मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग जिम का आइडिया सुनकर मचा था हंगामा, आज कहानी पूरी तरह बदल चुकी है
कोयंबटूर: फिटनेस और एक्सरसाइज को लेकर महिलाओं में जागरूकता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन हर महिला के लिए जिम तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं होता। खासकर उन इलाकों में जहां महिलाओं के लिए अलग और सुरक्षित फिटनेस स्पेस उपलब्ध नहीं है। तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित सारामेडु इलाके की रहने वाली शबाना ने इसी जरूरत को महसूस किया और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग जिम शुरू करने का फैसला किया।
शबाना की शुरुआत किसी बड़े बिजनेस प्लान से नहीं हुई थी। वह खुद वजन कम करने और अपनी सेहत सुधारने के लिए जिम गई थीं। धीरे-धीरे उन्होंने फिटनेस की ट्रेनिंग ली, महिलाओं को ट्रेन करना शुरू किया और बाद में अपने इलाके में महिलाओं के लिए अलग जिम खोलने का निर्णय लिया। लेकिन यह सफर इतना आसान नहीं था। उन्हें सामाजिक विरोध, आलोचनाओं और महिलाओं के जिम आने को लेकर झिझक जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
खुद की जरूरत से शुरू हुआ बदलाव
शबाना की कहानी की शुरुआत उनके अपने अनुभव से हुई। शादी और दो बच्चों के जन्म के बाद उनका वजन काफी बढ़ गया था। इसके अलावा उन्हें कुछ सर्जरी भी करवानी पड़ी थीं, जिसके बाद उन्हें शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
उन्होंने अपने इलाके में वजन कम करने के लिए जिम तलाशा, लेकिन उन्हें ऐसा कोई जिम नहीं मिला जहां वह सहज महसूस कर सकें। इसके बाद उन्होंने एक जिम जाना शुरू किया और वहीं महिलाओं की ट्रेनर के रूप में काम करने लगीं।
यहीं से उनके मन में एक विचार आया कि अगर उनके इलाके की महिलाओं के लिए अलग जिम उपलब्ध हो, तो शायद ज्यादा महिलाएं बिना झिझक एक्सरसाइज कर सकेंगी।
शबाना ने बताया कि जिस जिम में वह काम करती थीं, उसके मालिक जयकांत और उनके ट्रेनर हर्षद ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके सहयोग से उन्होंने फिटनेस और वेटलिफ्टिंग में अपनी ट्रेनिंग जारी रखी।
सिर्फ सातवीं तक पढ़ाई, लेकिन फिटनेस में बनाई पहचान
शबाना ने बताया कि उन्होंने केवल सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की है और 19 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई थी। इसके बावजूद उन्होंने अपनी परिस्थितियों को अपनी राह में स्थायी बाधा नहीं बनने दिया।
वह पिछले करीब पांच वर्षों से वेटलिफ्टिंग की ट्रेनिंग ले रही हैं। उन्होंने राज्य स्तर की कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और पुरस्कार भी जीते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने पुरुष वेटलिफ्टिंग खिलाड़ियों को ट्रेनिंग देने से संबंधित परीक्षा भी पास की है।
यानी जिस महिला ने खुद वजन कम करने के लिए जिम जाना शुरू किया था, वही आगे चलकर दूसरी महिलाओं को फिटनेस की ट्रेनिंग देने लगीं।
जिम खोलते ही सामने आया विरोध
शबाना के लिए सबसे बड़ी चुनौती जिम खोलना नहीं, बल्कि लोगों की सोच और शुरुआती विरोध का सामना करना था।
जब उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग जिम शुरू किया तो शुरुआत में कई तरह की आपत्तियां सामने आईं। कुछ लोगों का सवाल था कि महिलाओं को जिम जाने की जरूरत ही क्या है। कुछ लोगों का मानना था कि महिलाओं को घर के काम और बच्चों की देखभाल तक सीमित रहना चाहिए।
शबाना के अनुसार, जब उनके जिम के बारे में मीडिया में खबर आई तो उन्हें सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर काफी आपत्तिजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने जिम बंद करने के बारे में सोच लिया था।
लेकिन बाद में उन्होंने फैसला किया कि कुछ लोगों की आलोचना के कारण वह अपना काम नहीं रोकेंगी। यही सोच उनके लिए आगे बढ़ने की वजह बनी।
शुरुआत में सिर्फ 20 महिलाएं आती थीं
आज जिस जिम में बड़ी संख्या में महिलाएं आती हैं, उसकी शुरुआत बेहद छोटे स्तर से हुई थी। शबाना के अनुसार, शुरुआती दिनों में केवल करीब 20 महिलाएं जिम आती थीं।
कई महिलाएं खुद आने में झिझकती थीं। कुछ परिवारों में पति अपनी पत्नी को जिम तक छोड़ने के लिए साथ आते थे। धीरे-धीरे जब महिलाओं ने जिम में जाकर खुद बदलाव महसूस किया तो दूसरी महिलाओं का भरोसा भी बढ़ा।
यही भरोसा आगे चलकर जिम की सबसे बड़ी ताकत बना।
रिपोर्ट के मुताबिक अब 300 से ज्यादा मुस्लिम महिलाएं यहां ट्रेनिंग करती हैं। इनमें स्कूल और कॉलेज की छात्राओं से लेकर करीब 60 वर्ष की महिलाएं भी शामिल हैं।
