बच्चों को बीमारी से बचाने दी गई थी गोली, लेकिन कुछ ही देर में मच गया हड़कंप! 7 साल की बच्ची की मौत, 41 अस्पताल में भर्ती… आखिर दवा में क्या था?
आंध्र प्रदेश के पोलावरम जिले से सामने आई घटना ने स्कूलों में बच्चों को दवा देने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक मेडिकल कैंप के दौरान बच्चों को क्लोरोक्विन की गोलियां दी गईं। इसके बाद कई बच्चों की तबीयत अचानक बिगड़ गई। एक सात वर्षीय बच्ची की मौत हो गई, जबकि 41 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इसके अलावा गांव के 16 अन्य लोग भी बीमार बताए जा रहे हैं।
घटना के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई। जिन बच्चों को बीमारी से बचाने के लिए दवा दी गई थी, उन्हीं में से कई बच्चे दवा लेने के बाद उल्टी, पेट में जलन, पेट दर्द और चक्कर जैसी शिकायतों से परेशान हो गए। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर दवा देने की प्रक्रिया में क्या हुआ और क्या बच्चों को दवा देने से पहले जरूरी सावधानियां बरती गई थीं?
मेडिकल कैंप में दी गई थी क्लोरोक्विन की गोली
यह मामला आंध्र प्रदेश के पोलावरम जिले के एटपाका मंडल के गोल्लागुप्पा गांव का बताया जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को गौरीदेवीपेट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की मेडिकल टीम ने गांव में स्वास्थ्य शिविर लगाया था।
मेडिकल जांच के दौरान गांव के कुछ लोगों में मलेरिया संक्रमण की पुष्टि होने की बात सामने आई। इसके बाद मलेरिया से बचाव के उद्देश्य से गांव में क्लोरोक्विन की गोलियां बांटी गईं।
इसी दौरान गांव के सरकारी प्राथमिक स्कूल और आंगनवाड़ी से जुड़े बच्चों को भी दवा दी गई। रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी प्राथमिक स्कूल के 27 और आंगनवाड़ी के 14 बच्चों समेत कुल 41 बच्चों ने दवा ली थी।
शुरुआत में किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही समय बाद यही दवा पूरे गांव में हड़कंप मचा देगी।
दवा खाने के बाद बिगड़ने लगी बच्चों की तबीयत
क्लोरोक्विन की गोली लेने के बाद कुछ बच्चों की तबीयत खराब होने लगी। बच्चों ने पेट में दर्द और जलन की शिकायत की। कुछ बच्चों को उल्टी और चक्कर आने लगे।
हालात बिगड़ते देख परिजन अपने बच्चों को लेकर अस्पताल पहुंचने लगे। कुछ बच्चों को लक्ष्मीपुरम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जबकि गंभीर स्थिति वाले बच्चों को बेहतर इलाज के लिए भद्राचलम अस्पताल भेजा गया।
बताया गया है कि करीब छह बच्चों की स्थिति ज्यादा गंभीर होने के बाद उन्हें भी भद्राचलम भेजा गया।
सात साल की बच्ची की मौत
इस घटना का सबसे दर्दनाक पहलू सात वर्षीय बच्ची की मौत है। रिपोर्ट के मुताबिक, बच्ची का नाम मडिवी जमुना था और वह दूसरी कक्षा में पढ़ती थी।
दवा लेने के बाद उसकी तबीयत तेजी से बिगड़ी। उसे पहले स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। हालत गंभीर होने पर बच्ची को भद्राचलम एरिया अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
बच्ची की मौत की खबर सामने आते ही गांव में मातम छा गया। जिस दवा को बीमारी से बचाव के लिए दिया गया था, उसके बाद एक मासूम की जान चली गई।
सिर्फ बच्चे ही नहीं, 16 ग्रामीण भी बीमार
यह मामला सिर्फ स्कूल के बच्चों तक सीमित नहीं रहा। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, दवा लेने के बाद गांव के 16 अन्य लोगों की तबीयत भी खराब हुई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।
इस तरह अस्पताल पहुंचने वाले लोगों की संख्या 50 से ज्यादा बताई जा रही है। इनमें 41 बच्चे और 16 ग्रामीण शामिल हैं।
इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग की दवा वितरण व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
आखिर किसकी गलती?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस घटना के लिए जिम्मेदार कौन है?
क्या बच्चों को क्लोरोक्विन देने से पहले उनकी उम्र और वजन के हिसाब से दवा की मात्रा तय की गई थी?
क्या हर बच्चे को दवा देने से पहले डॉक्टर या प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी ने जांच की थी?
क्या दवा की सही खुराक और संभावित दुष्प्रभावों के बारे में अभिभावकों को जानकारी दी गई थी?
या फिर दवा वितरण के दौरान किसी स्तर पर लापरवाही हुई?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी व्यक्ति को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराना जल्दबाजी होगी। बच्ची की मौत और बच्चों के बीमार पड़ने का वास्तविक कारण जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
दवा से प्रतिक्रिया या कोई दूसरी वजह?
घटना के बाद सबसे जरूरी सवाल यह भी है कि बच्चों की तबीयत खराब होने की वजह वास्तव में क्लोरोक्विन की प्रतिक्रिया थी या इसके पीछे कोई दूसरी वजह थी।
क्योंकि एक ही समय में बड़ी संख्या में बच्चों और ग्रामीणों के बीमार पड़ने से स्वास्थ्य विभाग को कई पहलुओं की जांच करनी होगी। दवा की गुणवत्ता, बैच नंबर, एक्सपायरी डेट, वितरण की प्रक्रिया, दी गई मात्रा और मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री जैसे तमाम पहलुओं को जांच में शामिल किया जाना जरूरी है।
सिर्फ इस आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि दवा ही मौत का कारण थी। आधिकारिक जांच और मेडिकल रिपोर्ट से ही घटना की असली वजह सामने आएगी।
अब जांच से खुलेगा पूरा राज
घटना के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती बच्चों की हालत पर नजर रखना और घटना की वास्तविक वजह पता लगाना है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को कोई भी दवा देने में अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है। खासकर सामूहिक रूप से दवा वितरण के दौरान यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि दवा सही व्यक्ति को, सही मात्रा में और सही चिकित्सकीय सलाह के अनुसार दी जा रही है।
गोल्लागुप्पा की घटना ने इसी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। एक तरफ मलेरिया जैसे संक्रमण से बचाव जरूरी है, लेकिन दूसरी तरफ दवा देने की प्रक्रिया में छोटी सी चूक भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि जांच में क्या सामने आता है और सात वर्षीय जमुना की मौत तथा दर्जनों लोगों के बीमार पड़ने के पीछे आखिर वास्तविक वजह क्या थी।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—बीमारी से बचाने के लिए दी गई दवा आखिर बच्चों के लिए आफत कैसे बन गई? इसका जवाब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

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