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अफगानिस्तान के युद्ध से निकला वो राज, जिसने बदल दी दुनिया की तस्वीर! पाकिस्तान की भूमिका पर फिर सवाल



पाकिस्तान में आतंकवाद और अफगानिस्तान में 1980 के दशक के युद्ध को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। इस बहस के केंद्र में अमेरिका, सऊदी अरब और पाकिस्तान की उस रणनीतिक साझेदारी को रखा जा रहा है, जो सोवियत संघ के खिलाफ अफगान युद्ध के दौरान विकसित हुई थी।

सोशल मीडिया और कई रिपोर्टों में इस दौर को लेकर यह दावा किया जाता है कि अमेरिका और सऊदी अरब ने पाकिस्तान को अरबों डॉलर दिए और उस धन का इस्तेमाल हथियारबंद लड़ाकों के नेटवर्क को तैयार करने में हुआ। इस कहानी में कई तथ्य ऐतिहासिक दस्तावेजों से पुष्ट होते हैं, लेकिन कुछ दावे ऐसे भी हैं जिन्हें उसी रूप में तथ्य मानना उचित नहीं है।

खास तौर पर यह कहना कि अमेरिका की खुफिया एजेंसी ने सीधे ओसामा बिन लादेन को प्रशिक्षित किया या अमेरिका ने जानबूझकर अल-कायदा का निर्माण किया—ऐसे दावों के लिए पर्याप्त सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। वास्तविक कहानी इससे कहीं अधिक जटिल है।

1979 में बदल गया अफगानिस्तान का पूरा समीकरण

दिसंबर 1979 में सोवियत सेना अफगानिस्तान में दाखिल हुई। उस समय दुनिया शीत युद्ध के दौर से गुजर रही थी और अमेरिका तथा सोवियत संघ के बीच वैश्विक स्तर पर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा चल रही थी।

सोवियत सेना के अफगानिस्तान में प्रवेश को अमेरिका ने अपने लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती माना। इसके बाद अफगान विद्रोही समूहों को सहायता देने की अमेरिकी गुप्त योजना तेजी से आगे बढ़ी।

अमेरिका का उद्देश्य सोवियत संघ पर अफगानिस्तान में दबाव बढ़ाना था। लेकिन इस योजना को जमीन पर लागू करने के लिए पाकिस्तान की जरूरत थी।

यहीं से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।

पाकिस्तान बना हथियार और सहायता पहुंचाने का रास्ता

अमेरिका सीधे अफगानिस्तान के सभी विद्रोही गुटों को सहायता नहीं दे रहा था। पाकिस्तान इस पूरे नेटवर्क का प्रमुख माध्यम बन गया।

अमेरिकी हथियार और वित्तीय सहायता पाकिस्तान तक पहुंचाई जाती थी और उसके बाद पाकिस्तानी तंत्र के जरिए अफगान लड़ाकों तक सहायता पहुंचती थी।

इस व्यवस्था में सऊदी अरब की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। अमेरिका और सऊदी अरब ने अफगान युद्ध में सोवियत विरोधी ताकतों की मदद के लिए वित्तीय सहयोग किया।

इससे पाकिस्तान को एक साथ आर्थिक, सैन्य और रणनीतिक लाभ मिला।

5 अरब डॉलर की चर्चा कहां से आई?

अफगान युद्ध में खर्च हुई रकम को लेकर अलग-अलग स्रोतों में अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। पाकिस्तान के राजनेता मुशाहिद हुसैन सैयद ने भी अफगान युद्ध के दौरान अमेरिका और सऊदी अरब की वित्तीय भूमिका का उल्लेख किया है।

उनके अनुसार, लगभग एक दशक के दौरान अफगान लड़ाकों के समर्थन के लिए अरबों डॉलर का इस्तेमाल किया गया था।

यही आंकड़ा बाद में कई रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्टों में लगभग 5 अरब डॉलर के आंकड़े के रूप में सामने आया।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

यह कहना कि “5 अरब डॉलर पाकिस्तान को आतंकी फैक्ट्रियां चलाने के लिए दिए गए थे” ऐतिहासिक रिकॉर्ड का सटीक वर्णन नहीं होगा।

