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जब पहली बार पटरियों पर दौड़ी ट्रेन, 400 यात्री थे सवार… 173 साल पुरानी इस कहानी का सच जानकर रह जाएंगे हैरान!



नई दिल्ली। आज भारतीय रेलवे देश की लाइफलाइन कही जाती है। रोजाना करोड़ों लोग ट्रेन से सफर करते हैं। किसी के लिए ट्रेन ऑफिस पहुंचने का साधन है तो किसी के लिए गांव से शहर और शहर से दूसरे राज्य तक जाने का सबसे किफायती जरिया। लंबी दूरी की यात्रा हो या रोजमर्रा का सफर, भारतीयों की जिंदगी रेलवे से गहराई से जुड़ी हुई है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत में जब पहली बार यात्री ट्रेन पटरियों पर उतरी होगी, तब का माहौल कैसा रहा होगा? उस समय न आधुनिक स्टेशन थे, न इलेक्ट्रिक इंजन और न ही आज जैसी लंबी-लंबी ट्रेनें।

भारत में रेलवे की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी और इसका शुरुआती उद्देश्य केवल आम लोगों को यात्रा की सुविधा देना नहीं था। व्यापार, सैन्य आवाजाही और प्रशासनिक नियंत्रण जैसे कई कारणों से रेलवे नेटवर्क विकसित करने की योजना बनाई गई थी। लेकिन समय के साथ यही रेलवे भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन गया।

एक जरूरी तथ्य यह भी है कि भारत की पहली यात्री ट्रेन का नाम 'डेक्कन क्वीन' नहीं था। 16 अप्रैल 1853 को जो पहली यात्री ट्रेन चली थी, वह बोरीबंदर (आज का मुंबई क्षेत्र) से ठाणे के बीच चली थी। 'डेक्कन क्वीन' नाम की प्रसिद्ध ट्रेन बाद में शुरू हुई। इसलिए इतिहास को समझते समय दोनों को अलग-अलग रखना जरूरी है।

16 अप्रैल 1853 को बना था इतिहास

भारत में पहली यात्री रेल सेवा 16 अप्रैल 1853 को शुरू हुई। उस दिन मुंबई के बोरीबंदर से ठाणे के बीच पहली ट्रेन ने अपनी ऐतिहासिक यात्रा शुरू की।

बताया जाता है कि ट्रेन दोपहर करीब 3 बजकर 35 मिनट पर बोरीबंदर से रवाना हुई थी। इसमें लगभग 400 यात्री सवार थे। ट्रेन में कुल 14 डिब्बे थे और इसे भाप के तीन इंजनों ने खींचा था।

इस यात्रा की दूरी आज के पैमाने पर बहुत ज्यादा नहीं थी, लेकिन उस दौर में यह एक क्रांतिकारी घटना थी। ट्रेन ने बोरीबंदर से ठाणे तक का सफर लगभग एक घंटे 15 मिनट में पूरा किया।

कल्पना कीजिए, जिस समय लोग मुख्य रूप से बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, पालकी और पैदल यात्रा करते थे, उस दौर में लोहे की पटरियों पर भाप के इंजन से चलने वाली एक विशाल मशीन सैकड़ों यात्रियों को लेकर आगे बढ़ रही थी। यह दृश्य उस समय के लोगों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं रहा होगा।

तीन इंजनों ने खींची थी पहली ट्रेन

पहली यात्री ट्रेन को खींचने के लिए तीन भाप के इंजनों का इस्तेमाल किया गया था। इनके नाम साहिब, सिंध और सुल्तान बताए जाते हैं।

इन तीनों इंजनों ने मिलकर 14 डिब्बों वाली ट्रेन को बोरीबंदर से ठाणे तक पहुंचाया था। आज के आधुनिक इलेक्ट्रिक और शक्तिशाली डीजल इंजनों के मुकाबले उस दौर के भाप इंजन तकनीक के शुरुआती दौर का हिस्सा थे।

भाप इंजन में पानी और ईंधन का इस्तेमाल करके भाप पैदा की जाती थी। यही भाप इंजन के मैकेनिकल हिस्सों को चलाती थी और पहियों को गति मिलती थी। रेलवे के विकास में भाप इंजन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही।

पहली ट्रेन देखने के लिए उमड़ पड़े थे लोग

पहली यात्री ट्रेन का सफर केवल यात्रियों के लिए ही खास नहीं था, बल्कि आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी यह एक बड़ा कौतूहल था। उस समय रेल भारत के लिए बिल्कुल नई तकनीक थी।

भाप छोड़ता इंजन, लगातार आवाज करती मशीन और कई डिब्बों को एक साथ खींचती ट्रेन लोगों के लिए अद्भुत दृश्य रही होगी। पहली यात्रा ने यह संकेत दे दिया था कि आने वाले समय में भारत में यातायात का स्वरूप बदलने वाला है।

हालांकि उस समय रेलवे आज की तरह पूरे देश में फैला हुआ नेटवर्क नहीं था। मुंबई और ठाणे के बीच शुरू हुई यह छोटी-सी रेल लाइन आगे चलकर विशाल भारतीय रेल नेटवर्क की नींव बनी।

भारत में रेलवे बनाने का विचार क्यों आया?

