Breaking News

8 घंटे सोने के बाद भी क्यों रहती है थकान? डॉक्टर ने बताई वो वजह, जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं!



नई दिल्ली। अच्छी नींद को अक्सर लोग सिर्फ इस बात से जोड़कर देखते हैं कि उन्होंने रात में कितने घंटे बिस्तर पर बिताए। आम धारणा है कि हर व्यक्ति को रोजाना आठ घंटे सोना चाहिए। लेकिन क्या वास्तव में सभी लोगों के लिए आठ घंटे की नींद का नियम लागू होता है? अगर कोई व्यक्ति पर्याप्त समय सोने के बावजूद सुबह उठकर तरोताजा महसूस नहीं करता और दिनभर थकान, सुस्ती या नींद से परेशान रहता है, तो इसके पीछे सिर्फ कम नींद ही कारण नहीं हो सकता।

नींद विशेषज्ञ और सर गंगाराम अस्पताल के स्लीप मेडिसिन विभाग से जुड़े डॉ. संजय मनचंदा ने नींद से संबंधित कई आम धारणाओं और समस्याओं पर विस्तार से बात की है। उनके मुताबिक नींद को समझने के लिए सिर्फ घंटों की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि व्यक्ति कितने नियमित समय पर सोता और जागता है, रात में उसकी नींद कितनी बार टूटती है और नींद के अलग-अलग चरणों में उसका शरीर कितना समय बिताता है।

वैज्ञानिक संस्थाओं के अनुसार भी नींद की जरूरत उम्र के साथ बदलती है। मसलन, वयस्कों को आम तौर पर नियमित रूप से कम से कम सात घंटे की नींद लेने की सलाह दी जाती है, जबकि बच्चों और किशोरों को इससे अधिक नींद की जरूरत होती है।

क्या हर व्यक्ति के लिए आठ घंटे की नींद जरूरी है?

डॉ. मनचंदा के अनुसार आठ घंटे को ऐसा निश्चित आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए जो हर व्यक्ति पर बिल्कुल समान रूप से लागू हो। अलग-अलग लोगों की नींद की जरूरत अलग हो सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह भी नहीं है कि नींद के घंटों को महत्वहीन समझ लिया जाए।

अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन के मुताबिक स्वस्थ वयस्कों को नियमित रूप से सात या उससे अधिक घंटे की नींद लेनी चाहिए। वहीं अमेरिकी स्वास्थ्य संस्थान एनएचएलबीआई और सीडीसी भी उम्र के अनुसार पर्याप्त नींद लेने पर जोर देते हैं।

इसलिए किसी व्यक्ति के लिए छह, सात, आठ या नौ घंटे की नींद पर्याप्त है या नहीं, इसे उसकी उम्र, स्वास्थ्य, दिनचर्या और दिन के दौरान महसूस होने वाली नींद या थकान के साथ समझना चाहिए।

डॉ. मनचंदा नींद के संदर्भ में तीन महत्वपूर्ण पहलुओं की ओर ध्यान दिलाते हैं—कितनी देर सोए, कितनी नियमितता से सोए और नींद की गुणवत्ता कैसी रही।

उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति एक दिन रात 11 बजे सोता है और दूसरे दिन रात दो बजे, तो केवल कुल घंटों की गणना से उसकी नींद की पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी। लगातार बदलता हुआ सोने-जागने का समय शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित कर सकता है।

रात की नींद एक जैसी नहीं होती

हम पूरी रात एक ही तरह की नींद में नहीं रहते। नींद अलग-अलग चरणों में बंटी होती है और रात के दौरान शरीर इन चरणों के चक्र से गुजरता है।

एनएचएलबीआई के मुताबिक नींद मुख्य रूप से REM और Non-REM चरणों में होती है। Non-REM नींद के भी अलग चरण होते हैं, जिनमें गहरी नींद या स्लो-वेव स्लीप शामिल है। REM यानी रैपिड आई मूवमेंट नींद के दौरान दिमाग काफी सक्रिय रहता है और सपने अक्सर इसी चरण में आते हैं।

