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बिस्तर से बांधकर देते थे इंजेक्शन, बिना कपड़ों के स्लेव मार्केट होती थी लड़कियों की नीलामी; ISIS के आतंकियों की नापाक हरकतें जान खौलेगा खून



इराक के सिंजर इलाके में अगस्त 2014 में शुरू हुआ ISIS का हमला सिर्फ जमीन पर कब्जे की लड़ाई नहीं था। यजीदी समुदाय के लिए यह एक ऐसी त्रासदी में बदल गया, जिसके निशान आज भी हजारों परिवारों के जीवन में दिखाई देते हैं। ISIS यानी Islamic State के लड़ाकों पर यजीदी महिलाओं और लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन, यौन हिंसा, जबरन शादी और गुलामी जैसे गंभीर अपराधों के आरोप लगे। संयुक्त राष्ट्र और Human Rights Watch समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की जांच में इन घटनाओं को व्यवस्थित और व्यापक अपराध के रूप में दर्ज किया गया है।

यजीदी समुदाय इराक का एक धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय है। 3 अगस्त 2014 को ISIS ने उत्तरी इराक के सिंजर क्षेत्र पर हमला किया। इस हमले के बाद बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, इस दौरान हजारों यजीदी मारे गए या लापता हुए और महिलाओं तथा लड़कियों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया।

घरों से उठा ले जाते थे महिलाओं और लड़कियों को

संयुक्त राष्ट्र की जांच में सामने आए पीड़ितों के बयानों के अनुसार ISIS ने महिलाओं और लड़कियों को उनके परिवारों से अलग किया। कई मामलों में पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग रखा गया और युवा महिलाओं तथा लड़कियों को कैद में ले जाया गया।

इसके बाद कई महिलाओं को अलग-अलग स्थानों पर ले जाया गया। कुछ को ISIS के लड़ाकों के बीच बांटा गया, जबकि कुछ को जबरन शादी के लिए मजबूर किया गया। कई पीड़िताओं ने जांचकर्ताओं को बताया कि उन्हें एक से ज्यादा बार दूसरे लोगों को सौंपा या बेचा गया।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, महिलाओं और लड़कियों को उनकी उम्र, वैवाहिक स्थिति और दूसरे व्यक्तिगत आधारों पर अलग किया जाता था। कुछ मामलों में उन्हें एक तरह की संपत्ति की तरह देखा गया और उनकी खरीद-फरोख्त की गई।

यह सिर्फ व्यक्तिगत अपराधों का मामला नहीं था। संयुक्त राष्ट्र की जांच में ऐसे सबूत सामने आए जिनसे संकेत मिलता है कि महिलाओं और लड़कियों की यौन गुलामी ISIS की व्यापक रणनीति का हिस्सा थी।

कैद में महिलाओं के साथ हुआ यौन शोषण

Human Rights Watch ने 2015 में इराकी कुर्दिस्तान में ISIS की कैद से भागकर आई 20 यजीदी महिलाओं और लड़कियों से बातचीत की थी। संगठन के अनुसार, इन पीड़िताओं ने बार-बार होने वाली यौन हिंसा, जबरन शादी और यौन गुलामी के बारे में बताया।

रिपोर्ट में कहा गया कि ISIS ने यजीदी महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ संगठित तरीके से यौन हिंसा की। कई महिलाओं को बार-बार अलग-अलग लड़ाकों के पास भेजा गया। कुछ को जबरन विवाह के लिए मजबूर किया गया और कुछ को बेच दिया गया।

इन घटनाओं के कारण पीड़िताओं को केवल शारीरिक नुकसान ही नहीं हुआ, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में बार-बार इस बात पर जोर दिया गया है कि ऐसी हिंसा से बचे लोगों को लंबे समय तक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सहायता की जरूरत रहती है।

बच्चों को लेकर भी बनाया जाता था दबाव

कई पीड़िताओं के बयानों में यह सामने आया कि आतंकवादियों ने बच्चों को भी दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया।