वास्तविकता यह है कि यह पैसा व्यापक अफगान युद्ध और सोवियत विरोधी अभियान के लिए इस्तेमाल होने वाले हथियार, प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स और अन्य सहायता नेटवर्क का हिस्सा था।

सऊदी अरब की भूमिका भी रही अहम

अफगान युद्ध में सऊदी अरब ने अमेरिका के साथ मिलकर महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता दी।

सऊदी अरब के लिए भी सोवियत संघ एक बड़ा भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी था। इसके अलावा उस दौर में धार्मिक और राजनीतिक कारणों से अफगान युद्ध को समर्थन देने की इच्छा भी मौजूद थी।

इस तरह अमेरिका की रणनीतिक शक्ति, सऊदी अरब की आर्थिक क्षमता और पाकिस्तान के भौगोलिक तथा खुफिया नेटवर्क ने मिलकर एक बड़ा सहयोगी ढांचा तैयार किया।

इस नेटवर्क के माध्यम से अफगान लड़ाकों तक हथियार और अन्य सहायता पहुंचाई गई।

क्या ओसामा बिन लादेन को CIA ने ट्रेनिंग दी?

यही इस पूरी कहानी का सबसे विवादित हिस्सा है।

सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA ने ओसामा बिन लादेन को सीधे हथियार चलाने, बम बनाने या गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग दी थी।

लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी इससे अलग तस्वीर पेश करती है।

अमेरिका ने अफगान मुजाहिदीन समूहों को सहायता दी थी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि CIA ने व्यक्तिगत रूप से ओसामा बिन लादेन को प्रशिक्षित किया था।

ओसामा बिन लादेन ने अफगान युद्ध के दौरान अरब स्वयंसेवकों का नेटवर्क बनाया और बाद में अल-कायदा को संगठित किया।

इसलिए अमेरिका और ओसामा के बीच संबंधों को समझते समय सीधे प्रशिक्षण और अप्रत्यक्ष रूप से बने युद्ध वातावरण के बीच अंतर करना जरूरी है।

अफगान युद्ध ने तैयार कर दिया बड़ा लड़ाकू नेटवर्क

1980 के दशक में अफगानिस्तान दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए हथियारबंद स्वयंसेवकों का केंद्र बन गया था।

अफगान युद्ध में लड़ने के लिए अरब देशों सहित विभिन्न स्थानों से लोग पहुंचे। पाकिस्तान इन लोगों की आवाजाही और प्रशिक्षण नेटवर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा।

युद्ध खत्म होने के बाद समस्या यह थी कि बड़ी संख्या में हथियारबंद लोग और युद्ध का अनुभव रखने वाले नेटवर्क अचानक खत्म नहीं हुए।

सोवियत सेना अफगानिस्तान से चली गई, लेकिन हथियार, संगठन, विचारधारा और युद्ध का अनुभव क्षेत्र में मौजूद रहा।

यहीं से आगे चलकर अलग-अलग चरमपंथी संगठनों के उभरने की परिस्थितियां बनीं।

सोवियत वापसी के बाद भी खत्म नहीं हुआ संघर्ष

1989 में सोवियत सेना की अफगानिस्तान से वापसी पूरी हो गई। लेकिन अफगानिस्तान में शांति नहीं आई।

विभिन्न गुटों के बीच संघर्ष जारी रहा। देश गृहयुद्ध की स्थिति में पहुंच गया और कुछ वर्षों बाद तालिबान का प्रभाव तेजी से बढ़ा।

इसी दौर में ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा का नेटवर्क भी मजबूत हुआ।

1990 के दशक में अल-कायदा ने अमेरिका को अपना प्रमुख दुश्मन घोषित किया। आखिरकार 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमलों ने पूरी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था बदल दी।

यानी जिस क्षेत्र में कभी सोवियत संघ के खिलाफ लड़ने के लिए विभिन्न हथियारबंद नेटवर्क तैयार हुए थे, उसी क्षेत्र से बाद में अमेरिका के खिलाफ सबसे बड़े आतंकवादी हमलों की योजना सामने आई।

क्या अमेरिका ने खुद अपना दुश्मन तैयार किया?

यह सवाल अक्सर उठाया जाता है कि क्या अमेरिका की 1980 के दशक की नीति ने आगे चलकर उसी के खिलाफ आतंकवाद को मजबूत करने में मदद की?