भारत में रेलवे का विकास केवल यात्री सुविधा के उद्देश्य से नहीं किया गया था। ब्रिटिश शासन के लिए रेलवे के कई रणनीतिक और आर्थिक फायदे थे।

रेल के जरिए बंदरगाहों से माल को देश के अंदरूनी इलाकों तक ले जाना आसान हो सकता था। इसी तरह कच्चा माल तेजी से बंदरगाहों तक पहुंचाया जा सकता था और ब्रिटेन से आने वाले सामान को देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाने में भी रेलवे उपयोगी साबित हो सकती थी।

इसके अलावा सैन्य दृष्टि से भी रेलवे बेहद महत्वपूर्ण थी। सैनिकों और सैन्य सामान को एक जगह से दूसरी जगह अपेक्षाकृत तेजी से पहुंचाया जा सकता था।

यही कारण था कि ब्रिटिश शासन ने भारत में रेलवे नेटवर्क विकसित करने पर जोर दिया।

लॉर्ड हार्डिंग से डलहौजी तक पहुंची योजना

भारत में रेलवे के विकास का विचार ब्रिटिश प्रशासन के उच्च स्तर पर पहले ही सामने आ चुका था। लॉर्ड हार्डिंग के समय रेलवे की संभावनाओं पर विचार हुआ। इसके पीछे व्यापार और सैन्य जरूरतों को महत्वपूर्ण कारण माना गया।

बाद में गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने भारत में रेलवे विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1853 में पहली यात्री ट्रेन के संचालन तक पहुंचने में ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों और निजी कंपनियों की भूमिका अहम रही।

ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के दौरान ब्रिटेन की निजी कंपनियों को रेलवे निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसी प्रक्रिया में ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे (GIPR) को मुंबई क्षेत्र में रेलवे लाइन विकसित करने की जिम्मेदारी मिली।

1850 में शुरू हुआ था निर्माण कार्य

मुंबई और ठाणे के बीच रेल लाइन के निर्माण का काम 1850 के आसपास शुरू हुआ। इंजीनियरों के सामने कई तकनीकी चुनौतियां थीं। पटरियां बिछाना, पुलों और अन्य संरचनाओं का निर्माण करना तथा भाप इंजन के संचालन के लिए आवश्यक व्यवस्था तैयार करना उस समय आसान काम नहीं था।

इसके बावजूद कुछ ही वर्षों में परियोजना को पूरा किया गया और 1853 में पहली यात्री ट्रेन चलाने का सपना साकार हुआ।

यही वह शुरुआत थी जिसने आने वाले दशकों में भारतीय उपमहाद्वीप में रेल नेटवर्क के विस्तार का रास्ता खोल दिया।

डेक्कन क्वीन को लेकर क्यों होता है भ्रम?

पहली यात्री ट्रेन को लेकर अक्सर डेक्कन क्वीन का नाम सामने आता है, लेकिन यह ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।

डेक्कन क्वीन भारतीय रेलवे की एक बेहद प्रसिद्ध और ऐतिहासिक ट्रेन है, लेकिन यह 1853 में चलने वाली भारत की पहली यात्री ट्रेन नहीं थी। पहली यात्री ट्रेन बोरीबंदर से ठाणे के बीच चली थी, जबकि डेक्कन क्वीन का संचालन बाद के दौर में शुरू हुआ।

इसलिए अगर सवाल पूछा जाए कि भारत में पहली यात्री ट्रेन कब और कहां चली थी, तो जवाब होगा—16 अप्रैल 1853 को बोरीबंदर से ठाणे के बीच।

1804 में भाप के इंजन ने दिखाई थी नई राह

भारत में पहली ट्रेन चलने से कई दशक पहले यूरोप में भाप से चलने वाले रेल इंजन के प्रयोग शुरू हो चुके थे। ब्रिटिश इंजीनियर रिचर्ड ट्रेविथिक ने 1804 में भाप से चलने वाले रेलवे लोकोमोटिव का सफल प्रदर्शन किया था।

यह तकनीकी विकास रेलवे के इतिहास में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। बाद के दशकों में भाप इंजन तकनीक में लगातार सुधार हुआ और रेल परिवहन धीरे-धीरे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैलता गया।

भारत तक यह तकनीक ब्रिटिश शासन के माध्यम से पहुंची और 1853 में पहली यात्री रेल सेवा शुरू हुई।

14 डिब्बों से शुरू हुआ सफर आज कहां पहुंचा?

1853 में 14 डिब्बों वाली ट्रेन और करीब 400 यात्रियों से शुरू हुआ भारतीय रेल का सफर आज विशाल नेटवर्क में बदल चुका है। आज भारतीय रेलवे में आधुनिक इलेक्ट्रिक ट्रेनें, हाई-स्पीड वंदे भारत जैसी सेवाएं, वातानुकूलित कोच, डिजिटल टिकटिंग और अत्याधुनिक रेलवे स्टेशन दिखाई देते हैं।

जिस रेल यात्रा को कभी ब्रिटिश शासन की व्यापारिक और प्रशासनिक जरूरतों के लिए विकसित किया गया था, वही समय के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गई।

रेलवे ने देश के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोगों की आवाजाही आसान हुई, बाजारों तक पहुंच बढ़ी और शहरों तथा गांवों के बीच संपर्क मजबूत हुआ।

16 अप्रैल 1853 को बोरीबंदर से ठाणे तक चली वह पहली ट्रेन भले ही आज की नजर में छोटी और साधारण लगती हो, लेकिन उसने भारत के परिवहन इतिहास की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। तीन भाप इंजन, 14 डिब्बे और करीब 400 यात्रियों के साथ शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक की नींव बन गया।

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