
सी-हेवी शीरा क्यों है सरकार के लिए महत्वपूर्ण?
नई नीति में सी-हेवी शीरे से बनने वाले एथनॉल की खरीद को अनुमति दी गई है। इसके पीछे एक महत्वपूर्ण वजह यह है कि सी-हेवी शीरा चीनी बनाने की प्रक्रिया के बाद बचने वाला उप-उत्पाद होता है।
इसमें चीनी की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। इसलिए इसका इस्तेमाल एथनॉल बनाने में करने से चीनी की घरेलू उपलब्धता पर उतना दबाव नहीं पड़ता, जितना गन्ने के रस या चीनी सिरप को एथनॉल में बदलने से पड़ सकता है।
यानी सरकार एथनॉल उत्पादन को पूरी तरह रोकने की दिशा में नहीं जा रही है। बल्कि कोशिश यह है कि एथनॉल उत्पादन के लिए ऐसे कच्चे माल का ज्यादा इस्तेमाल किया जाए जिससे चीनी उत्पादन और घरेलू आपूर्ति प्रभावित न हो।
मक्का और चावल से एथनॉल उत्पादन पर जोर
गन्ने से जुड़े स्रोतों के बजाय सरकार ने मक्का, टूटे अनाज और अतिरिक्त चावल जैसे विकल्पों से बनने वाले एथनॉल की खरीद का रास्ता खुला रखा है।
इसका एक फायदा यह हो सकता है कि चीनी उत्पादन के लिए गन्ने की उपलब्धता बनी रहे और साथ ही पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण के लिए जरूरी ईंधन की आपूर्ति भी जारी रहे।
हालांकि, अनाज आधारित एथनॉल उत्पादन को बढ़ाने के साथ नई चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। मक्का और चावल खाद्य जरूरतों के अलावा पशुचारे और दूसरे उद्योगों में भी इस्तेमाल होते हैं। इसलिए यदि एथनॉल के लिए इनकी मांग बहुत ज्यादा बढ़ती है, तो बाजार में खाद्य पदार्थों और पशुचारे की कीमतों पर दबाव पड़ने की आशंका हो सकती है।
यही वजह है कि सरकार के सामने केवल एथनॉल उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य नहीं है, बल्कि खाद्य सुरक्षा और ईंधन की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी है।
गन्ने की फसल पर मौसम का भी असर
चीनी उत्पादन का सबसे बड़ा आधार गन्ना है। अगर गन्ने का उत्पादन कम होता है तो चीनी मिलों को पर्याप्त कच्चा माल मिलने में परेशानी हो सकती है।
इस बार महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में मौसम से जुड़ी परिस्थितियों ने फसल को प्रभावित किया है। वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाकों में बाढ़, फसल रोग और कीटों के प्रकोप जैसी समस्याओं से भी गन्ने की पैदावार पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
अगर गन्ने की उपलब्धता कम होती है और उसी समय उसका एक हिस्सा एथनॉल उत्पादन में चला जाता है, तो चीनी उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
इसी संभावना को देखते हुए सरकार ने एथनॉल के लिए गन्ने से जुड़े कच्चे माल के इस्तेमाल में बदलाव करने का फैसला किया है।
देश में चीनी की खपत करीब 300 लाख टन
भारत में हर वर्ष चीनी की खपत काफी अधिक होती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में सालाना चीनी खपत करीब 300 लाख टन के आसपास है।
वहीं इस वर्ष चीनी उत्पादन का अनुमान करीब 280 लाख टन बताया जा रहा है। अगर उत्पादन और खपत के बीच इतना अंतर रहता है, तो घरेलू बाजार में आपूर्ति को लेकर दबाव बन सकता है।
यही कारण है कि सरकार पहले से ही स्थिति को संभालने के लिए कदम उठाना चाहती है। एथनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल को सीमित करने का फैसला इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए जरूरी है एथनॉल
भारत लंबे समय से पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण को बढ़ावा दे रहा है। इसका उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर देश की निर्भरता कम करना और विदेशी मुद्रा की बचत करना है।
भारत बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में पेट्रोल में एथनॉल की हिस्सेदारी बढ़ाने से तेल आयात की जरूरत को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा एथनॉल देश में ही तैयार किया जा सकता है, जिससे घरेलू स्तर पर वैकल्पिक ईंधन की उपलब्धता बढ़ती है।
यही वजह है कि सरकार एथनॉल कार्यक्रम को रोकना नहीं चाहती। बल्कि मौजूदा परिस्थितियों में कच्चे माल के स्रोतों का संतुलन बदलने की कोशिश की जा रही है।
चीनी मिलों पर क्या होगा असर?
