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500 ग्रे रेडिएशन में भी नहीं मरा ये नन्हा जीव! टूट गया था पूरा DNA, फिर जो हुआ उसने वैज्ञानिकों को कर दिया हैरान



नई दिल्ली। दुनिया में कुछ जीव ऐसे हैं, जिनकी क्षमता वैज्ञानिकों को बार-बार हैरान कर देती है। इनमें टार्डिग्रेड यानी वाटर बियर का नाम सबसे ऊपर लिया जाता रहा है। बेहद कठिन परिस्थितियों में भी जिंदा रहने की इसकी क्षमता ने लंबे समय से वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है। लेकिन अब एक बेहद छोटे से जीव ने इस दौड़ में टार्डिग्रेड को भी चुनौती दे दी है। यह जीव है एडिनेटा वागा, जो बडेलॉयड रोटिफर समूह से संबंधित है।

पेड़ों की छाल, काई और लाइकेन जैसी नम जगहों में रहने वाला यह सूक्ष्म जीव ऐसी परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है, जिनमें अधिकांश जीवों का जीवन असंभव माना जाता है। वैज्ञानिकों के लिए सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अत्यधिक रेडिएशन के कारण जब इसके DNA और क्रोमोसोम दर्जनों टुकड़ों में टूट जाते हैं, तब भी यह जीव न केवल जीवित रहता है, बल्कि प्रजनन भी कर सकता है।

इससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह है कि टूटे हुए आनुवंशिक पदार्थ की मरम्मत केवल एक पीढ़ी में पूरी नहीं होती। इसके बाद आने वाली पीढ़ियां भी इस अधूरे जेनेटिक काम को आगे बढ़ाती हैं और धीरे-धीरे टूटे हुए क्रोमोसोम की संरचना को बहाल करती हैं।

500 ग्रे रेडिएशन ने कर दिया था DNA को तार-तार

बेल्जियम की यूनिवर्सिटी लिबरे डी ब्रुसेल्स की बायोलॉजिस्ट कारिन वैन डोनिक और उनकी टीम ने एडिनेटा वागा की असाधारण रेडिएशन सहने की क्षमता का अध्ययन किया। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने इस सूक्ष्म जीव को 100 से लेकर 500 ग्रे तक की प्रोटॉन रेडिएशन डोज के संपर्क में रखा।

इंसानी शरीर के लिए यह मात्रा बेहद घातक है। कुछ ही ग्रे की आयनाइजिंग रेडिएशन शरीर की कोशिकाओं को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसे में 500 ग्रे जैसी भारी डोज का सामना करने के बाद किसी जीव का जीवित बचना अपने आप में असाधारण घटना है।

प्रयोग के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि इतनी भारी रेडिएशन के बाद एडिनेटा वागा के जीनोम में सैकड़ों डबल-स्ट्रैंड DNA ब्रेक हो गए। शोध के मुताबिक, 500 ग्रे की डोज के बाद जीनोम में 440 से अधिक डबल-स्ट्रैंड ब्रेक देखे गए। स्थिति इतनी गंभीर थी कि कई क्रोमोसोम लगभग 30 से 50 छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गए।

सामान्य जीवों में इस स्तर की आनुवंशिक क्षति कोशिकाओं के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है। लेकिन एडिनेटा वागा ने यहां भी वैज्ञानिकों को चौंका दिया।

वैज्ञानिकों को पहले लगा कि सीक्वेंसिंग में गड़बड़ी है

रेडिएशन से प्रभावित जीव से आगे की पीढ़ी तैयार करने के बाद वैज्ञानिकों ने उनकी जेनेटिक संरचना की जांच शुरू की। उन्हें उम्मीद थी कि रेडिएशन के कारण हुई क्षति अगली पीढ़ी में भी उसी तरह दिखाई देगी।

लेकिन सीक्वेंसिंग के दौरान जो नतीजे सामने आए, उन्होंने वैज्ञानिकों को उलझन में डाल दिया।

अलग-अलग पीढ़ियों में क्रोमोसोम की क्षति का स्तर एक जैसा नहीं था। कुछ आनुवंशिक हिस्से गायब नजर आ रहे थे, जबकि दूसरी पीढ़ियों में ऐसा लग रहा था कि वही आनुवंशिक सामग्री धीरे-धीरे दोबारा व्यवस्थित हो रही है।

शोधकर्ताओं को शुरुआत में लगा कि शायद सीक्वेंसिंग मशीन या प्रयोगशाला की तकनीक में कोई समस्या है। इसलिए परीक्षणों को दोबारा किया गया। लेकिन जब बार-बार समान पैटर्न सामने आया तो वैज्ञानिकों को समझ आया कि यह मशीन की गलती नहीं, बल्कि जीव की असाधारण जैविक क्षमता है।

दरअसल, टूटे हुए DNA के कुछ हिस्से नष्ट होने के बजाय अगली पीढ़ियों तक पहुंच रहे थे। इसके बाद आने वाली पीढ़ियां उन टूटे हुए हिस्सों को धीरे-धीरे व्यवस्थित करने में योगदान दे रही थीं।

आखिर क्रोमोसोम टूटने के बाद भी बच्चे कैसे पैदा करता है यह जीव?

