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सोना-चांदी खरीदने से पहले रुकिए! बाजार में होने वाला है बड़ा उलटफेर, अगला भाव देखकर चौंक जाएंगे



नई दिल्ली। सोना और चांदी खरीदने वालों के लिए सितंबर की शुरुआत काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है। कभी तेज गिरावट तो कभी अचानक जोरदार रिकवरी ने निवेशकों को असमंजस में डाल दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदें, डॉलर की मजबूती, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और महंगाई के आंकड़े कीमती धातुओं की दिशा तय कर रहे हैं।

4 सितंबर को जारी अमेरिकी रोजगार आंकड़ों के बाद सोने की कीमतों पर दबाव बढ़ा। Reuters के मुताबिक अगस्त में अमेरिका में रोजगार वृद्धि उम्मीद से मजबूत रहने के बाद बाजार में सितंबर में फेड की संभावित ब्याज दर बढ़ोतरी की संभावना बढ़ गई। इसके बाद शुक्रवार को स्पॉट गोल्ड करीब 1.2 फीसदी गिरकर 4,419.09 डॉलर प्रति औंस पर आ गया, जबकि दिसंबर गोल्ड फ्यूचर्स करीब 1.4 फीसदी नीचे रहा। चांदी भी लगभग 1.7 फीसदी फिसली।

लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है। इससे ठीक एक दिन पहले, 3 सितंबर को फेड गवर्नर क्रिस्टोफर वॉलर की टिप्पणियों के बाद दर बढ़ोतरी की आशंकाएं कुछ कम हुई थीं और सोना एक दिन में 2 फीसदी से ज्यादा चढ़ गया था। यानी बाजार में फिलहाल हर बड़े अमेरिकी आर्थिक आंकड़े के साथ सोने-चांदी की दिशा बदल रही है।

भारत में सोने का क्या हाल है?

भारतीय बाजार में भी हाल के दिनों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। उपलब्ध IBJA आंकड़ों के मुताबिक 999 शुद्धता वाले सोने का 3 सितंबर का PM रेट करीब ₹1,53,941 प्रति 10 ग्राम था, जबकि 2 सितंबर को यह करीब ₹1,51,184 और 1 सितंबर को करीब ₹1,53,183 था। 999 शुद्धता वाली चांदी का 3 सितंबर का PM रेट करीब ₹2,32,533 प्रति किलोग्राम दर्ज किया गया। IBJA के ये रेट GST और मेकिंग चार्ज के बिना होते हैं।

वहीं 4 सितंबर के बाजार आंकड़ों में 24 कैरेट सोने का indicative rate करीब ₹1,58,140 प्रति 10 ग्राम बताया गया था। अलग-अलग शहरों में कीमतों में अंतर देखा जा सकता है।

इसलिए अगर आप आज बाजार से सोना खरीदने जा रहे हैं तो इंटरनेट पर दिखने वाले किसी एक रेट को अंतिम कीमत न मानें। ज्वेलर के बिल में GST, मेकिंग चार्ज और अन्य शुल्क जुड़ सकते हैं।

चांदी ने भी बढ़ाई हलचल

सोने के साथ चांदी में भी जबरदस्त उतार-चढ़ाव जारी है। 5 सितंबर के उपलब्ध बाजार आंकड़ों में दिल्ली क्षेत्र में चांदी का रेट 4 सितंबर को करीब ₹2,67,100 प्रति किलो बताया गया, जो 1 सितंबर के करीब ₹2,59,900 के स्तर से ऊपर था। यानी महीने की शुरुआत से चांदी में तेजी के बावजूद रोजाना के कारोबार में काफी उतार-चढ़ाव बना हुआ है।

चांदी को केवल निवेश की धातु मानना भी पूरी तस्वीर नहीं है। इसका इस्तेमाल औद्योगिक क्षेत्रों में भी होता है। इसलिए इसकी कीमत पर निवेश मांग के अलावा औद्योगिक मांग और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का भी असर पड़ता है।

आखिर सोने की कीमत अचानक क्यों बदल रही है?

सोने की कीमतों को प्रभावित करने वाले कई अंतरराष्ट्रीय कारक इस समय एक साथ सक्रिय हैं।

सबसे बड़ा मुद्दा अमेरिका की ब्याज दरों से जुड़ी उम्मीदें हैं। सामान्य तौर पर ब्याज दर बढ़ने की संभावना बढ़ती है तो बिना ब्याज देने वाली संपत्तियों के मुकाबले सोने पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा अमेरिकी डॉलर मजबूत होने पर भी डॉलर में कीमत वाले सोने की मांग प्रभावित हो सकती है।

सितंबर की शुरुआत में यही तस्वीर देखने को मिली। 1 सितंबर को अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और मजबूत डॉलर के कारण सोना 2 फीसदी से अधिक गिरकर करीब दो सप्ताह के निचले स्तर तक पहुंच गया था।

इसके बाद फेड अधिकारियों की टिप्पणियों और आर्थिक आंकड़ों ने बाजार की उम्मीदें फिर बदल दीं। यही वजह है कि कुछ ही दिनों में सोने में तेज गिरावट के बाद जोरदार रिकवरी और फिर दोबारा दबाव देखने को मिला।

क्या अब सोना खरीदना चाहिए?