गहरी नींद शरीर की रिकवरी और विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में भूमिका निभाती है। बच्चों और किशोरों में गहरी नींद के दौरान विकास से जुड़े हार्मोन का स्राव भी महत्वपूर्ण होता है।

इसका मतलब है कि सिर्फ यह कहना कि कोई व्यक्ति आठ घंटे बिस्तर पर रहा, उसकी नींद की गुणवत्ता के बारे में पूरी जानकारी नहीं देता। यदि रात में बार-बार नींद टूटती रही या सांस लेने में रुकावट आती रही, तो व्यक्ति पर्याप्त समय बिस्तर पर रहने के बाद भी तरोताजा महसूस नहीं कर सकता।

उम्र के साथ बदलती है नींद की जरूरत

नींद की जरूरत उम्र के अनुसार बदलती है। नवजात शिशुओं को वयस्कों की तुलना में काफी अधिक नींद चाहिए। सीडीसी के अनुसार जन्म से तीन महीने तक के बच्चों को सामान्यतः 14 से 17 घंटे तक नींद की जरूरत हो सकती है। चार से 12 महीने के शिशुओं के लिए यह अवधि 12 से 16 घंटे तक हो सकती है।

छोटे बच्चों के लिए भी नींद की जरूरत काफी अधिक रहती है। छह से 12 साल के बच्चों के लिए सामान्य सिफारिश नौ से 12 घंटे की नींद की है, जबकि 13 से 17 साल के किशोरों के लिए आठ से 10 घंटे की नींद बताई गई है। वयस्कों के लिए सामान्य तौर पर सात या उससे अधिक घंटे की नींद की सलाह दी जाती है।

किशोरों में समस्या यह होती है कि उनकी जैविक घड़ी और स्कूल की शुरुआती समय-सारणी के बीच अंतर हो सकता है। देर से नींद आने और सुबह जल्दी स्कूल जाने की वजह से कई किशोर पर्याप्त नींद नहीं ले पाते।

उम्र बढ़ने के साथ भी नींद का पैटर्न बदलता है। बुजुर्गों में रात की नींद अपेक्षाकृत हल्की या बीच-बीच में टूटने वाली हो सकती है और कुछ लोगों को दिन में भी नींद आ सकती है।

रात में सोने के बाद भी दिनभर थकान क्यों?

अगर कोई व्यक्ति पर्याप्त समय सोने के बावजूद दिनभर थका रहता है, तो उसे अपनी नींद की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए। लगातार दिन में नींद आना, सुबह उठने के बाद भी तरोताजा महसूस न करना या बैठे-बैठे अचानक झपकी आने जैसी स्थितियां किसी नींद संबंधी समस्या की ओर संकेत कर सकती हैं।

एनएचएलबीआई के अनुसार यदि व्यक्ति दिन में अत्यधिक नींद महसूस करता है, सुबह तरोताजा नहीं उठता या नींद से जुड़ी परेशानी लगातार बनी रहती है, तो डॉक्टर से इस बारे में चर्चा करना उचित है।

इसके पीछे अनिद्रा, नींद में सांस रुकना, शिफ्ट वर्क, अनियमित दिनचर्या या अन्य नींद संबंधी विकार जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसलिए केवल ज्यादा देर सोने की कोशिश करना हमेशा समाधान नहीं होता।

खर्राटे आएं तो कब सावधान होना चाहिए?