इस रहस्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा एडिनेटा वागा के क्रोमोसोम की संरचना में छिपा हुआ है। सामान्य क्रोमोसोम में सेंट्रोमियर नाम का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र होता है, जो कोशिका विभाजन के दौरान क्रोमोसोम को सही जगह पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है।

यदि सामान्य क्रोमोसोम कई हिस्सों में टूट जाए तो उसके कुछ टुकड़ों के लिए कोशिका विभाजन के दौरान सही तरीके से आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। इससे कोशिका की मृत्यु या प्रजनन संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

लेकिन एडिनेटा वागा के क्रोमोसोम इस मामले में अलग हैं। इनमें सेंट्रोमियर से जुड़े आवश्यक घटक एक ही स्थान तक सीमित नहीं होते। इस तरह की संरचना को होलोसेंट्रिक क्रोमोसोम कहा जाता है।

यही विशेषता इस सूक्ष्म जीव को बड़ा फायदा देती है। जब उसका क्रोमोसोम कई हिस्सों में टूटता है, तब भी कई टूटे हुए हिस्सों में क्रोमोसोम को कोशिका विभाजन के दौरान संभालने के लिए जरूरी संरचनात्मक क्षमता बनी रह सकती है।

यानी जहां दूसरे जीवों के लिए क्रोमोसोम का इस तरह टूटना विनाशकारी साबित हो सकता है, वहीं एडिनेटा वागा के लिए यह उसके असाधारण जीवनचक्र का हिस्सा बन जाता है।

पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है DNA की मरम्मत का काम

एडिनेटा वागा की सबसे दिलचस्प विशेषता केवल DNA टूटने के बाद जीवित बचना नहीं है। असली हैरानी यह है कि इसका जेनेटिक रिपेयर कई पीढ़ियों तक चलता रह सकता है।

इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक ब्रेक-इंड्यूस्ड होमोलॉगस एक्सटेंशन रिपेयर, यानी BIHER से जोड़कर देखते हैं।

एडिनेटा वागा का जीनोम डिप्लॉयड होता है और इसके क्रोमोसोम जोड़ों में मौजूद रहते हैं। एक क्रोमोसोम टूटने के बाद उसका क्षतिग्रस्त सिरा अपने अपेक्षाकृत सुरक्षित या समान संरचना वाले क्रोमोसोम को खोज सकता है।

इसके बाद उस स्वस्थ या कम क्षतिग्रस्त DNA को एक तरह के सांचे के रूप में इस्तेमाल करके टूटे हुए हिस्से की मरम्मत की प्रक्रिया शुरू होती है।

लेकिन यह काम हमेशा एक ही पीढ़ी में पूरा नहीं होता। यही वजह है कि वैज्ञानिकों को इस जीव में एक ऐसी प्रक्रिया दिखाई दी, जिसमें जेनेटिक मरम्मत का काम आने वाली पीढ़ियों तक आगे बढ़ सकता है।

एक पीढ़ी को जो आनुवंशिक नुकसान मिला, उसकी मरम्मत का कुछ हिस्सा अगली पीढ़ी तक जारी रह सकता है। इस तरह कई पीढ़ियां मिलकर उस जेनेटिक पहेली को सुलझाती दिखाई देती हैं, जिसकी शुरुआत रेडिएशन से हुई थी।

सूखने की आदत ने बना दिया रेडिएशन से लड़ने वाला जीव?

अब सवाल यह उठता है कि आखिर काई में रहने वाले इतने छोटे जीव को रेडिएशन से लड़ने की ऐसी क्षमता मिली कैसे?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसका जवाब उसके प्राकृतिक वातावरण में छिपा हो सकता है।

एडिनेटा वागा जैसे रोटिफर अक्सर काई और लाइकेन जैसी जगहों पर रहते हैं। इन जगहों पर पानी की उपलब्धता लगातार बदलती रहती है। वातावरण सूखने पर यह जीव अपने शरीर से लगभग पूरा पानी खो सकता है और निष्क्रिय अवस्था में चला जाता है।

जब दोबारा पानी उपलब्ध होता है तो यह फिर सक्रिय हो सकता है।

समस्या यह है कि शरीर से पानी का अत्यधिक नुकसान DNA के लिए भी बेहद तनावपूर्ण स्थिति पैदा करता है। डिहाइड्रेशन के दौरान DNA में भी टूट-फूट हो सकती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि लंबे समय तक ऐसे वातावरण में रहने के कारण इस जीव में DNA क्षति से निपटने की क्षमता विकसित हुई होगी।

यानी जिस क्षमता ने इसे सूखी काई में जिंदा रहने में मदद की, वही क्षमता भारी रेडिएशन के सामने भी इसके काम आ सकती है।

टार्डिग्रेड से मुकाबला क्यों हो रहा है?