सरकार के इस फैसले का असर चीनी मिलों पर भी पड़ सकता है। जिन मिलों ने गन्ने के रस, चीनी सिरप या बी-हेवी शीरे से एथनॉल उत्पादन की क्षमता विकसित की है, उन्हें अपनी उत्पादन रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।
एथनॉल उत्पादन कई चीनी मिलों के लिए अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है। ऐसे में गन्ने से जुड़े स्रोतों से एथनॉल बिक्री पर प्रतिबंध या बदलाव मिलों की आय और उत्पादन योजना को प्रभावित कर सकता है।
दूसरी तरफ अगर चीनी का उत्पादन बढ़ता है और घरेलू बाजार में कीमतें स्थिर होती हैं, तो मिलों को चीनी बिक्री से लाभ मिल सकता है।
इसलिए आने वाले समय में चीनी मिलों को चीनी और एथनॉल उत्पादन के बीच नए तरीके से संतुलन बनाना होगा।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
सरकार के फैसले का सबसे बड़ा उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों में तेजी को नियंत्रित करना है।
अगर गन्ने का अधिक हिस्सा चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध होता है और उत्पादन में अपेक्षित सुधार आता है, तो बाजार में आपूर्ति बेहतर हो सकती है। इसका फायदा उपभोक्ताओं को मिल सकता है।
हालांकि, चीनी की कीमत सिर्फ एथनॉल नीति पर निर्भर नहीं करती। गन्ने का उत्पादन, चीनी मिलों की रिकवरी, मौसम, घरेलू मांग, निर्यात नीति, स्टॉक और बाजार की परिस्थितियां भी कीमतों को प्रभावित करती हैं।
इसलिए केवल एथनॉल नीति में बदलाव से चीनी के दाम तुरंत नीचे आ जाएंगे, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
सरकार के सामने इस समय दो महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं। पहला, घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराना और उसकी कीमतों में अनावश्यक तेजी रोकना। दूसरा, पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण के कार्यक्रम के लिए पर्याप्त एथनॉल की आपूर्ति बनाए रखना।
गन्ने से बनने वाले एथनॉल को सीमित करने के बाद अनाज आधारित एथनॉल की मांग बढ़ सकती है। लेकिन इससे खाद्य सुरक्षा और पशुचारे की उपलब्धता प्रभावित न हो, इसका ध्यान रखना भी जरूरी होगा।
इसलिए आने वाले समय में सरकार को चीनी, गन्ना, एथनॉल, खाद्य अनाज और ईंधन—इन सभी के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा।
फिलहाल एथनॉल खरीद नीति में यह बदलाव इस बात का संकेत है कि सरकार चीनी की घरेलू उपलब्धता और कीमतों को लेकर सतर्क है। गन्ने से एथनॉल बनाने के बजाय वैकल्पिक कच्चे माल के इस्तेमाल को बढ़ावा देकर सरकार एक तरफ चीनी उत्पादन के लिए गन्ना बचाना चाहती है, तो दूसरी तरफ देश के एथनॉल कार्यक्रम को भी जारी रखना चाहती है। आने वाले महीनों में इस फैसले का असर चीनी की कीमतों, चीनी मिलों की आय और एथनॉल बाजार पर कितना पड़ता है, इस पर सबकी नजर रहेगी।

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