खर्राटे आना आम समस्या है, लेकिन हर खर्राटा सामान्य नहीं माना जा सकता। खासकर अगर खर्राटों के साथ सोते समय सांस रुकने, हांफने या अचानक सांस लेने की आवाजें सुनाई दें तो मामला गंभीर हो सकता है।

स्लीप एपनिया ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय व्यक्ति की सांस बार-बार रुकती और फिर शुरू होती है। एनएचएलबीआई के अनुसार इसके प्रमुख संकेतों में तेज खर्राटे, नींद में सांस का रुकना या हांफना और दिन में अत्यधिक नींद या थकान शामिल हो सकते हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ ज्यादा वजन वाले लोगों को ही स्लीप एपनिया हो, ऐसा जरूरी नहीं है। शरीर की बनावट और ऊपरी सांस की नली से जुड़े कई कारक इसमें भूमिका निभा सकते हैं।

अगर किसी व्यक्ति के परिवार वाले बताते हैं कि वह सोते समय कुछ सेकंड के लिए सांस लेना बंद कर देता है और फिर जोर से सांस लेता है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

स्लीप एपनिया का असर सिर्फ नींद तक सीमित नहीं

स्लीप एपनिया में बार-बार सांस रुकने के कारण नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। व्यक्ति को रात में बार-बार सूक्ष्म रूप से जागना पड़ सकता है, भले ही उसे इसकी जानकारी न हो।

एनएचएलबीआई के अनुसार इलाज न किए गए स्लीप एपनिया का संबंध ध्यान केंद्रित करने, निर्णय लेने और याददाश्त जैसी समस्याओं से हो सकता है। इससे स्ट्रोक और हार्ट अटैक जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है।

ऐसी स्थिति में डॉक्टर लक्षणों और स्वास्थ्य इतिहास के आधार पर स्लीप स्टडी की सलाह दे सकते हैं। स्लीप स्टडी के जरिए नींद के दौरान सांस, शरीर की गतिविधियों और नींद के पैटर्न से जुड़ी कई चीजों की जांच की जा सकती है।

गाड़ी चलाते समय नींद आए तो बिल्कुल न करें नजरअंदाज

नींद की कमी का सबसे खतरनाक असर सड़क पर दिखाई दे सकता है। अगर ड्राइविंग के दौरान आंखें भारी होने लगें, बार-बार जम्हाई आए या ध्यान भटकने लगे तो इसे सामान्य थकान मानकर वाहन चलाते रहना जोखिम भरा हो सकता है।

एनएचएलबीआई के अनुसार स्लीप एपनिया से जुड़ी दिन की नींद ड्राइविंग के दौरान ध्यान और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है और दुर्घटना का खतरा बढ़ा सकती है। ऐसी स्थिति में नींद महसूस होने पर ड्राइविंग नहीं करनी चाहिए।

इसलिए लंबी यात्रा के दौरान नींद आने पर सुरक्षित स्थान पर वाहन रोककर आराम करना जरूरी है। सिर्फ तेज आवाज में संगीत सुनना, आंखों पर पानी डालना या लगातार कॉफी पीना सुरक्षित ड्राइविंग का विकल्प नहीं है।

दिन में 20 मिनट की झपकी से मिल सकती है राहत

दिन में छोटी झपकी कुछ लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है। एनएचएलबीआई के मुताबिक दिन में झपकी लेने से सतर्कता और प्रदर्शन में सुधार हो सकता है, लेकिन जिन लोगों को रात में नींद आने में परेशानी होती है, उन्हें झपकी सीमित करने या उसे दिन में पहले लेने की सलाह दी जाती है। वयस्कों के लिए झपकी करीब 20 मिनट तक सीमित रखने की सलाह दी गई है।

हालांकि, दिन की झपकी रात की पर्याप्त नींद का विकल्प नहीं है। अगर किसी व्यक्ति को हर दिन इतनी ज्यादा नींद आती है कि उसे सामान्य काम करने के लिए बार-बार सोना पड़ता है, तो इसके कारण की जांच जरूरी हो सकती है।

सोने से पहले मोबाइल क्यों परेशानी बढ़ा सकता है?