टार्डिग्रेड को लंबे समय से पृथ्वी के सबसे मजबूत जीवों में गिना जाता है। यह अत्यधिक ठंड, गर्मी, निर्जलीकरण और अंतरिक्ष के निर्वात जैसी कठोर परिस्थितियों में भी कुछ परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध है।

लेकिन एडिनेटा वागा का मामला थोड़ा अलग है। यहां वैज्ञानिकों को खास तौर पर इसकी क्रोमोसोम क्षति और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मरम्मत करने की क्षमता आकर्षित कर रही है।

टार्डिग्रेड भी DNA की क्षति से निपटने की क्षमता के लिए जाना जाता है, लेकिन एडिनेटा वागा में टूटे हुए क्रोमोसोम के टुकड़ों का अगली पीढ़ियों तक बने रहना और फिर उनका धीरे-धीरे व्यवस्थित होना एक अलग तरह की जैविक रणनीति को सामने लाता है।

इसलिए वैज्ञानिकों के लिए यह जीव सिर्फ एक और 'अत्यधिक मजबूत' जीव नहीं है, बल्कि DNA की स्थिरता और विकास को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण मॉडल बन सकता है।

भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बन सकता है मददगार

एडिनेटा वागा पर हो रही रिसर्च का महत्व केवल इस जीव को समझने तक सीमित नहीं है। इसके परिणाम भविष्य की अंतरिक्ष यात्रा के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

मंगल या उससे आगे की लंबी अंतरिक्ष यात्राओं में कॉस्मिक रेडिएशन इंसानी शरीर के लिए बड़ी चुनौती होगी। पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र और वातावरण हमें अंतरिक्ष की कई हानिकारक किरणों से बचाते हैं, लेकिन गहरे अंतरिक्ष में यह सुरक्षा काफी कम हो जाती है।

यदि वैज्ञानिक यह पूरी तरह समझ पाते हैं कि एडिनेटा वागा टूटे हुए DNA को कैसे संभालता है और उसकी मरम्मत किस तरह कई पीढ़ियों तक जारी रहती है, तो भविष्य में इसी जैविक तंत्र से प्रेरित नई रेडिएशन-प्रोटेक्शन तकनीक विकसित की जा सकती है।

संभव है कि इसके DNA रिपेयर से जुड़े प्रोटीन और आणविक तंत्र भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों की कोशिकाओं को रेडिएशन से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए उपयोगी साबित हों।

कैंसर रिसर्च के लिए भी खुल सकता है नया रास्ता

इस खोज का एक और महत्वपूर्ण पहलू कैंसर रिसर्च से जुड़ा है। कैंसर की कुछ कोशिकाओं में क्रोमोसोम के बड़े पैमाने पर टूटने और फिर उनके गलत तरीके से जुड़ने की घटनाएं देखी जाती हैं। इसे क्रोमोथ्रिप्सिस जैसी प्रक्रियाओं से जोड़ा जाता है।

यदि वैज्ञानिक यह समझने में सफल होते हैं कि एडिनेटा वागा टूटे हुए क्रोमोसोम को अपेक्षाकृत व्यवस्थित तरीके से कैसे संभालता है, तो इससे कैंसर कोशिकाओं में होने वाले गलत DNA पुनर्गठन को समझने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इस जीव से सीधे कैंसर की दवा तैयार हो गई है। यह अभी शुरुआती वैज्ञानिक समझ का हिस्सा है। लेकिन इसके DNA रिपेयर सिस्टम का अध्ययन भविष्य में नई शोध दिशाएं खोल सकता है।

अभी भी कई सवालों के जवाब बाकी

एडिनेटा वागा की यह क्षमता जितनी रोमांचक है, उतने ही बड़े सवाल भी वैज्ञानिकों के सामने हैं। उदाहरण के लिए, यदि इसके दोनों समान क्रोमोसोम एक ही क्षेत्र में गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाएं तो यह मरम्मत कैसे करेगा? क्या इसके पास DNA बचाने का कोई दूसरा रास्ता भी है?

वैज्ञानिक यह भी जानना चाहते हैं कि क्या प्रकृति में ऐसे अन्य सूक्ष्म जीव मौजूद हैं, जिनमें इसी तरह की पीढ़ी-दर-पीढ़ी जेनेटिक मरम्मत की क्षमता हो।

इस छोटे से जीव की कहानी फिलहाल यही बताती है कि जीवन को समझने के लिए हमेशा बड़े और जटिल जीवों को देखने की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी पेड़ों की छाल पर जमी काई के बीच छिपा एक बेहद छोटा जीव भी जीव विज्ञान के सबसे बड़े सवालों के जवाब देने की क्षमता रखता है।

एडिनेटा वागा ने वैज्ञानिकों के सामने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि DNA टूट जाने के बाद भी जीवन कितनी दूर तक खुद को दोबारा बना सकता है। आने वाले वर्षों में इस जीव पर होने वाली रिसर्च यह तय कर सकती है कि इसकी असाधारण क्षमता केवल प्रकृति का एक अजूबा है या फिर मानव चिकित्सा और अंतरिक्ष विज्ञान के लिए किसी बड़े भविष्य का संकेत।

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