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सच हो रही मुस्लिम नेता की भविष्यवाणी, बुर्का बैन के बाद ही क्यों हिंसा से जल उठे इटली-फ्रांस?

 


यूरोप के दो बड़े देशों फ्रांस और इटली में 17 अक्टूबर 2026 को हुए प्रदर्शनों ने एक बार फिर महंगाई, बढ़ती जीवन-यापन लागत, शिक्षा व्यवस्था, सार्वजनिक सेवाओं और सरकार की नीतियों को लेकर जनता के असंतोष को सामने ला दिया। फ्रांस में बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शनों के दौरान कई शहरों में हालात बिगड़ गए। दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट से लेकर आगजनी और पुलिस के साथ झड़प तक की घटनाएं सामने आईं। दूसरी ओर इटली के मिलान में भी महंगाई और युद्धों के विरोध में निकली रैली बाद में हिंसक हो गई।

इन घटनाओं के बीच संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल-नहयान की वर्ष 2017 की यूरोप में आतंकवाद और कट्टरपंथ को लेकर की गई चेतावनी फिर चर्चा में आ गई है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि आज के प्रदर्शनों को सीधे उस पुरानी चेतावनी का परिणाम बताने का कोई प्रमाण नहीं है। मौजूदा घटनाओं के तत्काल कारणों में महंगाई, शिक्षा, सार्वजनिक सेवाओं और सरकार की नीतियों को लेकर असंतोष प्रमुख दिखाई देता है। हिंसा में शामिल लोगों और समूहों की भूमिका अलग से जांच का विषय है।

फ्रांस में आधे मिलियन से ज्यादा लोग सड़कों पर

17 अक्टूबर को फ्रांस के कई शहरों में बड़े प्रदर्शन हुए। रॉयटर्स के मुताबिक, फ्रांस के गृह मंत्री लॉरां नूनेज ने देशभर में प्रदर्शनकारियों की संख्या करीब 5.5 लाख बताई। कई जगहों पर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ स्थानों पर छोटे और हिंसक समूहों ने सार्वजनिक इमारतों, दुकानों और पुलिस को निशाना बनाया।

रिपोर्ट के मुताबिक, लिमोज में ऐतिहासिक सिटी हॉल में आग लगा दी गई, जबकि मार्सेय में प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने नगर भवन में प्रवेश कर वहां तोड़फोड़ की। ल्योन में पर्यटन कार्यालय को भी आग के हवाले किए जाने की जानकारी सामने आई। पेरिस समेत कई शहरों में दुकानों को नुकसान पहुंचा और कुछ स्थानों पर लूटपाट हुई।

हालात को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। 18 अक्टूबर की रॉयटर्स रिपोर्ट के अनुसार, हिंसा के बाद देशभर में करीब 1,800 गिरफ्तारियां हुईं और 500 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए। पेरिस में ही रिकॉर्ड संख्या में गिरफ्तारियां दर्ज की गईं।

आखिर इतना गुस्सा क्यों?

फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत केवल एक मुद्दे से नहीं हुई। रिपोर्टों के अनुसार, आंदोलन की शुरुआत स्कूलों की खराब स्थिति और शिक्षकों की कमी को लेकर छात्र असंतोष से हुई थी। धीरे-धीरे इसमें महंगाई, असमानता, सरकारी खर्च में कटौती और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति जैसे मुद्दे भी जुड़ते गए। इसके बाद अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समूहों ने इसे व्यापक आंदोलन का रूप दे दिया।

यानी सड़कों पर दिखाई दे रहा गुस्सा केवल कीमतों को लेकर नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता, सरकारी नीतियां और आम लोगों की आर्थिक परेशानियां भी इस असंतोष का हिस्सा हैं।

यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों के साथ सड़कों पर उतरे, जबकि कुछ छोटे समूहों द्वारा की गई हिंसा ने पूरे आंदोलन की तस्वीर बदल दी।

हिंसा के बाद सरकार का सख्त रुख

फ्रांस सरकार ने हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई का संकेत दिया है। अधिकारियों ने हिंसक घटनाओं के लिए कट्टरपंथी वामपंथी समूहों और अपराधियों को जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि, प्रदर्शन में शामिल हर व्यक्ति को हिंसा में शामिल मानना उचित नहीं है, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आर्थिक और सामाजिक मांगें लेकर प्रदर्शन कर रहे थे।

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी बड़े जनप्रदर्शन में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी और हिंसा करने वाले समूह अलग-अलग हो सकते हैं। फ्रांस में भी उपलब्ध रिपोर्टें इसी तरह की तस्वीर दिखाती हैं।

मिलान में भी बिगड़ा माहौल

फ्रांस के साथ ही इटली में भी 17 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन हुए। मिलान के मशहूर पियाजा डुओमो इलाके में महंगाई और युद्धों के विरोध में प्रदर्शन आयोजित किया गया था। शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन बाद में नकाबपोश लोगों के एक समूह ने पुलिस पर पत्थर और अन्य वस्तुएं फेंकनी शुरू कर दीं।

इसके बाद पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। दुकानों को बंद करना पड़ा और शहर के प्रमुख पर्यटन क्षेत्र से लोगों को हटाया गया। एपी के मुताबिक, कम से कम दो पुलिस अधिकारी घायल हुए और करीब 50 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।

मिलान की घटना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि जिस इलाके में प्रदर्शन हुआ, वह आमतौर पर पर्यटकों और खरीदारों से भरा रहता है। हिंसा के कारण कारोबार प्रभावित हुआ और शहर के मध्य हिस्से में सामान्य गतिविधियां कुछ समय के लिए बाधित हो गईं।

इटली में बुर्का-नकाब पर नया फैसला भी चर्चा में

इटली में यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की सरकार ने सितंबर में स्कूलों को लेकर नए नियमों को मंजूरी दी थी।

24 सितंबर को इतालवी सरकार ने स्कूलों में चेहरा पूरी तरह ढकने वाले बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध तथा कुछ कक्षाओं में विदेशी विद्यार्थियों की संख्या सीमित करने से जुड़े नियमों को मंजूरी दी। सरकार ने इन कदमों को शिक्षा व्यवस्था में बेहतर एकीकरण और इतालवी भाषा सीखने को बढ़ावा देने से जोड़ा है।

नए नियमों के तहत प्राथमिक स्कूल की कुछ कक्षाओं में ऐसे विद्यार्थियों की संख्या 30 प्रतिशत तक सीमित करने का प्रावधान है जो निर्धारित भाषा और जन्म/शिक्षा संबंधी मानदंडों के तहत आते हैं। स्कूल परिसर में चेहरा ढकने वाले परिधानों पर 1,000 यूरो तक का जुर्माना भी प्रस्तावित है।

सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य अलग-अलग समुदायों के बीच बेहतर एकीकरण और भाषा सीखने में मदद करना है। दूसरी ओर, आलोचकों का तर्क है कि इससे स्कूलों और प्रवासी परिवारों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

क्या मिलान की हिंसा का इस फैसले से सीधा संबंध है?

यहां सबसे जरूरी बात यह है कि सिर्फ समय के मेल के आधार पर दोनों घटनाओं को जोड़ना सही नहीं होगा।

इटली में स्कूलों से जुड़े नियम 24 सितंबर को मंजूर किए गए थे, जबकि मिलान में हिंसा 17 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान हुई। लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों में मिलान की हिंसा का तत्काल कारण प्रदर्शन के दौरान पुलिस और कुछ नकाबपोश प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव बताया गया है। प्रदर्शन का व्यापक एजेंडा महंगाई, जीवन-यापन की लागत और युद्धों का विरोध था।

इसलिए यह कहना कि स्कूलों में बुर्का-नकाब प्रतिबंध के कारण ही मिलान में हिंसा हुई, उपलब्ध प्रमाणों से साबित नहीं होता।

नौ साल पुरानी शेख अब्दुल्ला की चेतावनी फिर क्यों याद आई?

