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TCL NGO पर उठे सबसे बड़े सवाल! Core Team से Board तक SC-OBC प्रतिनिधित्व क्यों गायब? ‘Social Justice’ के दावों की खुली पोल?

 


उत्तर प्रदेश में सामाजिक बदलाव, समानता और ग्रामीण समुदायों के विकास के लिए काम करने का दावा करने वाले Trust Community Livelihoods (TCL) की Core Team को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। संस्था की ओर से सार्वजनिक की गई Core Team की सूची के अनुसार शीर्ष स्तर के महत्वपूर्ण पदों पर जिन सदस्यों को जिम्मेदारी दी गई है, उनमें सवर्ण समुदाय के सदस्यों की ही भागीदारी बताई जा रही है, जबकि अनुसूचित जाति यानी SC और अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC का प्रतिनिधित्व नजर नहीं आता।

सबसे ज्यादा सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि TCL अपने घोषित उद्देश्यों में Justice, Equity और Social Justice जैसे मूल्यों को प्रमुखता देता है। संस्था ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने, आजीविका के अवसर बढ़ाने और सामाजिक बदलाव की दिशा में योगदान देने की बात करती है। ऐसे में सवाल यह है कि जब संस्था समाज में समानता और सामाजिक न्याय की बात करती है, तो उसकी अपनी Core Team में सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन क्यों नजर नहीं आता?

हालांकि, किसी व्यक्ति की जाति केवल नाम, उपनाम या तस्वीर से तय नहीं की जा सकती। यहां सवर्ण, SC या OBC से संबंधित दावे को संस्था के आधिकारिक सामाजिक श्रेणी संबंधी रिकॉर्ड के आधार पर ही अंतिम रूप से प्रमाणित किया जा सकता है। लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार Core Team में SC-OBC प्रतिनिधित्व नहीं होने का दावा सामने आया है, जिसने संस्था की नेतृत्व संरचना को सवालों के घेरे में ला दिया है।

Core Team में 10 प्रमुख सदस्य

TCL की Core Team की सार्वजनिक सूची में कुल 10 प्रमुख सदस्यों और उनकी जिम्मेदारियों का उल्लेख है। इसमें Executive Director से लेकर Project Anchor, Subject Matter Specialist, Finance Manager, Senior Consultant और Manager जैसे महत्वपूर्ण पद शामिल हैं।

सूची के अनुसार विनोद जैन Executive Director हैं। डॉ. सुनील पांडेय, विनोद कुमार सिंह और अंकश्वर पांडेय को Livelihoods से जुड़े Project Anchor की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं फरीदा बेगम Education Project Anchor के रूप में दिखाई देती हैं।

इसी तरह आरएन शुक्ला Agriculture से जुड़े Subject Matter Specialist, पंकज शुक्ला Finance Manager, सुरोजित चटर्जी Senior Consultant, विजया लक्ष्मी शर्मा Capacity Building Manager और स्वामी सारण Manager MIS के पद पर बताए गए हैं।

इन पदों को संस्था के कामकाज में महत्वपूर्ण माना जा सकता है, क्योंकि Core Team ही संगठन के विभिन्न प्रोजेक्ट और प्रशासनिक गतिविधियों के संचालन में अहम भूमिका निभाती है।

यही कारण है कि इस सूची में SC और OBC वर्ग के प्रतिनिधित्व की कथित अनुपस्थिति को लेकर सवाल और गंभीर हो जाते हैं।

सामाजिक न्याय की बात, लेकिन नेतृत्व में कौन?

TCL के परिचय में संस्था का उद्देश्य समाज में equity और social justice की दिशा में काम करना बताया गया है। संस्था ने अपने विजन को JEANS शब्द से भी जोड़ा है, जिसमें Justice और Equity जैसे शब्द शामिल हैं।

यानी संगठन के घोषित मूल्यों में न्याय और समानता महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

ऐसे में आलोचना करने वालों का सवाल है कि समानता का सिद्धांत केवल समाज के लिए चलाए जाने वाले कार्यक्रमों तक सीमित होना चाहिए या संस्था के अंदर भी उसका पालन होना चाहिए?

यदि किसी NGO का उद्देश्य सामाजिक रूप से कमजोर और वंचित समुदायों के बीच काम करना है, तो उसके नेतृत्व में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

SC और OBC समुदाय देश के सामाजिक ढांचे का बड़ा हिस्सा हैं। इन समुदायों के सामने शिक्षा, रोजगार, आजीविका, भूमि, आर्थिक अवसर और सामाजिक भागीदारी से जुड़े अलग-अलग सवाल हो सकते हैं। ऐसे में इन समुदायों की आवाज अगर निर्णय लेने वाली टीम में शामिल हो, तो जमीनी समस्याओं को समझने का नजरिया और व्यापक हो सकता है।

Board में भी प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल

मामला सिर्फ Core Team तक सीमित नहीं है। TCL की Board की सूची भी सामने आई है, जिसमें Chair Person, Trustees, Board Members और Managing Trustee जैसे पद शामिल हैं।

Board की सूची के अनुसार मनोज कुमार Chair Person, तेजिंदर सिंह ढिल्लों और पद्मजा नायर Trustee, अलका तिवारी और शुभा प्रसाद Board Member तथा विनोद जैन Managing Trustee के रूप में दर्ज हैं।

अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या Board के स्तर पर भी SC और OBC समुदायों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है।