इसका उत्तर सीधा हां या ना नहीं है।

यह जरूर तथ्य है कि अमेरिका ने सोवियत विरोधी अफगान लड़ाकों को सहायता दी थी और पाकिस्तान तथा सऊदी अरब इस व्यवस्था के महत्वपूर्ण साझेदार थे।

लेकिन यह कहना कि अमेरिका ने जानबूझकर अल-कायदा बनाया था, ऐतिहासिक प्रमाणों से स्थापित निष्कर्ष नहीं है।

बाद में विकसित हुए आतंकवादी संगठनों की अपनी विचारधारा, नेतृत्व, संगठनात्मक संरचना और राजनीतिक लक्ष्य थे।

इसलिए विशेषज्ञों के बीच इस बात पर बहस होती रही है कि अमेरिकी नीति के अप्रत्यक्ष परिणाम कितने महत्वपूर्ण थे।

पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का भी था अलग मोर्चा

1980 के दशक में पाकिस्तान केवल अफगान युद्ध में ही सक्रिय नहीं था। इसी समय उसका परमाणु कार्यक्रम भी आगे बढ़ रहा था।

अमेरिका को पाकिस्तान की परमाणु गतिविधियों की जानकारी और चिंता दोनों थीं। लेकिन अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ पाकिस्तान की रणनीतिक उपयोगिता इतनी महत्वपूर्ण थी कि वॉशिंगटन को दोनों मुद्दों के बीच संतुलन बनाना पड़ा।

यही कारण है कि उस दौर की अमेरिकी-पाकिस्तानी साझेदारी को केवल आतंकवाद के नजरिए से देखना अधूरा होगा।

इसमें शीत युद्ध, क्षेत्रीय सुरक्षा, सोवियत विरोध, परमाणु नीति और दक्षिण एशियाई भू-राजनीति सभी शामिल थे।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह इतिहास?

भारत के लिए यह इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अफगान युद्ध के बाद दक्षिण एशिया में हथियारबंद नेटवर्क और कट्टरपंथी संगठनों का प्रभाव लंबे समय तक बना रहा।

भारत कई दशकों से पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने के आरोप लगाता रहा है। पाकिस्तान इन आरोपों को खारिज करता रहा है और खुद को आतंकवाद से प्रभावित देश के रूप में भी प्रस्तुत करता रहा है।

कश्मीर में आतंकवाद और पाकिस्तान की भूमिका को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से गंभीर मतभेद रहे हैं।

इसलिए 1980 के दशक में तैयार हुए नेटवर्क को समझना दक्षिण एशिया की मौजूदा सुरक्षा परिस्थितियों को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

असली सवाल आज भी कायम है

अफगान युद्ध के दौरान अमेरिका, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सहयोग कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। हथियारों, धन और रणनीतिक सहायता का एक बड़ा नेटवर्क वास्तव में मौजूद था।

लेकिन इसी इतिहास के साथ कई ऐसे दावे भी जोड़ दिए जाते हैं जिनकी पुष्टि अलग-अलग स्तर पर नहीं हुई है।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सोवियत संघ के खिलाफ शुरू किया गया अफगान अभियान आने वाले दशकों में बेहद जटिल परिणाम लेकर आया।

सोवियत सेना वापस चली गई, लेकिन अफगानिस्तान में युद्ध खत्म नहीं हुआ। हथियारबंद नेटवर्क बने रहे, अलग-अलग संगठन उभरे और अंततः अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठन वैश्विक खतरा बन गए।

आज जब 1980 के दशक की घटनाओं को पीछे मुड़कर देखा जाता है तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि तत्कालीन भू-राजनीतिक रणनीतियों के दीर्घकालिक परिणामों का अनुमान उस समय कितना लगाया गया था।

इतिहास का यह अध्याय बताता है कि किसी भी युद्ध में बनाए गए हथियारबंद नेटवर्क और रणनीतिक गठबंधन केवल उस समय के दुश्मन के खिलाफ इस्तेमाल होकर खत्म नहीं हो जाते। कई बार उनके प्रभाव दशकों तक बने रहते हैं और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा तथा राजनीति को प्रभावित करते हैं।

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