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सिल्क, कतरनी धान और जर्दालू आम पर बाढ़ का कहर, भागलपुर के 3 बड़े ब्रांड के अस्तित्व पर मंडराया संकट


भागलपुर: बिहार का रेशमी शहर कहे जाने वाले भागलपुर में गंगा की उफनती लहरों ने सिर्फ जनजीवन को ही प्रभावित नहीं किया है, बल्कि जिले की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले प्रमुख उद्योग और कृषि उत्पाद भी संकट में आ गए हैं। बाढ़ के पानी ने शहर के कई इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया है। इसका सीधा असर भागलपुर की पहचान बने तसर सिल्क, कतरनी धान और जर्दालू आम पर पड़ रहा है।

इन तीनों उत्पादों को जीआई टैग हासिल है और ये भागलपुर की स्थानीय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ देश-विदेश में जिले की पहचान बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। कृषि और उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस बार बाढ़ से हुए नुकसान का असर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है। हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो हजारों बुनकरों, किसानों और कारोबारियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

पानी में डूबे सिल्क हब, मशीनों और कच्चे माल को नुकसान

भागलपुर के नाथनगर और चंपानगर इलाके को सिल्क कारोबार का प्रमुख केंद्र माना जाता है। बाढ़ के पानी ने इन इलाकों में बुनकरों की गतिविधियों को बुरी तरह प्रभावित किया है। कई जगहों पर पावरलूम मशीनों और सिल्क उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के पानी में डूबने से बड़े नुकसान की आशंका जताई जा रही है।

स्थानीय आर्थिक मामलों के जानकार अधिवक्ता राजेश सर्राफ के मुताबिक, भागलपुर का सिल्क उद्योग करीब आधा घरेलू और आधा अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर है। ऐसे में उत्पादन और सप्लाई बाधित होने का असर केवल स्थानीय कारोबार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विदेशों से जुड़े कारोबार पर भी पड़ सकता है।

बुनकर समाज से जुड़े इनायत अंसारी का कहना है कि कई कारोबारियों को विदेशों से मिले ऑर्डर समय पर पूरे करने में परेशानी आ रही है। अगर तय समय पर माल की डिलीवरी नहीं हो पाती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भागलपुर के सिल्क की साख प्रभावित होने का खतरा है।

बुनकरों के सामने एक और बड़ी चुनौती रोजगार की है। अगर लंबे समय तक काम बंद रहा और नुकसान की भरपाई नहीं हुई तो बुनकर दूसरे शहरों का रुख करने को मजबूर हो सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, बड़े पैमाने पर बनारस या कोलकाता जैसे शहरों में पलायन शुरू हुआ तो भागलपुर के पारंपरिक सिल्क क्लस्टर को लंबे समय तक नुकसान झेलना पड़ सकता है।

कतरनी धान पर भी बाढ़ की मार

भागलपुर की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए कतरनी धान बेहद महत्वपूर्ण है। अपनी खास सुगंध और स्वाद के लिए प्रसिद्ध इस चावल की मांग देश के अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी रही है। लेकिन इस बार खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहने से कतरनी धान की फसल पर संकट मंडरा रहा है।

सुल्तानगंज के आभा रतनपुर निवासी कृषक एवं निर्यातक मनीष कुमार सिंह के अनुसार, कतरनी धान के पौधे काफी नाजुक होते हैं। यदि खेतों में लंबे समय तक बाढ़ का पानी जमा रहा तो पौधों के सड़ने और फसल बर्बाद होने की आशंका बढ़ जाती है।

फसल को नुकसान होने का असर किसानों की आमदनी पर तो पड़ेगा ही, साथ ही कतरनी धान की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है। इससे इस पारंपरिक उत्पाद से जुड़े कारोबारियों और निर्यातकों के सामने भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

जर्दालू आम के बागों में जलभराव बना खतरा

भागलपुर की पहचान में जर्दालू आम का भी खास स्थान है। जिले के कई इलाकों में आम के बागान हैं, लेकिन इस समय जलभराव ने बागान मालिकों की चिंता बढ़ा दी है।

कृषक एवं निर्यातक मनीष कुमार सिंह के मुताबिक, आम के बगीचों में लंबे समय तक पानी का जमा रहना पेड़ों के लिए बेहद नुकसानदायक हो सकता है। वहीं, पीरपैंती के आम उत्पादक पप्पू यादव का कहना है कि अगर बागानों में एक सप्ताह से ज्यादा समय तक पानी जमा रहा तो पेड़ों के सूखने की समस्या सामने आ सकती है।

इसका असर केवल मौजूदा स्थिति तक सीमित नहीं रहेगा। पेड़ों को गंभीर नुकसान हुआ तो आने वाले सीजन में भी आम की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में जर्दालू आम से जुड़े किसानों और कारोबारियों को दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है।

बुनकरों और किसानों के लिए राहत पैकेज की मांग

बाढ़ से पैदा हुए इस संकट के बीच भागलपुर चैंबर ऑफ कॉमर्स के पूर्व अध्यक्ष रामगोपाल पोद्दार ने सरकार से तत्काल राहत की मांग की है। उनका कहना है कि बुनकर और किसान पहले से ही कर्ज के दबाव में हैं। बाढ़ से उत्पादन और कारोबार प्रभावित होने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है।

उन्होंने सरकार से सिल्क बुनकरों के लिए विशेष राहत पैकेज देने और किसानों को फसल बीमा का भुगतान जल्द सुनिश्चित करने की मांग की है। कारोबारियों का मानना है कि समय रहते आर्थिक मदद नहीं मिली तो बाढ़ का असर लंबे समय तक भागलपुर के पारंपरिक उद्योग और कृषि क्षेत्र पर बना रह सकता है।

करोड़ों रुपये के कारोबार पर असर की आशंका

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भागलपुर के सिल्क कारोबार का सालाना कारोबार करीब 100 करोड़ रुपये बताया जाता है। वहीं, कतरनी धान की खेती लगभग 2,000 एकड़ क्षेत्र में होती है और इससे करीब 30 करोड़ रुपये का कारोबार जुड़ा है।

जर्दालू आम का वार्षिक उत्पादन और बाजार करीब 10,000 मीट्रिक टन बताया जाता है। ऐसे में इन तीनों प्रमुख उत्पादों पर बाढ़ की मार का असर हजारों परिवारों की आजीविका पर पड़ सकता है।

भागलपुर में बाढ़ का पानी भले ही धीरे-धीरे उतरने लगे, लेकिन असली चुनौती उसके बाद शुरू होगी। खेतों, बागानों, मशीनों और कच्चे माल को हुए नुकसान का आकलन और उसकी भरपाई आसान नहीं होगी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या समय रहते राहत और पुनर्वास की ठोस व्यवस्था करके भागलपुर की इन पारंपरिक पहचान को बड़े आर्थिक नुकसान से बचाया जा सकेगा।

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