23 महीने तक नहीं हिली सांसों के अलावा कुछ भी… फिर डिस्चार्ज के दिन जो हुआ, देखकर रो पड़े डॉक्टर!
रोहतक। कभी तेज दिमागी बुखार ने एक मासूम बच्चे को इस कदर अपनी चपेट में ले लिया था कि उसके हाथ-पैर तक हिलना बंद हो गए थे। वह बेहोशी की हालत में अस्पताल पहुंचा था और बार-बार दौरे पड़ रहे थे। हालत इतनी गंभीर थी कि उसकी जिंदगी बचाने के लिए उसे लगातार वेंटिलेटर और 100 प्रतिशत ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ रही थी। डॉक्टरों के सामने चुनौती बेहद बड़ी थी, लेकिन करीब दो साल तक चले इलाज, लगातार निगरानी, दवाओं, फिजियोथेरेपी और पोषण संबंधी देखभाल के बाद अब उसी बच्चे ने जिंदगी की ओर एक बड़ा कदम बढ़ाया है।
यह कहानी है आठ साल के दक्ष की, जो 5 अक्टूबर 2024 को पीजीआइएमएस के पीआइसीयू यानी पीकू में बेहद गंभीर हालत में भर्ती हुआ था। उस समय उसकी हालत देखकर परिवार के साथ-साथ चिकित्सकों के सामने भी बड़ी चुनौती थी। बच्चा बेहोश था, तेज दिमागी बुखार से जूझ रहा था और उसके शरीर में सामान्य गतिविधियां लगभग खत्म हो गई थीं। बीच-बीच में उसे दौरे भी पड़ रहे थे।
लेकिन सोमवार का दिन इस परिवार के लिए किसी नई शुरुआत से कम नहीं रहा। करीब 23 महीने तक अस्पताल में उपचार और निगरानी के बाद दक्ष को पीआइसीयू से उसके घर के लिए रवाना किया गया। अब वह अपने शरीर को हिला-डुला पा रहा है और उसकी स्थिति पहले की तुलना में स्थिर बताई गई है।
जब अस्पताल पहुंचा था दक्ष, हालत बेहद गंभीर थी
दक्ष जब पीजीआइएमएस के पीआइसीयू में पहुंचा था, तब उसकी हालत बेहद नाजुक थी। वह होश में नहीं था और उसे सांस लेने के लिए लगातार वेंटिलेटर तथा 100 प्रतिशत ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत थी। हाथ-पैरों में भी कोई सामान्य गतिविधि नहीं थी।
बीच-बीच में दौरे पड़ने के कारण स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाती थी। ऐसे गंभीर मरीज को लंबे समय तक उपचार देना अपने आप में बड़ी चिकित्सकीय चुनौती होती है। बच्चे की हालत को देखते हुए पीआइसीयू प्रभारी डॉ. कुंदन मित्तल और उनकी टीम ने लगातार उसकी निगरानी शुरू की।
इलाज के दौरान केवल दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय बच्चे की जरूरत के अनुसार फिजियोथेरेपी और पोषण संबंधी सहयोग को भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया।
धीरे-धीरे आने लगा सुधार
दक्ष की स्थिति में सुधार अचानक नहीं आया। करीब दो साल के लंबे इलाज के दौरान उसकी हालत में धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिला। चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ ने लगातार उसकी स्थिति पर नजर रखी।
दवाओं के साथ फिजियोथेरेपी के जरिए उसके शरीर की गतिविधियों को बेहतर बनाने की कोशिश की गई। साथ ही उसकी पोषण संबंधी जरूरतों पर भी विशेष ध्यान दिया गया।
लंबे समय तक गंभीर अवस्था में रहने वाले मरीजों के लिए लगातार देखभाल बेहद महत्वपूर्ण होती है। दक्ष के मामले में भी यही निरंतरता दिखाई दी। परिवार अस्पताल में डटा रहा और चिकित्सकीय टीम ने भी इलाज की प्रक्रिया को लगातार जारी रखा।
अब करीब 23 महीने बाद वह अपने शरीर को हिला-डुला पा रहा है और उसकी स्थिति इतनी स्थिर हो गई कि डॉक्टरों ने उसे घर भेजने का निर्णय लिया।
डिस्चार्ज के समय भावुक हो गया पूरा पीआइसीयू
दक्ष के डिस्चार्ज का दिन पीजीआइएमएस के पीआइसीयू के लिए भी सामान्य दिन नहीं था। करीब दो साल तक बच्चे को अपने सामने देखने वाले डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ के लिए वह मरीज से कहीं ज्यादा परिवार के सदस्य जैसा बन चुका था।
सोमवार को जब दक्ष को घर के लिए रवाना किया गया तो पीआइसीयू का माहौल भावुक हो गया। चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की आंखों में खुशी के आंसू थे।
जिस बच्चे को कभी गंभीर हालत में वेंटिलेटर और 100 प्रतिशत ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत थी, उसे अब अपने परिवार के साथ घर जाते देखना चिकित्सकों के लिए भी बेहद संतोष का पल था।
कुलपति भी पहुंचे, टीम का बढ़ाया हौसला
दक्ष के डिस्चार्ज के समय कुलपति डॉ. एचके अग्रवाल भी पीआइसीयू पहुंचे। उन्होंने चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ से मुलाकात कर उनका हौसला बढ़ाया।
उन्होंने कहा कि किसी गंभीर मरीज को उपचार के बाद स्वस्थ होकर अपने घर जाते देखना चिकित्सक के लिए सबसे बड़ी संतुष्टि होती है। उन्होंने डॉ. कुंदन मित्तल और उनकी टीम के लगातार प्रयासों की सराहना की।
इसके साथ ही उन्होंने बच्चे के माता-पिता के जज्बे को भी महत्वपूर्ण बताया, जिन्होंने करीब दो वर्षों तक अस्पताल में रहकर अपने बेटे का साथ नहीं छोड़ा।
पिता ने टैक्सी चलाना छोड़ा, अस्पताल ही बन गया दूसरा घर
दक्ष के पिता सोमबीर दहिया गांव गढ़ी सिसाना के रहने वाले हैं और दिल्ली में टैक्सी चलाते हैं। परिवार में वही अकेले कमाने वाले हैं। बेटे की गंभीर बीमारी के बाद उन्हें अपना काम छोड़ना पड़ा और करीब दो साल तक पीजीआइएमएस में रहकर बेटे की देखभाल करनी पड़ी।
उनकी पत्नी गृहिणी हैं और वह भी लगातार बच्चे के सिरहाने बैठी रहीं। इस दौरान परिवार के लिए अस्पताल ही उनका घर बन गया।
सोमबीर ने भावुक होकर कहा कि पीजीआइएमएस पिछले दो वर्षों से उनके लिए दूसरे घर जैसा बन गया था। उन्होंने सरकारी अस्पताल में मिले इलाज और देखभाल की जमकर सराहना की।
उनका कहना था कि उन्होंने पहले कभी सरकारी अस्पताल में मरीज की इतनी अच्छी देखभाल होते हुए नहीं देखी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि दक्ष का इलाज किसी निजी अस्पताल में चल रहा होता तो शायद परिवार की पूरी जमा पूंजी इलाज में खत्म हो जाती।
उन्होंने डॉ. कुंदन मित्तल और पूरी टीम के प्रति आभार जताते हुए कहा कि डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ उनके लिए भगवान से कम नहीं रहे।
इलाज के साथ परिवार की आर्थिक मदद की भी कोशिश
डॉ. कुंदन मित्तल ने बताया कि दक्ष के पिता परिवार में अकेले कमाने वाले हैं और बेटे के लंबे इलाज के कारण वह काम नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में परिवार की आर्थिक स्थिति भी चुनौतीपूर्ण हो गई थी।
उन्होंने बताया कि अस्पताल की टीम ने अपनी ओर से परिवार की आर्थिक मदद करने का भी प्रयास किया।
डॉ. मित्तल के अनुसार, बच्चे की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आया। अब उसकी हालत स्थिर है और माता-पिता घर पर उसकी देखभाल करने की स्थिति में हैं। हालांकि आगे भी बच्चे की नियमित फॉलोअप के दौरान निगरानी की जाएगी।
जन्मदिन भी पूरे वार्ड ने मिलकर मनाया
दक्ष के लिए पीआइसीयू केवल इलाज की जगह नहीं रहा। करीब दो साल तक यहां रहने के कारण डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ का उससे एक भावनात्मक रिश्ता बन गया था।
नर्सिंग स्टाफ के अनुसार परिवार के खुशी के मौकों पर अस्पताल के कर्मचारी घर से खाना लाकर बच्चे के परिजनों के साथ साझा करते थे। दक्ष का जन्मदिन भी पूरे वार्ड ने मिलकर मनाया।
लंबे समय तक अस्पताल में रहने के कारण स्टाफ उसकी छोटी-छोटी गतिविधियों से भी परिचित हो गया था। इसलिए सोमवार को जब वह घर के लिए रवाना हुआ तो यह विदाई सभी के लिए भावुक कर देने वाली थी।
पैर छूकर जताया आभार, काटा केक
दक्ष के घर जाने के मौके पर उसके पिता ने डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के पैर छूकर उनका आभार जताया। परिवार और अस्पताल के कर्मचारियों के बीच भावनात्मक माहौल बन गया।
इस अवसर पर केक काटा गया और मिठाई बांटी गई। परिवार की ओर से अस्पताल के स्टाफ को स्मृति चिह्न भी भेंट किए गए।
करीब दो साल पहले जिस बच्चे को बेहद गंभीर अवस्था में पीआइसीयू लाया गया था, उसी बच्चे को अब अपने परिवार के साथ घर जाते देखना वहां मौजूद हर व्यक्ति के लिए यादगार पल बन गया।
डॉक्टरों और परिवार की मेहनत की कहानी
दक्ष की कहानी सिर्फ एक मरीज के इलाज की कहानी नहीं है, बल्कि यह लंबे समय तक चलने वाले उपचार में डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और परिवार के धैर्य की भी कहानी है।
एक ओर चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ ने लगातार बच्चे की निगरानी और उपचार किया, वहीं दूसरी ओर उसके माता-पिता ने भी करीब दो वर्षों तक अस्पताल में रहकर उसका साथ नहीं छोड़ा।
अब दक्ष घर लौट चुका है। आगे उसकी स्थिति पर नियमित फॉलोअप के जरिए नजर रखी जाएगी। परिवार के लिए यह वापसी उम्मीद से भरी है और पीजीआइएमएस की टीम के लिए करीब दो साल की मेहनत के बाद मिली एक भावुक और यादगार सफलता।
दक्ष के घर लौटने के साथ परिवार को एक बार फिर सामान्य जीवन की उम्मीद मिली है। जिस अस्पताल में दो साल तक चिंता, इंतजार और इलाज का दौर चला, वहीं से सोमवार को बच्चे की विदाई खुशी और भावनाओं से भरे माहौल में हुई।

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