यदि संस्था के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार Board में भी इन वर्गों की भागीदारी नहीं है, तो यह केवल एक टीम की संरचना का मामला नहीं रहेगा, बल्कि संस्था की पूरी नेतृत्व व्यवस्था में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर बड़ा सवाल बन सकता है।

TCL की स्थापना और उद्देश्य भी चर्चा में

TCL के अपने परिचय के मुताबिक यह संस्था वर्ष 2011 में एक गैर-लाभकारी Trust के रूप में पंजीकृत हुई थी। संस्था की शुरुआत चार वरिष्ठ सामाजिक क्षेत्र के पेशेवरों ने की थी। संस्था का कहना है कि इन लोगों के पास उस समय सामाजिक क्षेत्र और विकास संबंधी काम का 30 वर्ष से अधिक का अनुभव था।

इन लोगों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंसल्टेंसी तथा फील्ड स्तर पर काम करने के बाद अपने अनुभव को सामाजिक बदलाव के लिए इस्तेमाल करने का निर्णय लिया।

TCL के अनुसार संस्था का लक्ष्य उत्तर प्रदेश और अन्य क्षेत्रों में सामाजिक परिवर्तन के लिए काम करना था। संस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों और कृषि आधारित आजीविका को अपने काम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।

यही पृष्ठभूमि अब संस्था की नेतृत्व संरचना को लेकर उठ रहे सवालों को और महत्वपूर्ण बना रही है।

क्या योग्यता के साथ प्रतिनिधित्व भी जरूरी है?

TCL की ओर से यह तर्क दिया जा सकता है कि Board और Core Team में नियुक्तियां लोगों की योग्यता, अनुभव और विशेषज्ञता के आधार पर की गई हैं। निश्चित रूप से किसी भी संस्था के लिए अनुभवी और योग्य लोगों का नेतृत्व महत्वपूर्ण होता है।

लेकिन दूसरी तरफ सवाल यह है कि क्या योग्यता और सामाजिक प्रतिनिधित्व एक-दूसरे के विरोधी हैं?

क्या किसी संगठन में योग्य SC या OBC पेशेवरों को नेतृत्व के अवसर देने के साथ-साथ विशेषज्ञता का स्तर भी बनाए नहीं रखा जा सकता?

यही बहस अब TCL की Core Team को लेकर सामने आ रही है।

यदि संस्था में SC और OBC वर्ग के कर्मचारी मौजूद हैं, लेकिन शीर्ष नेतृत्व में उनका प्रतिनिधित्व नहीं है, तो यह भी जानना महत्वपूर्ण होगा कि उन्हें निर्णय लेने वाले पदों तक पहुंचने के अवसर किस तरह मिलते हैं।

जातिगत भेदभाव का आरोप साबित करने के लिए चाहिए प्रमाण

यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि Core Team में किसी सामाजिक वर्ग की कम या शून्य भागीदारी अपने आप में जातिगत भेदभाव का प्रमाण नहीं होती।

किसी संस्था पर जातिगत भेदभाव का आरोप तभी मजबूती से लगाया जा सकता है जब यह दिखाने वाले प्रमाण मौजूद हों कि किसी व्यक्ति को उसकी जाति के कारण अवसर से वंचित किया गया, नियुक्ति में भेदभाव हुआ या संगठन की नीति में किसी वर्ग के खिलाफ भेदभाव मौजूद है।

इसलिए TCL के मामले में भी सवाल उठाने के साथ-साथ संस्था का पक्ष जानना बेहद जरूरी है।

संस्था से उठ रहे हैं सीधे सवाल

अब TCL से यह पूछा जा सकता है कि उसकी Core Team और Board में सामाजिक प्रतिनिधित्व का आधिकारिक आंकड़ा क्या है?

क्या संस्था अपने नेतृत्व में SC, ST और OBC वर्गों की भागीदारी का विवरण सार्वजनिक करेगी?

क्या संस्था के पास समान अवसर और सामाजिक विविधता को लेकर कोई लिखित नीति है?

Core Team और Board के सदस्यों का चयन किस प्रक्रिया से किया जाता है?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या सामाजिक न्याय के लिए काम करने वाली संस्था अपने ही संगठनात्मक ढांचे में सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में कोई कदम उठा रही है?

इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ होगी।

‘Social Justice’ के दावे पर सबसे बड़ा सवाल

TCL की Core Team और Board की सूची ने संस्था के सामने एक असहज लेकिन महत्वपूर्ण बहस खड़ी कर दी है। अगर उपलब्ध सामाजिक श्रेणी संबंधी जानकारी की पुष्टि होती है और वास्तव में शीर्ष नेतृत्व में सवर्ण सदस्यों की ही भागीदारी है तथा SC-OBC प्रतिनिधित्व नहीं है, तो संस्था को यह बताना होगा कि उसके नेतृत्व ढांचे में सामाजिक विविधता क्यों नहीं दिखाई देती।

आखिर Justice और Equity केवल दस्तावेजों में लिखे शब्द हैं या संस्था की अपनी कार्यप्रणाली का भी हिस्सा हैं?

फिलहाल यह मामला आरोप और सवालों के स्तर पर है। अंतिम निष्कर्ष के लिए TCL का आधिकारिक पक्ष और सामाजिक श्रेणी से संबंधित प्रमाणित आंकड़े सामने आना जरूरी है। लेकिन इतना तय है कि Core Team और Board की संरचना ने सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर एक ऐसी बहस जरूर शुरू कर दी है, जिसका जवाब अब संस्था को देना होगा।

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