संयुक्त राष्ट्र की 2016 की रिपोर्ट में एक महिला की गवाही दर्ज है, जिसे एक ISIS सदस्य को सौंप दिया गया था। महिला ने बताया कि उसके साथ लगातार यौन हिंसा की गई और उसके बच्चों को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी जाती थी। ऐसी धमकियों का उद्देश्य महिलाओं को प्रतिरोध करने से रोकना था।

कुछ महिलाओं ने यह भी बताया कि उनके बच्चों को उनसे अलग कर दिया गया। मां और बच्चे को अलग करना पीड़िताओं के लिए मानसिक रूप से बेहद गंभीर आघात था।

एक महिला को कई बार बेचे जाने की घटनाएं

संयुक्त राष्ट्र की जांच में ऐसे मामले भी सामने आए जिनमें यजीदी महिलाओं को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के पास स्थानांतरित किया गया। कुछ महिलाओं को एक से अधिक बार बेचा गया या दूसरे लड़ाकों को सौंप दिया गया।

UN की रिपोर्ट के अनुसार, ISIS ने महिलाओं और लड़कियों को अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर उनकी खरीद-फरोख्त और यौन गुलामी की व्यवस्था बनाई थी। 2015 में संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिनिधि ने भी कहा था कि युवा यजीदी महिलाओं और लड़कियों को खुले तौर पर बेचने, लड़ाकों को सौंपने और यौन शोषण के लिए तस्करी किए जाने के मामले सामने आए थे।

यह व्यवस्था केवल महिलाओं के खिलाफ अपराध नहीं थी, बल्कि मानव तस्करी के एक संगठित रूप से भी जुड़ी हुई थी।

महिलाओं को बाजारों में बेचने की बात भी जांच में सामने आई

ISIS के कब्जे वाले इलाकों से सामने आए दस्तावेजों और पीड़ितों की गवाही में महिलाओं की खरीद-फरोख्त का उल्लेख मिलता है। संयुक्त राष्ट्र ने 2016 में कहा था कि ISIS द्वारा यजीदियों और अन्य अल्पसंख्यकों की बिक्री तथा तस्करी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा की गई।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने दिसंबर 2016 में एक प्रस्ताव के जरिए ISIS द्वारा यजीदियों और अन्य धार्मिक तथा जातीय अल्पसंख्यकों की मानव तस्करी और बिक्री की कड़ी निंदा की थी। सुरक्षा परिषद ने इस तरह की तस्करी को संघर्ष से जुड़े गंभीर अपराधों से जोड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की जरूरत बताई थी।

कुछ महिलाओं को नशीली दवाएं देने की भी गवाही

संयुक्त राष्ट्र से जुड़े दस्तावेजों में कुछ यजीदी महिलाओं की ऐसी गवाही भी दर्ज है जिसमें उन्होंने बताया कि कैद के दौरान उन्हें नशीली दवाएं दी गईं और उसके बाद उनका यौन शोषण किया गया।

2017 की एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट में यजीदी महिलाओं के बयानों का उल्लेख है, जिसमें कुछ पीड़िताओं ने बताया कि उन्हें ISIS लड़ाकों द्वारा कैद में रखने के दौरान शारीरिक और यौन हिंसा का सामना करना पड़ा।

ऐसी घटनाओं ने यह संकेत दिया कि कैदियों को नियंत्रित करने के लिए हिंसा के साथ-साथ दूसरे तरीकों का भी इस्तेमाल किया जाता था।

ISIS की विचारधारा में गुलामी को जगह देने के सबूत

इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि संयुक्त राष्ट्र की जांच में केवल व्यक्तिगत अपराधों के सबूत ही नहीं मिले, बल्कि ISIS की विचारधारा और उसके दस्तावेजों में महिलाओं की गुलामी को सही ठहराने की कोशिशों के प्रमाण भी मिले।

UNITAD यानी United Nations Investigative Team to Promote Accountability for Crimes Committed by Da'esh की जांच के अनुसार, यजीदी महिलाओं और लड़कियों को यौन गुलामी में डालना ISIS की गुलामी व्यवस्था का केंद्रीय उद्देश्य था। जांच में ISIS के प्रकाशित दस्तावेजों और धार्मिक तर्कों का भी अध्ययन किया गया।