सोने से ठीक पहले मोबाइल फोन चलाना आजकल बहुत आम आदत है। कई लोग बिस्तर पर जाने के बाद भी सोशल मीडिया, वीडियो या मैसेज देखते रहते हैं।

एनएचएलबीआई के अनुसार सोने से पहले टीवी, कंप्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की रोशनी नींद-जागने के चक्र को प्रभावित कर सकती है। सोने से पहले शांत वातावरण और कम रोशनी रखने की सलाह दी जाती है।

इसके अलावा मोबाइल से आने वाले नोटिफिकेशन भी व्यक्ति को बार-बार फोन देखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इसलिए जरूरत न हो तो सोते समय फोन को बिस्तर से थोड़ा दूर रखना एक व्यावहारिक कदम हो सकता है।

नींद न आए तो क्या करें?

अगर बिस्तर पर जाने के बाद लंबे समय तक नींद नहीं आ रही है, तो लगातार करवट बदलते रहना हर व्यक्ति के लिए मददगार नहीं होता। शांत गतिविधि करते हुए कुछ समय बाद नींद आने पर दोबारा बिस्तर पर जाना उपयोगी हो सकता है।

रोजाना लगभग एक ही समय पर सोने और जागने की कोशिश करना भी महत्वपूर्ण है। सप्ताहांत में बहुत देर तक सोने और बाकी दिनों में अचानक जल्दी उठने से शरीर की नींद-जागने की लय प्रभावित हो सकती है।

एनएचएलबीआई शांत, अंधेरे और ठंडे कमरे में सोने तथा सोने से पहले तेज रोशनी और इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन से बचने की सलाह देता है।

चाय-कॉफी और शराब पर भी रखें नजर

सोने से पहले चाय या कॉफी पीने की आदत कुछ लोगों में नींद को प्रभावित कर सकती है। कैफीन, निकोटीन और शराब को सोने के करीब लेने से बचने की सलाह दी जाती है।

शराब के मामले में एक भ्रम यह है कि इससे नींद जल्दी आ सकती है, इसलिए यह नींद सुधारने में मदद करती है। लेकिन एनएचएलबीआई के अनुसार शराब नींद को हल्का कर सकती है और रात में जागने की संभावना बढ़ा सकती है।

इसी तरह सोने से कुछ घंटे पहले बहुत भारी भोजन करने से भी परेशानी हो सकती है। नियमित भोजन और सोने के समय के बीच पर्याप्त अंतर रखना बेहतर माना जाता है।

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

अगर कई दिनों या हफ्तों से पर्याप्त नींद लेने के बावजूद लगातार थकान रहती है, दिन में बार-बार नींद आती है, जोरदार खर्राटे आते हैं, सोते समय सांस रुकती है, सुबह सिरदर्द रहता है या रात में बार-बार जागना पड़ता है, तो इसे केवल सामान्य थकान मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

ऐसे लक्षणों की वजह जानने के लिए डॉक्टर आपकी नींद की आदतों, दवाओं, स्वास्थ्य इतिहास और लक्षणों के बारे में पूछ सकते हैं। जरूरत पड़ने पर स्लीप स्टडी भी कराई जा सकती है।

अच्छी नींद का मतलब केवल आठ घंटे बिस्तर पर पड़े रहना नहीं है। उम्र के अनुसार नींद की जरूरत बदलती है और वयस्कों के लिए नियमित रूप से कम से कम सात घंटे की नींद सामान्य स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेकिन इसके साथ नींद की गुणवत्ता, नियमितता और दिन में शरीर कैसा महसूस कर रहा है, इन बातों को भी देखना जरूरी है।

अगर आठ घंटे सोने के बाद भी रोजाना थकान बनी रहती है, तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “मुझे और कितने घंटे सोना है?” बल्कि यह भी देखना चाहिए कि “मेरी नींद की गुणवत्ता कैसी है और क्या रात में कोई समस्या मेरी नींद को बार-बार तोड़ रही है?” खासकर खर्राटों के साथ सांस रुकने या दिन में अत्यधिक नींद आने जैसे संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं