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अमेरिका की 100% टैरिफ धमकी के बीच भारत का बड़ा रुख, रूस से तेल पर क्यों नहीं बदला फैसला?



रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिका का दबाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका में हाल ही में ऐसा कानून लागू हुआ है, जिसके तहत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति को मिल गई है। भारत रूस से कच्चे तेल के बड़े खरीदारों में शामिल है, ऐसे में इस कानून को लेकर देश में आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, अभी यह कहना सही नहीं होगा कि भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो चुका है। नए कानून ने अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसा शुल्क लगाने का अधिकार दिया है और इसके वास्तविक इस्तेमाल का फैसला अलग से होना है।

इसी बीच केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रूस से कच्चे तेल की खरीद को अचानक बंद करने की संभावना पर भारत की स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए रूस से तेल खरीदना एक ऐसा फैसला है, जिसे केवल एक देश के दबाव के आधार पर तुरंत बदला नहीं जा सकता। उनके मुताबिक भारत को अपने 1.4 अरब से अधिक नागरिकों की ऊर्जा जरूरतों और कीमतों को ध्यान में रखना होगा।

रूस से तेल खरीद बंद करना क्यों आसान नहीं?

वित्त मंत्री ने हाल ही में BusinessLine Changemaker Awards के दौरान कहा कि अगर भारत अचानक रूस से तेल खरीदना बंद करके दूसरे देशों से तेल खरीदने लगे, तो उपलब्ध वैश्विक तेल आपूर्ति का एक हिस्सा और अधिक दबाव में आ सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने की आशंका बन सकती है।

सीतारमण के अनुसार, भारत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल खरीदता है और आगे भी उपलब्धता, कीमत और भारतीय रिफाइनरियों की जरूरतों के आधार पर स्रोतों का चुनाव करता रहेगा।

यानी सरकार के सामने केवल रूस से तेल खरीदने या नहीं खरीदने का सवाल नहीं है। इसके साथ यह भी देखना होगा कि अगर रूसी कच्चे तेल की जगह दूसरे स्रोतों से तेल लिया जाता है तो उसकी कीमत कितनी होगी, क्या वह भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त होगा और इसका असर देश के पेट्रोल-डीजल बाजार पर कितना पड़ेगा।

1.4 अरब भारतीयों की ऊर्जा जरूरत का सवाल

वित्त मंत्री ने अपने बयान में भारत के आम नागरिकों की ऊर्जा जरूरत को प्राथमिकता देने की बात कही है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं में शामिल है और घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है।

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल सरकारी तेल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव परिवहन लागत, माल ढुलाई, औद्योगिक उत्पादन और कई अन्य क्षेत्रों पर पड़ सकता है।

यही कारण है कि भारत अपनी तेल खरीद को एक ही देश तक सीमित नहीं रखता। सरकार लगातार अलग-अलग देशों से उपलब्ध तेल की कीमत और आपूर्ति की स्थिति का आकलन करती रहती है।

भारतीय रिफाइनरियों के लिए भी जरूरी है कच्चे तेल की गुणवत्ता

रूस से तेल खरीद के मुद्दे में केवल कीमत ही एक कारक नहीं है। कच्चे तेल की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होती है। अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाले कच्चे तेल में घनत्व और सल्फर की मात्रा अलग हो सकती है।

सीतारमण ने भी इस बात पर जोर दिया कि भारतीय रिफाइनरियां एक निश्चित प्रकार के कच्चे तेल को संसाधित करने के लिए अनुकूलित हैं। यदि अचानक ऐसे तेल की ओर जाना पड़े जिसे मौजूदा रिफाइनरियों में आसानी से संसाधित नहीं किया जा सकता, तो तकनीकी बदलाव और अतिरिक्त लागत की जरूरत पड़ सकती है।

इसलिए रूस से तेल खरीद में बदलाव का सवाल केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। इसका संबंध रिफाइनिंग क्षमता, तेल की उपलब्धता, अंतरराष्ट्रीय कीमत और घरेलू ऊर्जा सुरक्षा से भी है।

अमेरिका ने 100 प्रतिशत तक टैरिफ का रास्ता खोला

रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी दबाव का नया चरण सितंबर 2026 में सामने आया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 पर हस्ताक्षर किए। इस कानून के तहत रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति को दी गई है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। कानून लागू होने का मतलब यह नहीं है कि भारत के सभी अमेरिकी निर्यात पर तुरंत 100 प्रतिशत शुल्क लग गया है। कानून राष्ट्रपति को इस तरह के शुल्क लगाने का अधिकार देता है। किन देशों पर और कितनी दर से कार्रवाई की जाएगी, यह अमेरिकी प्रशासन के आगे के फैसलों पर निर्भर करेगा।

यही वजह है कि भारत सरकार फिलहाल इस कानून के विवरण और संभावित प्रभावों का अध्ययन कर रही है।

पीयूष गोयल ने भी दिया बड़ा अपडेट

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने 21 सितंबर को कहा था कि भारत अमेरिकी कानून के विवरण का अध्ययन कर रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि कानून के सभी पहलुओं को समझने के बाद ही सरकार इस पर आगे की प्रतिक्रिया देगी।

गोयल के बयान से यह स्पष्ट है कि भारत सरकार ने अभी किसी अंतिम नीति बदलाव की घोषणा नहीं की है। सरकार यह आकलन कर रही है कि अमेरिकी कानून का भारतीय निर्यात, ऊर्जा खरीद और भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर क्या संभावित प्रभाव पड़ सकता है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका भारत के लिए एक बड़ा निर्यात बाजार है। यदि रूसी तेल खरीद को लेकर अमेरिका अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में अपने उत्पाद बेचने की लागत बढ़ सकती है।

भारत के सामने दो तरफ की चुनौती

रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर भारत के सामने एक साथ दो आर्थिक चुनौतियां दिखाई दे रही हैं। पहली चुनौती ऊर्जा सुरक्षा की है और दूसरी निर्यात बाजार की।

एक तरफ भारत को बड़ी आबादी के लिए पर्याप्त और अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी कीमत पर ऊर्जा उपलब्ध करानी है। दूसरी तरफ अमेरिका जैसे महत्वपूर्ण बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी बनाए रखना जरूरी है।

अगर भारत अचानक रूस से तेल खरीद में बड़ी कटौती करता है, तो उसे वैकल्पिक स्रोतों से अतिरिक्त तेल खरीदना पड़ सकता है। इससे कीमत और आपूर्ति से जुड़े सवाल उठ सकते हैं। वहीं अगर भारत रूस से तेल खरीद जारी रखता है और अमेरिका इसके जवाब में अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो भारतीय निर्यातकों पर दबाव पड़ सकता है।

यही संतुलन फिलहाल भारत की नीति के केंद्र में दिखाई दे रहा है।

भारत का तेल आयात पहले ही बदल रहा है

हालांकि भारत ने रूस से तेल खरीद पूरी तरह बंद करने की घोषणा नहीं की है, लेकिन हालिया आंकड़ों में रूसी कच्चे तेल के आयात में बदलाव दिखाई दिया है।

Business Today की रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात जुलाई की तुलना में 16.5 प्रतिशत घटकर करीब 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा। इसी अवधि में पश्चिम एशिया से आने वाली आपूर्ति में वृद्धि हुई। रिपोर्ट में Kpler के प्रारंभिक आंकड़ों के हवाले से सितंबर में रूसी तेल आयात में और कमी की संभावना भी बताई गई है।

इससे संकेत मिलता है कि भारत का तेल आयात बाजार परिस्थितियों के अनुसार पहले से ही अलग-अलग स्रोतों के बीच बदलता रहा है।

यूक्रेन की ओर से भी भारत पर दबाव

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से यूक्रेन लगातार उन देशों से रूसी ऊर्जा खरीद कम करने की अपील करता रहा है, जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदते हैं। भारत भी इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा रहा है।

भारत का कहना रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद का उद्देश्य देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है। नई दिल्ली ने कई मौकों पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं के हित को प्राथमिकता देने की बात कही है।

वहीं अमेरिका और उसके सहयोगी रूस की ऊर्जा आय को युद्ध से जोड़कर देखते हैं और रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए खरीदार देशों को भी प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह दोनों दृष्टिकोणों के बीच अंतर को दिखाता है।

क्या भारत रूस से तेल खरीदना पूरी तरह बंद करेगा?

फिलहाल भारत सरकार की ओर से रूस से कच्चे तेल की खरीद पूरी तरह बंद करने का कोई फैसला घोषित नहीं किया गया है। वित्त मंत्री के हालिया बयान से भी यही संकेत मिलता है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीद जारी रखेगा।

साथ ही, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने साफ किया है कि भारत नए अमेरिकी कानून का अध्ययन कर रहा है। इसलिए आने वाले समय में भारत का रुख अमेरिकी प्रशासन के फैसलों, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, रूसी तेल की उपलब्धता और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता जैसे कई कारकों पर निर्भर कर सकता है।

पेट्रोल-डीजल की कीमत पर क्या होगा असर?

आम लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि रूस से तेल खरीद को लेकर पैदा हुए इस अंतरराष्ट्रीय दबाव का असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ेगा या नहीं।

इसका सीधा जवाब अभी देना मुश्किल है। पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमत केवल कच्चे तेल की खरीद कीमत से तय नहीं होती। इसमें रिफाइनिंग, परिवहन, टैक्स, विनिमय दर और अन्य लागत भी शामिल होती हैं।

हालांकि, अगर वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमत में बड़ा और लगातार उछाल आता है, तो इसका असर भारत की ऊर्जा लागत पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि भारत अलग-अलग स्रोतों से पर्याप्त तेल प्रतिस्पर्धी कीमत पर हासिल करता रहता है, तो दबाव सीमित रह सकता है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल भारत ने अमेरिका के नए कानून पर कोई अंतिम प्रतिक्रिया या रूस से तेल खरीद बंद करने का निर्णय नहीं लिया है। सरकार अमेरिकी कानून के प्रावधानों और उसके संभावित आर्थिक प्रभावों का अध्ययन कर रही है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बयान ने यह जरूर स्पष्ट कर दिया है कि भारत के लिए रूस से तेल खरीद का फैसला केवल कूटनीतिक दबाव के आधार पर नहीं देखा जाएगा। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक तेल आपूर्ति, भारतीय रिफाइनरियों की जरूरत, घरेलू उपभोक्ताओं पर संभावित असर और भारत के व्यापारिक हित सभी महत्वपूर्ण होंगे।

इस पूरे मामले में अगला बड़ा घटनाक्रम इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की मिली शक्ति का इस्तेमाल किस तरह करते हैं और भारत उस संभावित कदम के जवाब में अपनी ऊर्जा तथा व्यापार नीति में क्या बदलाव करता है। फिलहाल भारत का आधिकारिक रुख यही है कि वह स्थिति का आकलन कर रहा है और देश की ऊर्जा जरूरतों तथा आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर आगे का फैसला करेगा।

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