यही सवाल इस समय सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। इसका सीधा जवाब देना आसान नहीं है, क्योंकि सोने की कीमत आगे अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों, फेड के फैसलों, डॉलर और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती है।

कुछ बाजार विशेषज्ञों ने हालिया गिरावट को चरणबद्ध खरीदारी के नजरिए से देखने की बात कही है। 3 सितंबर की एक बाजार रिपोर्ट में भी गिरावट पर खरीदारी की रणनीति का उल्लेख किया गया था, जबकि चांदी के लिए ₹2.25 लाख प्रति किलो के आसपास का स्तर महत्वपूर्ण समर्थन बताया गया था।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि कीमत निश्चित रूप से बढ़ेगी। बाजार में अचानक गिरावट भी आ सकती है।

अगर शादी या जरूरत के लिए सोना खरीदना है

अगर सोना निवेश के बजाय शादी, त्योहार या किसी निश्चित जरूरत के लिए खरीदना है तो केवल कीमत के सबसे निचले स्तर का इंतजार करना हमेशा व्यावहारिक नहीं होता।

ऐसे खरीदार अपनी जरूरत के हिसाब से खरीदारी को हिस्सों में बांट सकते हैं। उदाहरण के लिए पूरी रकम एक ही दिन लगाने के बजाय अलग-अलग समय पर खरीदारी करने से कीमत के उतार-चढ़ाव का प्रभाव कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

लेकिन निवेश संबंधी फैसला व्यक्ति की आय, जोखिम क्षमता, समय अवधि और मौजूदा निवेश पर निर्भर करता है।

चांदी में निवेश करने वालों को क्यों रहना होगा सावधान?

चांदी में आम तौर पर सोने की तुलना में ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसलिए सिर्फ यह देखकर कि चांदी सस्ती लग रही है, पूरी रकम एक साथ लगाना जोखिम भरा हो सकता है।

चांदी की कीमत पर डॉलर, ब्याज दरों और वैश्विक औद्योगिक मांग का असर पड़ता है। इसलिए चांदी में निवेश करने वालों को सोने की तरह केवल सुरक्षित निवेश के नजरिए से नहीं, बल्कि ज्यादा उतार-चढ़ाव वाली संपत्ति के रूप में भी देखना चाहिए।

आने वाले दिनों में किन चीजों पर रहेगी नजर?

अब बाजार की नजर अमेरिका के आने वाले महंगाई संबंधी आंकड़ों और फेडरल रिजर्व की नीति पर रहेगी। अगर महंगाई के आंकड़े उम्मीद से कमजोर आते हैं और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना कम होती है, तो सोने को राहत मिल सकती है।

इसके उलट अगर महंगाई मजबूत रहती है और फेड के आक्रामक रुख की संभावना बढ़ती है, तो डॉलर और बॉन्ड यील्ड में मजबूती सोने-चांदी पर दबाव बना सकती है।

इसके अलावा वैश्विक तनाव भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। ऐसे समय में निवेशक अक्सर सुरक्षित मानी जाने वाली संपत्तियों की ओर रुख करते हैं, जिससे सोने की मांग को सहारा मिल सकता है।

खरीदारी से पहले इन बातों का रखें ध्यान

सोना खरीदते समय केवल 22 या 24 कैरेट का रेट देखकर फैसला न करें। हॉलमार्क, शुद्धता, वजन, मेकिंग चार्ज, GST और अंतिम बिल की राशि को ध्यान से जांचें।

निवेश के लिए खरीद रहे हैं तो यह भी तय करें कि आपका उद्देश्य क्या है और कितने समय तक निवेश बनाए रखना है। बाजार में तेजी देखकर जल्दबाजी में खरीदारी करना या गिरावट देखकर घबराकर बेच देना दोनों ही जोखिम पैदा कर सकते हैं।

सितंबर 2026 की शुरुआत में सोने और चांदी का बाजार लगातार करवट बदल रहा है। अमेरिकी ब्याज दरों की उम्मीदें फिलहाल कीमतों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में हैं। 3 सितंबर को सोने में जोरदार तेजी आई, लेकिन 4 सितंबर के मजबूत अमेरिकी रोजगार आंकड़ों के बाद फिर दबाव देखने को मिला।

इसलिए सोना-चांदी खरीदने वालों के लिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल सिर्फ “भाव बढ़ेंगे या घटेंगे?” नहीं है, बल्कि यह है कि अगला बड़ा अंतरराष्ट्रीय आंकड़ा बाजार की दिशा किस तरफ मोड़ता है। कीमतों में तेजी और गिरावट दोनों की संभावना को ध्यान में रखकर ही कोई वित्तीय फैसला लेना बेहतर है।

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