इससे जांचकर्ताओं को यह निष्कर्ष निकालने में मदद मिली कि यौन गुलामी अलग-अलग आतंकवादियों की व्यक्तिगत हरकत भर नहीं थी, बल्कि ISIS की व्यापक व्यवस्था का हिस्सा थी।

संयुक्त राष्ट्र ने इसे नरसंहार से जोड़ा

यजीदियों के खिलाफ ISIS की हिंसा को लेकर संयुक्त राष्ट्र की जांच में नरसंहार के गंभीर आरोप सामने आए। 2016 की UN रिपोर्ट में कहा गया कि ISIS ने यजीदी समुदाय के खिलाफ ऐसे अपराध किए जो नरसंहार की श्रेणी में आ सकते हैं। बाद की अंतरराष्ट्रीय जांचों में भी यजीदी समुदाय के खिलाफ किए गए अपराधों को गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों के रूप में दर्ज किया गया।

महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ यौन हिंसा को इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि यजीदी समुदाय को नष्ट करने की मंशा से जुड़ी कार्रवाई में हत्या, यातना, जबरन धर्म परिवर्तन, विस्थापन और यौन हिंसा जैसे अपराध शामिल थे।

हजारों पीड़ितों के सामने आज भी जिंदगी की बड़ी चुनौती

ISIS के क्षेत्रीय नियंत्रण के कमजोर होने और उसके कब्जे वाले इलाकों के मुक्त होने के बाद कई यजीदी महिलाएं और बच्चे वापस अपने परिवारों तक पहुंच सके। लेकिन सभी लोग वापस नहीं लौट पाए।

Human Rights Watch ने 2023 की अपनी रिपोर्ट में बताया था कि लगभग 3,000 यजीदी महिलाएं और बच्चे ISIS द्वारा अपहरण के बाद भी लापता थे। संगठन ने यह भी कहा कि 2021 में इराकी संसद ने Yazidi Female Survivors Law पारित किया, जिसके तहत ISIS द्वारा किए गए अपहरण, यौन गुलामी, जबरन शादी और अन्य अपराधों से बचे लोगों के लिए पुनर्वास और सहायता का प्रावधान किया गया।

कानून बनने के बावजूद उसके प्रभावी क्रियान्वयन और पर्याप्त वित्तीय सहायता को लेकर चुनौतियां बनी रहीं।

सिर्फ न्याय नहीं, पुनर्वास भी बड़ी जरूरत

ISIS की कैद से बची महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल अपराधियों को सजा दिलाना नहीं है। उन्हें अपने परिवारों और समाज में दोबारा स्थापित करना, मानसिक स्वास्थ्य सहायता देना, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना और बच्चों के भविष्य की सुरक्षा करना भी उतना ही जरूरी है।

संयुक्त राष्ट्र ने कई बार कहा है कि यौन हिंसा से बची महिलाओं और लड़कियों को लंबे समय तक स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सहायता की जरूरत होती है। कई पीड़िताएं सामाजिक कलंक और परिवार से जुड़े दबावों के कारण अपने साथ हुए अपराधों के बारे में खुलकर बोल भी नहीं पातीं।

आज ISIS का क्षेत्रीय नियंत्रण 2014-15 के दौर जैसा नहीं है, लेकिन यजीदी महिलाओं के खिलाफ किए गए अपराधों की विरासत अभी खत्म नहीं हुई है। लापता लोगों की तलाश, अपराधियों की जवाबदेही और पीड़ितों का पुनर्वास अभी भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

सिंजर की त्रासदी यह दिखाती है कि आतंकवाद का असर केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रहता। जब किसी चरमपंथी संगठन की विचारधारा इंसानों को उनकी पहचान के आधार पर निशाना बनाने लगे, तो महिलाएं और बच्चे सबसे कमजोर स्थिति में पहुंच जाते हैं। यजीदी महिलाओं की गवाहियां इसी भयावह दौर का दस्तावेज हैं—ऐसा दौर जिसमें अपहरण, जबरन विस्थापन, यौन हिंसा और गुलामी को आतंक फैलाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया।

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