इन घटनाओं के बीच 2017 में दिए गए शेख अब्दुल्ला बिन जायद के बयान फिर चर्चा में हैं। मई 2017 में रियाद में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने यूरोप से उभरने वाले कट्टरपंथ और आतंकवाद को लेकर चिंता व्यक्त की थी।

संयुक्त अरब अमीरात की आधिकारिक समाचार एजेंसी WAM के अनुसार, उस कार्यक्रम में शेख अब्दुल्ला ने कहा था कि आतंकवाद का कोई धर्म या राष्ट्रीयता नहीं होती और यह भी रेखांकित किया था कि यूरोपीय देशों से कुछ चरमपंथी सामने आए हैं। कार्यक्रम का मुख्य फोकस सोशल मीडिया, कट्टरपंथ और आतंकवादी संगठनों द्वारा युवाओं की भर्ती जैसे मुद्दों पर था।

बाद की कुछ रिपोर्टों में उनके उस समय के बयानों के और अधिक विस्तृत हिस्से उद्धृत किए गए, जिनमें यूरोप में निर्णय लेने और कट्टरपंथ से निपटने की नीतियों को लेकर चिंता जताई गई थी।

यही वजह है कि फ्रांस और इटली की मौजूदा हिंसक घटनाओं के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में उनकी पुरानी चेतावनी फिर सामने आ रही है।

लेकिन प्रदर्शन और आतंकवाद को एक मानना सही नहीं

यूरोप में मौजूदा घटनाओं को समझने के लिए यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार की नीतियों, महंगाई या सार्वजनिक सेवाओं के खिलाफ प्रदर्शन अपने आप में आतंकवाद या कट्टरपंथ नहीं होता।

फ्रांस में सैकड़ों हजार लोग प्रदर्शन में शामिल हुए, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार हिंसा कुछ समूहों और स्थानों तक सीमित रही। इसी तरह मिलान में भी प्रदर्शन की शुरुआत शांतिपूर्ण बताई गई थी और बाद में कुछ लोगों के हिंसक होने से स्थिति बिगड़ी।

इसलिए मौजूदा संकट को केवल सुरक्षा या कट्टरपंथ के चश्मे से देखने के बजाय आर्थिक और सामाजिक कारणों को भी समझना जरूरी है।

यूरोप के सामने बढ़ती जीवन-यापन लागत की चुनौती

फ्रांस और इटली की घटनाओं में एक समान बात साफ दिखाई देती है—लोगों की आर्थिक चिंता।

जब आम लोगों को लगता है कि उनकी आय की तुलना में जीवन-यापन की लागत बढ़ रही है, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाएं कमजोर हो रही हैं और सरकार उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही है, तो सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है।

यही असंतोष यदि लंबे समय तक बना रहे तो शांतिपूर्ण आंदोलन भी बड़े राजनीतिक दबाव में बदल सकते हैं। और यदि उनमें हिंसक या अराजक समूह शामिल हो जाएं तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।

यूरोप के लिए आगे की राह क्या?

फ्रांस और इटली की घटनाएं यूरोपीय सरकारों के सामने दोहरी चुनौती रखती हैं। पहली चुनौती आर्थिक और सामाजिक है—महंगाई, शिक्षा, सार्वजनिक सेवाओं और रोजगार जैसे मुद्दों पर जनता का भरोसा बनाए रखना। दूसरी चुनौती कानून-व्यवस्था की है—शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करते हुए हिंसा, आगजनी और लूटपाट को रोकना।

फ्रांस में 17 अक्टूबर की हिंसा ने दिखाया कि बड़ी संख्या में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के बीच छोटे हिंसक समूह भी पूरे आंदोलन का स्वरूप बदल सकते हैं। वहीं मिलान की घटना ने यह दिखाया कि आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को लेकर निकला प्रदर्शन भी अचानक कानून-व्यवस्था के संकट में बदल सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यूरोप की सरकारें जनता के आर्थिक और सामाजिक असंतोष को समय रहते कम कर पाएंगी? क्योंकि अगर महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं और राजनीतिक अविश्वास का दबाव बढ़ता रहा, तो आने वाले महीनों में सड़कों पर असंतोष की राजनीति और तेज हो सकती है।

और इसी वजह से 2017 की पुरानी चेतावनियां भले ही आज की घटनाओं का सीधा कारण न हों, लेकिन वे यूरोप के सामने मौजूद एक पुराने सवाल की याद जरूर दिलाती हैं—सामाजिक असंतोष, कट्टरपंथ और सुरक्षा के बीच संतुलन आखिर कैसे बनाया जाए?

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