परिवार का साथ मिला तो बढ़ा हौसला
शबाना के इस सफर में उनके परिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उनके पति कबीर, उनकी बेटी और बेटा उन्हें प्रोत्साहित करते हैं।
शबाना के अनुसार, परिवार के सहयोग की वजह से वह जिम शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने में सफल हो सकीं।
जिम आने वाली महिलाओं के अनुभव भी अलग-अलग हैं। कुछ महिलाएं अपने वजन और फिटनेस पर काम करने के लिए यहां आती हैं, तो कुछ तनाव कम करने और अपने लिए समय निकालने के लिए।
रिपोर्ट में एक महिला ने बताया कि कामकाजी जीवन के तनाव के बीच जिम आने से उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से बेहतर महसूस होता है। उनका कहना था कि केवल महिलाएं होने के कारण वह यहां अधिक सहज महसूस करती हैं।
सुबह 5 बजे शुरू होती है ट्रेनिंग
इस जिम की खास बात यह भी है कि कई महिलाएं सुबह जल्दी ट्रेनिंग के लिए पहुंचती हैं। कुछ महिलाएं सुबह करीब 5 बजे जिम आती हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, शबाना कई महिलाओं को सुबह उठने के लिए भी फोन करती हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिम केवल एक्सरसाइज की जगह नहीं रह गया है, बल्कि महिलाओं के लिए एक नियमित फिटनेस समुदाय जैसा बन गया है।
सीमित संसाधनों के बावजूद जारी है ट्रेनिंग
जिम में आधुनिक और महंगे फिटनेस उपकरणों की भरमार नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यहां ट्रेडमिल, बैटल रोप्स, स्टेशनरी बाइक और डम्बल्स जैसे बुनियादी उपकरण मौजूद हैं।
जगह और उपकरण सीमित होने के कारण शबाना कई महिलाओं को जमीन पर की जाने वाली एक्सरसाइज भी करवाती हैं। उनका जोर इस बात पर है कि उपलब्ध संसाधनों के भीतर महिलाओं को नियमित रूप से सक्रिय रखा जाए।
सिर्फ मुस्लिम महिलाओं तक सीमित नहीं रहा जिम
हालांकि शबाना ने यह जिम खास तौर पर मुस्लिम महिलाओं को ध्यान में रखकर शुरू किया था, लेकिन अब दूसरी समुदायों की कुछ महिलाएं भी यहां ट्रेनिंग ले रही हैं।
इससे जिम का दायरा उस मूल उद्देश्य से आगे बढ़ता दिखाई देता है जिसके लिए इसे शुरू किया गया था। यानी एक ऐसी जगह जहां महिलाएं बिना झिझक अपनी फिटनेस पर काम कर सकें।
महिलाओं के लिए फिटनेस का मतलब सिर्फ वजन कम करना नहीं
शबाना की कहानी यह भी बताती है कि महिलाओं के लिए फिटनेस केवल वजन कम करने का विषय नहीं है। नियमित शारीरिक गतिविधि स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और दिनचर्या का हिस्सा बन सकती है।
जिम आने वाली महिलाओं के अनुभवों में वजन कम करने के साथ-साथ तनाव कम होने, खुद के लिए समय मिलने और शारीरिक सक्रियता बढ़ने की बातें सामने आई हैं। हालांकि हर व्यक्ति की फिटनेस जरूरत अलग होती है और किसी भी नए व्यायाम कार्यक्रम को शुरू करने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।
आलोचना के बीच शबाना का जवाब बना उनका काम
शबाना की सबसे बड़ी चुनौती लोगों की आलोचना थी, लेकिन धीरे-धीरे उनके काम का परिणाम ही उनका जवाब बन गया।
जहां शुरुआत में केवल करीब 20 महिलाएं जिम आती थीं, वहीं अब 300 से अधिक महिलाओं के जुड़ने की बात सामने आई है। स्कूल-कॉलेज की छात्राओं से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक का यहां पहुंचना बताता है कि महिलाओं के बीच अलग और सुविधाजनक फिटनेस स्पेस की मांग मौजूद है।
शबाना खुद भी अब केवल जिम संचालक नहीं हैं। वह वेटलिफ्टर और ट्रेनर के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। उनका सफर इस बात का उदाहरण है कि किसी व्यक्तिगत जरूरत से शुरू हुआ प्रयास धीरे-धीरे समुदाय की जरूरत में बदल सकता है।
कोयंबटूर के सारामेडु इलाके की शबाना की कहानी संघर्ष और बदलाव की कहानी है। सातवीं कक्षा तक पढ़ाई, कम उम्र में शादी, दो बच्चों के बाद बढ़ा वजन, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां और फिर फिटनेस की ओर बढ़ता कदम—इन सबके बीच उन्होंने अपने लिए रास्ता बनाया।
जब उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग जिम शुरू किया तो शुरुआत में विरोध और आलोचना का सामना करना पड़ा। कई महिलाएं भी जिम आने में झिझकती थीं। लेकिन समय के साथ तस्वीर बदली। आज रिपोर्ट के अनुसार यहां 300 से ज्यादा महिलाएं नियमित रूप से ट्रेनिंग करती हैं।
शबाना का अनुभव यह दिखाता है कि किसी समुदाय में बदलाव हमेशा बड़े संस्थानों से नहीं आता। कई बार एक व्यक्ति अपनी जरूरत पहचानकर छोटा कदम उठाता है और वही कदम धीरे-धीरे कई लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाता है।

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